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2011.12.20 11:39:16
ratnesh

MANGA - bundelkhand ka hasya pradhan khand kavya

MANGA BOOK

 

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2011.08.18 14:02:41
kpt

बुंदेलखण्ड के लिए विशेष पैकेज पर राज्यसभा में हंगामा

नई दिल्ली, 18 अगस्त : बुंदेलखण्ड के लिए विशेष पैकेज को लेकर विपक्षी दलों ने गुरुवार को राज्यसभा में भारी हंगामा किया, जिसके कारण थोड़ी देर के लिए सदन की कार्यवाही स्थगित करनी पड़ी।

विपक्षी दलों का आरोप है कि केंद्र सरकार ने बुंदेलखण्ड के लिए जिस विशेष पैकेज की घोषणा की है, उसकी राशि वास्तव में केंद्र सरकार की विभिन्न योजनाओं में मिला दी गई है।

बहुजन समाज पार्टी (बसपा), भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और समाजवादी पार्टी (सपा) ने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने बुंदेलखण्ड के लिए 7,266 करोड़ रुपये के जिस पैकेज की घोषणा की थी उसे केंद्र प्रायोजित विभिन्न योजनाओं में मिला दिया गया है।

बसपा सांसद गंगा चरण ने कहा कि विशेष पैकेज को केंद्रीय योजनाओं में नहीं मिलाया जाना चाहिए। विशेष पैकेज के रूप में दिया जाने वाला अनुदान केंद्र की ओर से मिलने वाली अतिरिक्त राशि होनी चाहिए। प्रधानमंत्री को घोषणा करनी चाहिए कि बुंदेलखण्ड के लिए कोई विशेष पैकेज नहीं है।

उन्होंने कहा कि विशेष पैकेज की राशि का आवंटन महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम और इंदिरा आवास योजना के तहत किया गया है।

जवाब में केंद्रीय योजना राज्य मंत्री अश्विनी कुमार ने कहा कि केंद्रीय योजनाओं के तहत राशि का आवंटन इसलिए किया गया, क्योंकि इनके उद्देश्य एक हैं। आवंटन विशेष पैकेज का हिस्सा है।

मंत्री के जवाब से असंतुष्ट विपक्षी सदस्यों ने हंगामा किया, जिसके बाद सभापति हामिद अंसारी ने सदन की कार्यवाही 10 मिनट के लिए दोपहर 12 बजे तक स्थगित कर दी।

Reference

http://www.pradeshtoday.com/new_details.php?news=Special+package+for+Bundelkhand+echo+in+RS


  
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2011.08.10 12:06:03
rawat167

भरोसे की चक्की में पिसते किसान
प्रणव सिरोही / बांदा August 09, 2011

पैकेज के बावजूद बुंदेलखंड में किसानों की आत्महत्या के मामलों में कमी नहीं आ रही है। पिछले पांच महीनों में ही किसानों की आत्महत्या के लगभग 520 मामले सामने आए हैं। सूखे के दुष्चक्र, नकली बीजों के फेर, फसल बीमा के फायदे से महरूम, कर्ज की मार में फंसे किसान जिंदगी से हार मानते दिख रहे हैं। बांदा के सांसद आर के सिंह पटेल कहते हैं, 'पैकेज का नियोजन सही तरीके से नहीं किया गया है। इसे उन लोगों ने तैयार किया है, जिनका जमीनी हकीकत से कोई वास्ता नहीं हैं।Ó हालांकि इस साल यहां कुछ बेहतर बारिश हुई है लेकिन वह भी नाकाफी मालूम पड़ती है। पैकेज के बाद भी सिंचाई की सुविधाओं में खास फायदा नहीं हुआ है। इस इलाके में धान उगाने के लिए 1,400 रुपये और गेहूं उगाने के लिए 1,500 रुपये प्रति क्विंटल तक की लागत आती है। लागत भी वसूल न हो पाने पर परेशान किसान भला और क्या करेगा?
पैकेज के तहत किसानों को मुफ्त बीज और खाद की व्यवस्था भी की गई है। लेकिन पिछले वर्ष कई ऐसे बीज बांट दिए गए जिनसे फसल ही नहीं उगी। किसान आसा राम बताते हैं कि वे 'पेटेंटÓ बीज थे, जिनसे दोबारा फसल नहीं हो पाती क्योंकि उनसे फसल पहले ही ली जा चुकी थी। जब कोहराम मचा तो प्रशासन ने कुछ कार्यवाही का भरोसा जताया लेकिन फसल बीमा के नाम पर भी किसानों को कोई राहत नहीं मिली क्योंकि केवल प्राकृतिक आपदा की स्थिति में ही यह लाभ मिलता है।
पाले से नष्टï हुई दलहन फसलों के मामले में भी ऐसा ही हुआ। तब भी किसान मुआवजे से महरूम रह गए। हालांकि किसानों के लिए एक अच्छी है कि पाले को भी जल्द ही प्राकृतिक आपदा की श्रेणी में लिया जा सकता है और कृषि मंत्री शरद पवार इस मसले को कैबिनेट की मंजूरी दिलाने की कोशिशों में लगे हैं। किसान क्रेडिट कार्ड का भी कोई फायदा नहीं नजर आ रहा है। आमदनी नहीं होने के कारण कर्ज अदा नहीं हो पाता ऐसे में किसान को जमीन ही गंवानी पड़ती है। पटेल कहते हैं, 'पैकेज में मंडियों के निर्माण के लिए भारी खर्च किया जा रहा है जबकि उत्पादकता बढ़ाने पर कोई जोर नहीं हैं। जब उत्पादन नहीं होगा तो मंडियां कैसे गुलजार होंगी। किसानों को जब तक सीधे मदद नहीं मिलेगी, तो उनका भला नहीं होगा।


  
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2011.07.28 09:38:44
pradeep

15 जुलाई 2011

सीएनएन-आईबीएन

केंद्र सरकार द्वारा बुंदेलखंड के किसानों के लिए सात हजार करोड़ का पैकेज दिए किए के बावजूद बुंदेलखंड में किसानों की स्थिति में सुधार नहीं हुआ है। पिछले पांच महीनों में 500 से ज्यादा किसानों की खुदकुशी के आंकड़े तो यही संकेत देते हैं कि सरकारी पैकेज पर बुंदेलखंड की गरीबी भारी पड़ रही है।

हाल ही में बैंक से लिया कर्ज चुका पाने में असमर्थ 45 वर्षीय वीरपाल राजपूत के आत्महत्या का मामला प्रकाश में आने के बाद बुंदेलखंड में आत्महत्या करनेवाले किसानों की संख्या पिछले 5 माह में 519 तक पहुंच गई है।

यह क्षेत्र पिछले आठ साल से सूखे और अकाल से जूझ रहा है। प्राकृतिक आपदा के कारण खेती का काम ना के बराबर हो रहा है, जिसकी वजह से यहां पिछले 10 सालों में 2945 किसानों ने खुदकुशी की है।

उत्तर प्रदेश में किसानों के नाम पर जोर-शोर से राजनीतिक जंग लड़ी जा रही है। लेकिन किसानों की हालत बद से बदतर होती जा रही है। गौरतलब है कि केंद्र ने बुंदेलखंड के किसानों के लिए सात हजार करोड़ का पैकेज दिया था।

 

मासूम पूछ रही है, पापा को आखिर हुआ क्या है?

 

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने खुद बांदा पहुंच कर किसानों के लिए पैकेज की घोषणा की थी। राहुल गांधी ने माया सरकार पर पैकेज का पैसा बुंदेलखंड में खर्च न करने का आरोप लगाया था। उधर, मायावती हर बार इस पैकेज को ऊंट के मुंह में जीरा बताते हुए 80 हजार करोड़ का पैकेज मांग रही हैं। पर किसान शायद राजनीति के इस खेल से बेजार हो चुका है। यही वजह है कि कुछ सालों में बुंदेलखंड के हजारों किसान मौत को गले लगा चुके हैं। सवाल यह है कि आखिर इसका जिम्मेदार कौन है?

http://josh18.in.com/hindi/regional-news-news/1117112/0


  
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2011.07.28 09:37:06
pradeep

बुंदेलखण्ड देश का दूसरा विदर्भ बनता जा रहा है। केन्द्र और राज्य सरकारों के तमाम घोषित उपायों के बावजूद यहॉ के किसानों द्वारा की जा रही आत्महत्याओं का सिलसिला थम नहीं रहा है। स्थिति की भयावहता का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि गत माह इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने समाचार पत्रों में छप रही आत्महत्याओं की खबरों पर स्वत: संज्ञान लेते हुए केन्द्र व उ.प्र. सरकार से कैफियत तलब की है।
इस क्षेत्र की बदहाली के लिए प्राकृतिक कारणों के साथ-साथ राजनीतिक कारण कितने जिम्मेदार हैं, इसको इस तथ्य से समझा जा सकता है कि केन्द्र द्वारा गत वर्ष बुंदेलखण्ड को अतिरिक्त सहायता के मद में दिए गए 800 करोड़ रुपये को उ.प्र. सरकार खर्च ही नहीं कर पाई है और उसने बीते मार्च माह तक मात्र 73 करोड़ यानी सिर्फ 09 प्रतिशत धनराशि का उपयोग प्रमाण पत्र दिया है! जानना दिलचस्प होगा कि केन्द्र सरकार ने बुंदेलखण्ड के विकास और राहत कार्यों के लिए कुल लगभग 800 करोड़ रुपयों का भारी-भरकम विषेश पैकेज दे रखा है, लेकिन वहॉ प्रशासनिक स्तर पर घोर अवयस्था के चलते स्थिति सुधारने के बजाय और बिगड़ती ही जा रही है।

बीते 15 जून को इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने उक्त मामले का स्वत: संज्ञान लेते हुए न सिर्फ केन्द्र व राज्य सरकार से जवाब तलब किया है बल्कि अग्रिम आदेश तक इस क्षेत्र में सभी प्रकार की राजकीय व साहूकरी वसूली पर रोक भी लगा दी है। आत्म हत्याओं के ऑकड़े से चिंतित न्यायालय ने उ.प्र. के मुख्य सचिव को आदेश दिया है कि वे ऐसे प्रत्येक प्रकरण में अस्पताल, थाना तथा ब्लाक मुख्यालय से विस्तृत जानकारी तथा किसानों को शासन द्वारा दी जाने वाली कुल सहायता का ब्यौरा एक माह के भीतर न्यायालय में पेश करें। न्यायालय की चिंता को किसानों द्वारा की जा रही आत्महत्याओं के इन ऑकड़ों से समझा जा सकता है कि वर्ष 2009 से अब तक यानी मात्र दो वर्षों में 1670 किसानों ने कर्ज व गरीबी से तंग आकर अपनी जान दे दी है। बुंदेलखण्ड मध्य प्रदेश और उत्‍तर प्रदेश के कुछ हिस्सों को मिलाकर बनता है। इसमें उ.प्र. के बॉदा, जालौन, हमीरपुर, झॉसी, चित्रकूट, महोबा और ललितपुर जिले हैं। केन्द्र से पर्याप्त धनराशि आने के बावजूद प्रदेश सरकार की प्रशासनिक अक्षमता के कारण योजनाओं पर अमल नहीं हो पा रहा है,  जिससे हताश किसान अपनी जीवनलीला ही समाप्त कर ले रहे हैं।

बुंदेलखण्ड की प्रमुख समस्या सूखा है। एक तो यह समूचा क्षेत्र वैसे ही पथरीला और असमतल है दूसरे बीते एक दशक से यहॉ नियमित बरसात न होने के कारण स्थिति इतनी विकराल हो गई है कि जगह-जगह जमीन फट जाती है और दरारों में से बेतहाशा धुंआ निकलने लगता है। उ.प्र. में इस बार जब बसपा की सरकार सत्तारुढ़ हुई तो उसने तीन साल पहले 2008 में बुंदेलखण्ड के सूखे से चिन्तित होकर वहॉ कृत्रिम बरसात कराने की घोषणा की और इसके लिए विदेशों से तकनीकी जानकारी भी प्राप्त की गई। इस प्रक्रिया में सिल्वर आयोडाइड (चॉदी का एक अवयव) इस्तेमाल होने के कारण मॅहगी तो थी लेकिन इसके व्यापक असर को देखते हुए इस पर अमल करने का निश्चय किया गया। अब पता नहीं कोई प्रशासनिक अड़चन आयी या लगभग उसी दौरान कांग्रेस के राष्ट्रीय महासचिव राहुल गॉधी ने बुंदेलखण्ड पर थोड़ा ध्यान देना शुरु कर दिया, जो भी हो, राज्य सरकार ने इस अत्यन्त उपयोगी योजना को किसी तहखाने में डाल दिया।

आज बुंदेलखण्ड के दोनों हिस्सों की मुख्य समस्या पानी की किल्लत और इससे उत्पन्न समस्याएं हैं,  जैसे कि फसल का सूखना तथा चारे व पेयजल की कमी आदि हैं। जाहिर है कि ये समस्याएं हल की जा सकती हैं और इनको हल करने के लिए तमाम योजनाएं वहॉ लागू भी है लेकिन वे सब प्रशासनिक लूट-खसोट की शिकार होकर उत्पीड़नकारी हो गयी हैं। वहॉ गॉवों में सामुदायिक रसोई चलाकर जरुरतमंदों को भोजन देने की योजना है तो जानवरों के लिए चारा बैंक भी है। पेयजल के सचल टैंकरों से जलापूर्ति की व्यवस्था है तो मनरेगा जैसी योजनाओं की मार्फत कार्य के अवसर भी उपलब्ध कराये जा रहे है और मनरेगा के श्रम का उपयोग तालाबों की खुदाई, उनका सुदृढ़ीकरण तथा बरसाती जल को रोकने के लिए मेंड़ व बॉध बनाने में भी किया जा रहा है। किसानों की ऋण माफी योजना वहाँ भी लागू की गई है। ये सब हैं लेकिन इन सबके वहॉ काम न कर पाने का मुख्य कारण प्रशासनिक भ्रष्टाचार है, जिसके कारण जरुरतमंद लोग कोई भी लाभ नहीं पा रहे हैं और उनके सामने अंतिम विकल्प अपनी जान गँवा देने का ही है। सार्वजनिक वितरण के लिए वहॉ गए पेयजल के टैंकरों को बदमाश बन्दूक के बल पर लूट लेते हैं और फिर मनमाना दाम लेकर बेचते हैं। बाकी योजनाओं के हश्र का अनुमान लगाया जा सकता है। हताशा का आलम यह है कि आत्महत्या के साथ-साथ इस क्षेत्र से पलायन भी तेजी से हो रहा है। सरकारी ऑकड़ों की ही माने तो इधर के वर्षों में लगभग 13000 परिवार उ.प्र. के बुंदेलखण्ड से पलायित हो चुके हैं। गैर सरकारी तौर पर यह संख्या दोगुनी बतायी जाती है।

उच्च न्यायालय के संज्ञान लेने के तत्काल बाद केन्द्रीय योजना आयोग की एक बैठक हुई जिसमें उक्त क्षेत्र के सांसदों ने हिस्सा लिया। बुंदेलखण्ड पैकेज की धनराशि के खर्च पर हुई इस समीक्षा बैठक में शामिल बांदा से सपा सांसद आर. के. पटेल ने कहा कि सारी योजनाएं अधिकारियों की लूट-खसोट की शिकार हैं और इनकी सीबीआई जॉच होनी चाहिए। सपा के ही घनश्याम अनुरागी ने पैकेज के कार्यो में भारी बंदरबॉट की शिकायत की तो झॉसी के सांसद प्रदीप जैन आदित्य ने आरोप लगाया कि प्रदेश सरकार जानबूझकर बुंदेलखण्ड में केन्द्रीय योजनाओं की दुर्दशा कर रही है, क्योंकि उसे डर है कि कहीं योजनाओं की सफलता का श्रेय राहुल गॉधी को न मिल जाय। जैन ने किसानों के कर्ज के एकमुश्त समाधान किए जाने की मॉग केन्द्र सरकार से की जबकि हमीरपुर के बसपा सांसद विजय बहादुर सिंह ने आरोप लगाया कि बुंदेलखण्ड के लिए प्रस्तावित कई योजनाओं के लिए केन्द्र के कई विभागों से धन मिलना था जो कि आज तक मिला ही नहीं। बहरहाल श्री सिंह के आरोप उस वक्त निराधार साबित हो गये जब गत दिनों उ.प्र. के मुख्य सचिव ने स्वीकार किया कि केन्द्र द्वारा दिए गए धन को खर्च करने के लिए अभी उन्हें एक वर्ष का समय और चाहिए। उन्होंने यह स्वीकारोक्ति बुंदेलखण्ड पर केन्द्रीय पैकेज के प्रभारी डॉ. जे.एस. सामरा के साथ हुई एक बैठक में की।

बुंदेलखण्ड के लोगों की हताशा और विषाद का मुख्य कारण पानी है। इसका हल हुए बगैर वहॉ जन जीवन सामान्य नहीं हो सकता। तमाम कारगर और तस्वीर बदलने मे सक्षम योजनाएं वहॉ राजनीतिक खींचतान में उलझी पड़ी हैं। इसलिए आवश्यकता वहॉ जलागम की कोई केन्द्रीय योजना शुरु करने की है। इसी समस्या के हल के लिए बहुउद्देष्यीय केन-बेतवा नदी जोड़ने की योजना बनाई गई है। केन्द्र की इस योजना के तहत केन नदी के अतिरिक्त पानी को बेतवा नदी तक पहुंचाया जाना प्रस्तावित है तथा इसमें बनाये जाने बॉध, बैराज और नहरों से पूरे बुंदेलखण्ड को हरा-भरा किया जाना है। इसके तहत मकोरिया, रिछान, बरारी और केसरी नामक स्थानों पर बॉध बनाये जाने हैं तथा इसी में से नहरें निकलेंगी। प्रारम्भ में 1800 करोड़ रुपये की अनुमानित यह योजना अब 9000 करोड़ रुपये की बतायी जा रही है, लेकिन इसका क्रियान्वयन बुंदेलखण्ड की सूरत बदल सकता है।

http://www.news.bhadas4media.com/index.php/weyoume/283-2011-07-20-06-22-57

लेखक सुनील अमर पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं
  
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2011.07.28 05:35:33
pradeep

Two months after the Supreme Court issued notice to the Uttar Pradesh government to respond to alleged anomalies in MGNREGS pointed out in the survey report of the Centre for Environment and Food Security (CEFS), the state government has formed special teams to investigate the complaints in five districts of Bundelkhand.

Five teams have been formed to do spot verification of the anomalies pointed out in the report, which was submitted to the court in February 2011 and prepared by Parshuram Ray, Director of Delhi-based CEFS.

Ray had filed a civil writ petition against the Union government seeking a CBI probe into the anomalies in NREGA.

During the hearing of the petition, the Supreme Court had ordered a CBI enquiry into misappropriation of NREGA funds in Orrisa. Madhya Pradesh and UP were served notices to respond to the report in the previous order dated May 12.

 

The teams headed by Joint Secretary Anita Srivastava for Jhansi, Additional Commissioner Anurag Yadav for Chitrakoot, Assistant Commissioner J Shukla for Banda, Assistant Commissioner VK Bhagwat for Laitpur and Deputy commissioner NP Singh for Mahoba have been asked to conduct spot inspection in the coming week.

Sources inform that the teams have been asked to complete their inspection by the end of this week and submit their report by August 3 to the state government for further action.

In the report of the CEFS, which had surveyed around 800 households, it had come out that in Bundelkhand while about 50 per cent of the poorest Dalits surveyed in the report did not get single day of NREGA work, average work given to the surveyed household came out to be just 20 days. 

In its previous order, the court had said that in case of default, “the court would be compelled to take appropriate action against the defaulting officers/officials/authorities.”

The next hearing of the case is scheduled for September 12.

 


  lalitput | Jhansi
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2011.04.30 11:44:53
rawat167

Bundelkhand and Baghelkhand have a rich cultural background. Chandelas
and Bundelas rulers of Bundelkhand were great builders and created
numerous forts, palaces and temples. The region is full of temples,
particularly that of Lord Shiva. Chandelas created a large number of ponds
now known as Chandeli-ponds in this region for irrigation and drinking water
supply.
A famous place of tourist and religious attraction, Orchha, is situated in the
district of Tikamgarh. It was the capital of Bundelas before it got shifted to
Tikamgarh due to vulnerable strategic position of Orchha in later days. In the
background of river Betwa, the fort and numerous temples of Orchha provide
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a picturesque view. The buildings of Orchha and Datia are magnificent and
tell the tales of the creativity of Bundela rulers. Tikamgarh is also religiously
famous for its temples of Lord Rama in the Orchha, and the one named
Kundeshwar Mahadeo Mandir, near Tikamgarh township.
  
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2011.01.21 05:14:07
rawat167

'पीपली लाइव' के ऑस्कर से बाहर

मुम्बई। बॉलीवुड अभिनेता आमिर खान ने कहा कि उन्हें दुख है कि फिल्म 'पीपली लाइव' ऑस्कर के दूसरे दौर के लिए नहीं चुनी गई, लेकिन उन्होंने प्रसन्नता जताई कि उनकी फिल्म ने भारत का प्रतिनिधित्व किया।

आमिर खान ने संवाददाता सम्मेलन में कहा कि उन्हें खुशी है कि उनकी फिल्म ऑस्कर के लिए नामित होने वाली 60 फिल्मों में शामिल की गई।

उन्होंने हालांकि कहा कि वे ऑस्कर के लिए फिल्में नहीं बनाते, बल्कि वे दर्शकों के लिए फिल्में बनाते हैं।

पीपली लाइव अनुषा रिज्वी के निर्देशन में बनी पहली फिल्म है और इसमें गांव और शहरों के बीच के फासले को दिखाया गया है।

फिल्म 83वें एकेडमी पुरस्कार की विदेशी भाषा फिल्म श्रेणी के लिए चुनी गई नौ फिल्मों में शामिल नहीं हो पाई।

इस वर्ष इस श्रेणी में इथोपिया और ग्रीनलैंड ने पहली बार फिल्में भेजीं।

दूसरे दौर के लिए चुनी गई नौ फिल्मों की 21-23 जनवरी को समीक्षा होगी और इनमें से पुन: पांच फिल्मों का चयन किया जाएगा, जिनकी घोषणा आगामी मंगलवार को होगी।


  
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2010.09.25 09:05:01
rawat167

भारत से 'पीपली लाइव' जाएगी ऑस्कर में

नई दिल्ली।। आमिर खान प्रॉडक्शन के बैनर तले बनी ' पीपली लाइव ' को 83वें ऑस्‍कर अवॉर्ड्स के


लिए भारत की ओर से नॉमिनेट किया गया है। ' पीपली लाइव ' बेस्‍ट फॉरेन फिल्‍म कैटिगरी के लिए भारत की आधिकारिक एंट्री होगी।

अब आमिर के सामने फिल्म को दुनिया भर की फिल्मों के सामने ' पीपली लाइव ' को बेस्ट फाइव के नॉमिनेशन तक पहुंचाने की होगी।

आम आदमी को केंद्र बनाकर बनाई गई इस फिल्म की डायरेक्टर अनुष्का रिजवी हैं। उन्होंने किसानों और ग्रामीणों की समस्याओं को संवदेशनील तरीके से फिल्माते हुए नेताओं और मीडिया की कार्यप्रणाली पर कटाक्ष किया है। बर्लिन फिल्म फेस्टिवल में पीपली लाइव फिल्म की स्पेशल स्क्रीनिंग की गई थी और 31वें डर्बन इंटरनैशनल फिल्म फेस्टिवल में इसे बेस्ट फर्स्ट फीचर फिल्म का अवॉर्ड भी मिल चुका है।

 इससे पहले भारत की ओर से नॉमिनेट फिल्मों में से 'मदर इंडिया', 'सलाम बॉम्बे' और 'लगान' को ही ऑस्कर में फॉरेन लैंग्विज कैटिगरी की बेस्ट फाइव फिल्मों में नॉमिनेशन मिल पाया है। ये फिल्में भी आखिरी सफलता से बस एक कदम दूर रह गईं। इससे पहले आमिर की 'तारे जमीं पर' भी 2009 में ऑस्कर के लिए जा चुकी है, लेकिन वह अंतिम पांच में जगह नहीं बना पाई थी।


  
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2010.09.22 12:13:33
rawat167

बुंदेलखंड के लिए साढ़े चार अरब जारी

भोपाल । राज्य शासन के योजना आर्थिक एवं सांख्यिकी विभाग की ओर से मध्यप्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले 6 जिलों के लिए भारत सरकार से स्वीकृत विशेष आर्थिक पैकेज के तहत कार्यों के लिए साढ़े चार अरब रूपए जारी किए गए हैं।
आयुक्त स्तरीय गठित मूल्यांकन समिति की प्रथम बैठक में यह जानकारी दी गई। अध्यक्षता मूल्यांकन समिति के अध्यक्ष तथा सागर राजस्व संभाग के कमिश्नर एस.के. वेद ने की। बैठक में यह तय हुआ कि बैठक प्रत्येक माह के द्वितीय सप्ताह में हुआ करेगी ताकि कार्यो के क्रियान्वयन के क्षेत्र में कठिनाइयों का तत्काल निराकरण तत्काल किया जा सके। जारी राशि में से जल संसाधन विभाग को 3 अरब 6 करोड़ 47 लाख रूपए, वाटरशेड मेनेजमेंट के लिए 98 करोड़ 52 लाख 50 हजार रूपए, वन विभाग को 23 करोड़ 52 लाख रूपए तथा पशु चिकित्सा विभाग को 20 करोड़ 88 लाख रूपए दिए गए हैं।

इन जिलों को इतनी-इतनी राशि स्वीकृत

वैसे सागर को 7 अरब 92 करोड़ 80 लाख रूपए, दमोह को 5 अरब 47 करोड़ 6 लाख रूपए, छतरपुर 8 अरब 20 करोड़ 16 लाख रूपए, टीकमगढ़ 3 अरब 97 करोड़ 82 लाख रूपए, पन्ना 3 अरब 33 करोड़ 59 लाख रूपए और दतिया को 3 अरब 22 करोड़ 9 लाख रूपए स्वीकृत हैं।

 

टिप्पड़ी-  हमें नहीं लगता की इस पैकेज  का भी सर्कार कोई फायदा ले पायेगी और ये पैसे की भी बर्वादी होगी बुंदेलखंड के विकाश के लिए सर्कार को कोई विशेष विभाग बनाना चाहिए जो की बुंदेलखंड में किये जा रहे विशष कार्यों पर ध्यान रखे !

सागर.

बुंदेलखंड के विकास के लिए हजारों करोड़ के विशेष पैकेज दिए जा रहे हैं किंतु दूसरी ओर इसे खर्च करने वाली एजेंसियों की कार्यक्षमता की स्थिति यह है कि वे महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के तहत संभाग के तीन जिलों को आवंटित 30 करोड़ की राशि का उपयोग नहीं कर सकीं।

लिहाजा, यह राशि लेप्स हो गई। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि सूखा और अन्य समस्याओं से जूझ रहे संभाग के जिलों में विकास को लेकर प्रशासनिक मशीनरी कितनी संजीदा है।

पन्ना में नहीं हुए पचास फीसदी काम : विकास के लिए विशेष पैकेज से सींचे जा रहे पन्ना जिले में वर्ष 2007-08 व 2008-09 में लोक निर्माण विभाग द्वारा स्वीकृत कार्य से लगभग 17 काम अभी भी अधूरे पड़े हैं। केंद्र सरकार से मिली 93.56 लाख की राशि का उपयोग भी नहीं किया गया,वहीं ग्रामीण यांत्रिकी विभाग ने 155 कार्य मंजूर किए थे, जिसमें से 77 कामों पर ध्यान नहीं दिया गया। इस वजह से 449.14 लाख की राशि लेप्स हो गई।

जल संसाधन विभाग के 55 कार्य अपूर्ण रहे, जिसमें 237.33 लाख रुपए की राशि लेप्स हो गई।

इस तरह कुल 8 करोड़ 16 लाख 4 हजार की राशि का उपयोग नहीं हो सका है। दो जिलों में 22 करोड़ लेप्स: टीकमगढ़ जिले में 2008-09 में लोक निर्माण विभाग, ग्रामीण यांत्रिकी विभाग और जल संसाधन विभाग ने 213 कामों पर ध्यान नहीं दिया,नतीजतन लगभग 10 करोड़ की राशि लेप्स हो गई।

इसी तरह छतरपुर जिले में 179 कार्य पूरे नहीं होने से 12 करोड़ की राशि का इस्तेमाल नहीं हो सका। इस तरह तीनों जिलों की 30 करोड़ 26 लाख 4 हजार की राशि का उपयोग नहीं किया गया। यही हाल सागर जिले का रहा, जहां करोड़ों रुपए की लागत के काम नहीं कराए गए।

केंद्र का विशेष पैकेज

बुंदेलखंड में हाशिये पर आ पहुंची कांग्रेस ने अपना जनाधार बढ़ाने के लिए विशेष ध्यान देना शुरू किया है। इसी के मद्देनजर करीब ६ माह पहले बुंदेलखंड के उत्थान के लिए 3 हजार 627 करोड़ रुपए का विशेष पैकेज दिया है।

इस राशि को दो साल में खर्च करने का लक्ष्य रखा गया है। बुंदेलखंड के सागर, दमोह, छतरपुर,टीकमगढ़ पन्ना के अलावा दतिया जिले में इस राशि से विकासात्मक कार्य कराए जाने हैं। इस राशि में से एक बहुत बड़ा भाग सिंचाई सुविधाओं के विस्तार पर खर्च होना है।

बुंदेलखंड के विकास के लिए हर संभव प्रयास किए जा रहे हैं। राशि का उपयोग नहीं होना चिंताजनक है। इसलिए अब मानीटरिंग पर विशेष ध्यान दिया जाएगा।


  bundelkhand package | Madhya pradesh goverment | MP | shivraj singh sarkar
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2010.09.07 09:44:04
rawat167

सरकार का आपदा प्रवन्धन विभाग अपने पहले चरण पूर्वानुमान में ही फेल हो जाता है

http://lh5.ggpht.com/_XpcuWNz7k5Y/S-6a36PvsSI/AAAAAAAABQ0/I3_m79kQKt0/bundelkhand_100.jpgभारत सरकार ने देश को दैवीय आपदाओं के प्रभव से बचाने अथवा उनके प्रभाव को कम करने के उद्देश्य से डिजास्टर मैनेज मेन्ट डिपार्टमेन्ट की स्थापना की है जो देश के किसी भी भाग में बाढ, सूखा, भूस्खलन या भूकम्प से बचाने या उसके प्रभाव को कम करने की जिम्मेदारी सम्भालता है। किसी भी आपदा के प्रवन्धन का पहला चरण है उस आपदा की पूर्व जानकारी और इसके लिए भरत सरकार नें अर्लीवार्निं सिस्टम की स्थापना कर रखी है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि हमारा जैसा अर्लीवार्निन सिस्टम दुनियां में और कहीं नहीं है।

लेकिन सूखे के सन्दर्भों में तो सरकारी अर्लीवार्निंग सिस्टम यानी हमारा मौसम विभाग हमेशा ही औंधे मुंह ही गिरता है। मौसम विभाग द्वारा पिछले एक महीने में की गयी दो अलग अलग घोषणाओं पर ही नजर डालें तो उसकी कलई खुल जाती है। माह मई के अन्तिम सप्ताह में उसने घोशित किया कि इस वर्ष औसत से अधिक और समय से एक सप्ताह पूर्व ही वर्षा होगी, लेकिन जब समय पर भी वर्षा नहीं हुई तो गलती के कारणों को बिना बताए ही दुबारा घोषणा जून के अरन्तम सप्ताह में कर दी कि अब सूखा पडने की पूरी सम्भावना है तथा मानसून 15 दिन विलम्ब से चल रहा है।

लेकिन जिन पर सूखे का असर कहर बन कर टूटता है वह तो अपनी फसल की कटाई करते करते ही जान गए थे कि इस साल भी इन्द्र देव का मिजाज गरम ही रहेगा, और इसके लिए जितना उनके बस में है उतनी तैयारी भी करली थी। लेकिन दसाब्दियों से सूखे की मार झेल रहे किसान के पास अब बचा ही क्या है जिससे वह अब बचाव कर सकेगा। उसके पास नतो कम पानी में पैदा होने वाले बीज बचे हैं और नाही खेत में पानी संचित कर लेने वाली बन्धियां। उसके पास नतो मिश्रत फसलचक्र बचा है नाही उसके साथी पशु और उनकी खाद, पास बचा है तो बस पुरखों द्वारा दिया गया ज्ञान वह भी केवल इस लिए बच गया चूकिं कम पढा लिखा होने के कारण वैज्ञानिकों के ज्ञान तक पहुंच नहीं पाया।

अपने इस पारम्परिक ज्ञान के बल बूते किसान सूखे जैसी आपदा के साथ संघर्श ही नहीं कर रहे बल्कि उसमें विजय हासिल करते भी नजर आ रहे हैं। ऐसा भी नहीं कि यह पारम्परिक ज्ञान कुछ गांवों के कुछ लोगों के ही पास सीमित हो, बल्कि यह ज्ञान तो हर गांव के दस पचीस लोगों के पास है जो उन्हे उनके पूर्वजों के द्वारा किम्बदन्तियों कहावतों के रुप में प्राप्त हुआ है। चूंकि यह ज्ञान उनके खानदान को अलग से सामाजिक पहचान देता था अतः वह दसे सम्भाल कर रखते थे और समय समय पर दसका परिमार्जन भी करते थे।

लेकिन रीति-रिवाज, परम्पराओं-प्रथाओं, सभ्यता-संस्कृति तथा रुढियों और कुरीतियों में विभेद की समझ बनाए बिना ही तथा कथित वैज्ञानिक मानसिकता ने हमारे सदियों से परिक्षित इस ज्ञान का उपहास उडाया, सीधे और सरीफ किसान इन तथा कथित वैज्ञानिकों को भी सन्यासी समझने की भूल कर बैठे उन्हें क्या पता कि वैज्ञानिकों के वेश वह किसी कम्पनी के सेल्समैन हैं। फिर क्या था किसानों ने इन सेल्स मैनों के इसारे पर अपने उस ज्ञान को विस्म्रित कर दिया, और इसी के साथ ही सूखे की विभीशिका का असर भी अधिक दिखने लगा। इस लिए कि सेल्स मैनों की यह प्रडाली खर्चीली ही नहीं धोखेबाज भी है।

डिजास्टर मैनेजमेन्ट केलिए, लागों द्वारा, लोगों केलिए बिना खर्चे के अर्लीवानिंग सिस्टम के ऊपर सेल्समैनों द्वारा, कम्पनियों केलिए करोडों रुपए लाभ का यह अर्लीवार्निं सिस्टम लाद दिया गया। कोशिशें तो बहुतेरी की गयी लेकिन लोगों के अर्लीवार्निं सिस्टम को आज भी पूरी तरह से खतम नहीं किया जा सका। इसके अवशेष तो हर गांव में मिल जायगें लेकिन हमीरपुर जिले की तहसील मौदहा के एक गांव अकबई में डिजास्टर मैनेजमेंन्ट केलिए केवल अर्लीवार्निंग सिस्टम ही नहीं बल्कि पारम्परिक ज्ञान पर आधारित उसके सभी चरण प्रत्यक्ष रुप में विद्यमान हैं।

अकबई के लोग रवी फसल की कटाई शुरु करते अगले साल के मौसम का अनुमान लगाना शुरु कर देते हैं। फसल की कटाई पूरी करते करते लोग मय कर लेते हैं कि अगला मौसम कैसा होगा, अतिवृष्टि, अनावृष्टि, ओला, पाला या फिर इस वर्ष किस प्रकार के कीट पतिंगों का प्रकोप होने वाला है। बस फिर क्या है अगर किसान को इतना पता चलजाय। इसके बाद किसान मिजुलकर तय करते हैं कि किस तरह के बीजों का बोना उपयुक्त होगा, मिश्रित फसलों में कौन कौन सी फसलें शामिल की जानी चाहिए। फसल अगैती बोई जाय या पिछैती। इस प्रकार किसान किसी भी आपदा के समय भी किसान अपने खनें खर्वे केलिए अनाज पैदा हीकर लेता है।


  Bundelkhand
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2010.09.03 06:42:37
rawat167

बुदेलखंड पर योजना आयोग की आठ को अहम बैठक

नयी दिल्ली। राजनैतिक दृष्टि से संवेदनशील तथा सूखे की मार झेल रहे बुदेलखंड क्षेत्र में सूखे से निबटने की नीतियों के प्रभावी क्रियान्वयन के लिये योजना आयोग द्वारा नवगठित सलाहकार समिति की पहली महत्वपूर्ण बैठक आठ सितंबर को राजधानी में होगी। 

गठन के साथ ही राजनैतिक विवाद में घिर गई समिति की पहली बैठक में चर्चित बुदेलखंड पैकेज के मद्देनजर इन योजनाओं की प्रगति का जायजा लेने क्षेत्र के विकास के लिये बहुआयामी नीतियां बनाने तथा क्षेत्र से सम्बद्ध राज्य सरकारों.मध्य प्रदेश एवं उत्तर प्रदेश की भागीदारी . नयी नीतियां बनाये जाने सहित तमाम मुद्दों पर व्यापक चर्चा की जायेगी। योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया समिति के अध्यक्ष हैं। बुदेलखंड क्षेत्र से सांसद तथा इस समिति के सदस्य केंद्रीय ग्रामीण विकास राज्यमंत्री प्रदीप जैन आदित्य ने कहा कि अत्यंत पिछडा बुंदेलखंड क्षेत्र वर्षों से उपेक्षित रहा है। इस समिति का गठन क्षेत्र को सूखे से उबारकर इसके त्वरित सर्वांगीण विकास की मंशा से किया गया है। इसमें किसी प्रकार की राजनीति ढुंढना कतई अनुचित है और वैसे भी विकास के नाम पर राजनीति करना कभी भी कांग्रेस का एजेंडा नहीं रहा। उन्होंने कहा कि उपेक्षित बुंदेलखंड में आम आदमी और किसान की दुर्दशा को देख राहुल गांधी ने वहां के विकास का.विजन. देखा और केंद्र ने भी क्षेत्र के विकास के लिये 7266 करोड रूपये का बुंदेलखंड पैकेज दिया। ऐसे में अगर योजना आयोग क्षेत्र के सभी दलों के सांसदों को साथ लेकर वहां की विकास योजनाओं के प्रभावी तथा पारदर्शी क्रियान्वयन के लिये कोई समिति बनाता है तो इससे किसी को भी ऐतराज आखिर कैसे हो सकता है।

गौरतलब है कि गत 30 अगस्त को एक सरकारी आदेश के तहत गठित इस पंद्रह सदस्यीय समिति में कांग्रेस सहित क्षेत्र के सभी दलों के सांसद भी शामिल हैं।  श्री जैन ने कहा कि समिति के जरिए क्षेत्र के विकास में सभी दलों के सांसदों की महत्वपूर्ण भूमिका रहेगी। लेकिन विपक्ष का आरोप है कि कांग्रेस ने मध्यप्रदेश तथा उत्तर प्रदेश सरकारों को पैकेज के लाभ का सेहरा नहीं लेने देने की मंशा से यह चतुराई भरा कदम उठाया है। कांग्रेस सूत्रों के अनुसार दरअसल दोनों राज्य सरकारें पैकेज के फंड का सही इस्तेमाल नहीं कर रही थीं और इसके बारे में काफी शिकायतें भी आ रही थीं। ऐसे में अगर इन्हीं राज्य सरकारों के दलों के सांसदों को समिति में शामिल करके कार्यक्रमों के क्रियान्वयन को पारदर्शी बनाने की कोशिश की गई है तो आपत्ति क्यों है। 

समिति में श्री जैन के अलावा केन्द्रीय योजना मंत्री वी नारायण सामी, बहुजन समाजपार्टी के आर.के. सिंह पटेल एवं विजय बहादुर, समाजवादी पार्टी के घनश्याम अनुरागी तथा भारतीय जनता पार्टी के अशोक अर्गल तथा जितेन्द्र सिंह बुंदेला भी शामिल है। श्री जैन ने कहा कि दरअसल विकास केन्द्र के साथ साथ राज्यों की सहभागिता से ही संभव है लेकिन दुख की बात है कि बुंदेलखंड वर्षो से सूखे की मार झेल रहा है। विकास यहां अछूता ही रह गया है। क्षेत्र में पर्यटन की आपार संभावनाएं है जिससे काफी लोगों को रोजगार मिल सकता है। लेकिन दोनों राज्य सरकारों ने क्षेत्र की उपेक्षा की जिससे क्षेत्र की स्थिति बद से बदतर होती गई। राज्य सरकारों ने जो योजनाएं बनायी थी उनके क्रियान्वयन से कहीं ज्यादा उनका ध्यान राजनीतिक फायदा लेने का रहा। ऐसे में अब अगर क्षेत्र में स्थिति सुधारने के लिए सरकार बुंदेलखंड पैकेज के बाद और प्रभावी कदम उठा रही है तो उनका सभी को स्वागत करना चाहिए। 


  Bundelkhand | Panel on Bundelkand to meet soon | Planning Commission on bundelkhand
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2010.08.20 13:04:09
kpt

We want solved water problem in bundelkhand and its solution.

बुंदेलखंड में टीकमगढ़ और छतरपुर जिले को यदि सरकार रोटी पानी देना चाहती है,यहाँ के लोगों का विकास करना चाहती है और आगे के नौजवान बच्चों,आने वाली पीढ़ियों को आत्मनिर्भय बनाना चाहती है तो पंजीरी खिलाने और रहत कार्यों की भूरसी बाँटने से उत्तम रहेगा और लोगों को सदैव के लिए पानी रोटी के अभाव से मुक्ति दिलाने के लिए विकास के नाम पर केवल एक ही योजना की जरूरत है कि बुंदेलखंड में टीकमगढ़ छतरपुर आदि कि छोटी बड़ी नदियों के बांध बना दिए जाएँ चाहे वो विशाल झीलों के रूप में ही क्यों न बने हों और उनसे दोनों जिलों में मुख्या नाहर निकल कर उनसे छोटी शाखा नहरें बनाकर क्षेत्र के तालाबों से जोड़ दिया जाये ताकि जब बांधों वाली नदियों में बाढ़ ए तो वह बाद का पानी आगे न जाकर नहरों से बिभाजित होकर क्षेत्र के सरे तालाबों को भर देगा ! जब पानी होगा तो कृषि विकसित होगी लोगों का रोटी और रोजगार के लिए क्षेत्र से जाना बंद हो जायेगा क्योंकि रोटी खेत से पैदा होती है न कि कारखाने और अन्य स्थान से नहीं !

रोटी को पैदा करने कि लिए सिचाई के जल कि आवश्यकता है जिसके लिए सदियों से बुंदेलखंड का किशन परेसान है ! यदि पानी का भरपूर प्रबंध कर दिया जाता है तो सारी समस्याओं का समाधान स्वमेब हो जायेगा!

अनेक क्षेत्रों में थोडा थोडा से विकास सरकारी खजाने की बर्बादी के सिवा कुछ नहीं है क्योंकि उससे न तो विकास दीखता है और न ही रोटी होती है और न रोजगार !
उपाय :

पानी के प्रबंध के लिए धसान नदी पर वरापटा पर बांध बनाना उपयुक्त रहेगा क्योंकि केवल २०० मी. बांध बनना है और दोनों तरफ ऊँचे ऊँचे पहाड़ है केवल नदी पर ही पक्का बांध बनना है इस पर चाहे कितना भी पैसा लगे २०० मी.पक्का ऊँचा बांध बन जाने से छतरपुर और टीकमगढ़ के सभी लोगों की सभी समस्याओं का समाधान हो जायेगा ! क्योंकि पानी का प्रबंध मुख्या है वही जीवन है !

डॉ.काशीप्रसाद त्रिपाठी
टीकमगढ़
  bundelkhand water problem | Bundelkhand
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2010.08.19 08:28:06
sanjaypanday

विदर्भ नहीं , बुंदेलखंड के किसानों पर बनी है आमिर की “पीपली लाइव” : संजय पाण्डेय

नई दिल्ली । बुंदेलखंड एकीकृत पार्टी के संयोजक संजय पाण्डेय के अनुसार आमिर खान की हाल ही में रिलीज हुई फिल्म “पीपली लाइव” विदर्भ नहीं बल्कि बुन्देलखंड के किसानो को लेकर बनी है। बुंदेलखंड के रायसेन जिले के बडवाई गाँव में फिल्माई गई इस फिल्म में बुन्देली संस्कृति तथा रहन सहन के साथ साथ पूरी तरह बुन्देली बोली ही प्रयुक्त की गयी है । उदाहारण के लिए नत्था की पत्नी धनिया अपने जेठ बुधिया से पूछती है ” काये कछू भओ का आज ?” तो उत्तर में बुधिया कहता है कि ” पईसा तौ मिले नैयाँ ” । कहने का तात्पर्य पात्रों के बीच बातचीत में ठेठ बुन्देली ही प्रयुक्त की गयी है। इतना ही नहीं बुंदेलखंड को लेकर केंद्र तथा राज्य सरकारों के बीच जो वाकयुद्ध पिछले कुछ वर्षों से चल रहा है उसको भी इस फिल्म में भी पूरी तरह समाहित किया गया है । “महगाई मारें जात है ” नामक चर्चित गाना बुन्देली साज-बाज के साथ गाया गया एक बुन्देली लोक गीत है । उल्लेखनीय है कि पिछले पॉँच वर्षों के दौरान बुन्देलखण्ड में लाखों किसान सूखे से प्रभावित हुए थे। इसके चलते यहाँ से भारी पलायन तथा भुखमरी के साथ साथ किसानों द्वारा आत्म हत्याओं की ख़बरें देश दुनिया तक पहुंची थी । इसी विषय को लेकर आमिर खान ने “पीपली लाइव” फिल्म बना डाली। किन्तु फिल्म में बुन्देलखंड के किसानों के हालातों का प्रस्तुतीकरण निंदनीय है।


  बुंदेलखंड | Bundelkhand | sanjay panday | peepli live 2010
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2010.08.13 10:45:33
naveen

महेंद्र सागर तालाब में सुधार के नाम पर सरकार से किया गया धोखा !

टीकमगढ़ जिले के महेंद्र सारगर तालाब में सुधार और पानी बदने को लेकर किया गया सारा काम बर्बाद होने की कगार पर है मध्य प्रदेश सरकार ने महेंद्र सागर तालाब में गहरीकरण के नाम पर लाखों रूपए सरकार से लिया लकिन सरकार को या बताना भूल गए की महेंद्र सागर तालाब में पानी का आने का साधन क्या है  में लोगों का ध्यान इस तरफ लगाना चाहूँगा की टीकमगढ़ का महेंद्र सागर तालाब ऊँचाई पर बना हुआ है जिससे तालाब में टीकमगढ़ जिले का पानी नहीं आता ! परन्तु सरकार ने इस बात पर ध्यान नहीं दिया की कहाँ क्या करवाना जरूरी है जिससे टीकमगढ़ के महेंद्र सागर तालाब में लबालब पानी हो जाये क्योंकि अभी पिछले ५ साल से टीकमगढ़ के तालाब का पानी सुख रहा है परन्तु सब ने इस बात का रोना रोया की टीकमगढ़ जिले में बरसात नहीं होती है जबकि सही कारन की तरफ न तो सरकार का ध्यान गया और न ही लोगों का और न ही किसी राजनितिक पार्टी का !

अगर टीकमगढ़ के तालाब के अस्तित्वा को बचाना है और उसका वही प्राकतिक सोंदर्य देखना चाहते हैं तो हमारे द्वारा दिया जाने वाले समाधान पर सरकार को और राजनीतिक पार्टी को या टीकमगढ़ के लोगों को विचार करना पड़ेगा !

इसलिए में अपनी बात को अब बताना चाहूँगा की आखिर टीकमगढ़ का तालाब अपना असितत्व क्यों खो रहा है ?

टीकमगढ़ के तालाब महेंद्र सागर तालाब में पानी आने का एक मात्र साधन पठा का बड़ा तालाब है जिसके पूरा भर जाने पर उस तालाब से पानी बाहर निकलकर टीकमगढ़ के महेंद्र सागर तालाब को भरता था , परन्तु अब उस तालाब पर चेक बनाया जा चूका है जो करीब ४-५ साल पहले बनाया गया था तब से आज तक टीकमगढ़ महेंद्र सागर तालाब में पानी नहीं आया और अब और अब महेंद्र सागर तालाब अपने  पूरे अस्तित्व को खोता जा रहा है और अगर इस बात पर जिला सरकार द्वारा कोई कार्यवाही नहीं हुई तो टीकमगढ़ तालाब अतीत के पन्नो में रह जायेगा की कभी वो भरता था !
जबकि अगर उस चेक डेम को नहीं तोडा गया तो कभी भी पठा गावं में इस तालाब के टूटने का दर बना रहेगा जिससे उस तालाब के आस पास के कई मोहल्ले पानी की चपेट में आ जायेंगे !

 


  mahendra sagar talab tikamgarh
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2010.07.27 09:24:48
vjoshi09

 

I SUGGEST THE NAME OF SAGAR MEDICAL COLLEGE IS "SANGEETA NARAD -BUNDELKHAND MEDICAL COLLEGE, SAGAR

BECAUSE

KU. SANGEETA NARAD WAS A BRILLIANT SCIENCE STUDENT DURING 1982-1984. IN 1985, HE WAS DIED ON A ROAD ACCIDENT  FROM RETURNING HOME.

 

AFTER HER DEATH, THE UNIVERSITY OF SAGAR STARTED SOME FELLOWSHIPS IN SCIENCE FACUILTY FROM 1986

 

I INVITE YOUR THOUGHT ABOUT THIS SUBJECT AND SEND YOUR COMMNET ON MY BELOW MENTIONED ADDRESS

 

VAESHA JOSHI

VARDHAMN HOSTEL

EB 303, SCH 94, 

OPP. BOMBAY HOSPITAL

INDORE 

 


  
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2010.07.27 07:37:45
rawat167

khajuraho ignored by the state goverment

कुंभकर्णी नींद में संस्कृति विभाग के अफसर, कैलेंडर से गायब खजुराहो महोत्सव, लोकरंग को भी भूले

खजुराहो मध्य प्रदेश की संस्कृति विभाग की वेबसाइट पर आज भी नहीं 

मध्यप्रदेश सरकार और महकमे के मंत्री भले ही राज्य की संस्कृति को विश्व मंच पर देखने की इच्छा रखते हों, लेकिन अधिकारी उनका सपना तोड़ने पर आमादा हैं. इसका ताजा प्रमाण है संस्कृति विभाग की वेबसाइट जो पिछले दो साल से अपडेट ही नहीं की गई है. लाखों रुपये की पगार पाने वाला महकमा अपने फर्ज़ को लेकर कितना गंभीर है, इसकी बानगी देखनी हो तो ज़रा www.mpculture.in पर क्लिक करके देखिये... अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त खजुराहो महोत्सव आपको ढूँढे नहीं मिलेगा. इससे पहले अपनी स्थापना के पच्चीस साल पूरे करने वाला लोकरंग महोत्सव भी अफसरों की नींद नहीं खोल पाया था और विभाग की वेबसाइट पर देश-दुनिया के कलाप्रेमी इस बड़े आयोजन से रूबरु नहीं हो सके. मध्यप्रदेश शासन के संस्कृति विभाग की आधिकारिक वेबसाइट www.mpculture.in पर सांस्कृतिक आयोजनों को दर्शाने वाला कला पंचांग तो मौजूद है, लेकिन दरअसल विभाग के अफसरों ने साल 2008 में हुए अंतर्राष्ट्रीय रामलीला महोत्सव के बाद के किसी आयोजन की सुध लेना ज़रूरी नहीं समझा और इसके बाद के तमाम आयोजनों के बारे में इस वेबसाइट पर कोई जानकारी मौजूद नहीं है. सांस्कृतिक आयोजनों पर करोड़ों रुपये खर्च करने के बावज़ूद विभाग की वेबसाइट पर ही उनका प्रचार-प्रसार नहीं किया जाना ये साबित करता है कि अफसर अपने कर्तव्य के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति ही कर रहे हैं. ऐसे में एक सवाल विभाग के मुखिया के सामने भी है कि क्या ऐसे गैर ज़िम्मेदार अमले के बूते ही प्रदेश की संस्कृति विश्व पटल तक पहुँच पायेगी…?

http://www.mpculture.in/html/khajuraho.asp

 


  khajuraho | Bundelkhand | chhatarpur
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2010.07.14 05:38:36
rawat167

बुंदेलखंड में सोने के भंडार का पता चला

नई दिल्ली | वर्षो से सूखे की मार झेलता रहा बुंदेलखंड सोना भी उगल सकता है। इस सूखी मिट्टी के शुरुआती लक्षण और परीक्षण पूरी तरह ठीक निकले तो यह क्षेत्र कीमती धातु सोने के लिए भी जाना जाएगा। बुंदेलखंड के ललितपुर जिले में सोने के भंडार का पता चला है। सब कुछ ठीक रहा तो आने वाले दो-तीन वर्षो में बुंदेलखंड का यह इलाका उत्तर प्रदेश में सोने के सबसे बड़े भंडार के लिए मशहूर होगा। उत्तर प्रदेश खनन विभाग को ललितपुर से 90 किलोमीटर दूर गिरार गांव में जमीन से 290 मीटर नीचे सोने के भंडार का पता चला है। यहां से निकले सोने का विस्तृत ब्योरा जानने के लिए उत्तर प्रदेश खनन विभाग ने कनाडियाई कंपनी मैक्सटेक रिसोर्सेस लिमिटेड के साथ दो वर्षो के लिए एक सहमति पत्र (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए हैं।

राज्य सरकार से मिले रिकानिसंस परमिट (आरपी) के तहत यह कंपनी सोने की गुणवत्ता और भंडार खोजने के लिए 67 करोड़ रुपये खर्च करेगी। इसी के तहत सोने के भंडार क्षेत्र की एरियल मैपिंग, सरफेस सैंपलिंग की जाएगी। खनन विभाग को सोनभद्र जिले में भी सोने के भंडार का पता चला है। शुरुआती जानकारियों के मुताबिक यहां सोने की मात्रा बुंदेलखंड क्षेत्र से कम होने के कयास लगाए जा रहे हैं। दैनिक जागरण से बातचीत में उत्तर प्रदेश के जियोलॉजी व माइनिंग विभाग में सलाहकार एसए ़फारुकी ने बताया कि गिरार गांव में सोने के भंडार का पता चला है। सोने की खोज 3.5 किलोमीटर लंबे व 300-400 मीटर चौड़े क्षेत्रफल में हुई है। यहां से 0.5 ग्राम प्रति टन से 13.5 ग्राम प्रति टन (एक टन मिट्टी से प्राप्त होने वाली सोने की मात्रा) की गुणवत्ता वाला सोना मिलने की संभावना है। फिलहाल, इससे ज्यादा कुछ कहना जल्दबाजी होगी। यूनाइटेड नेशन फे्रमवर्क क्लासीफिकेशन (यूएनएफसी) प्रणाली के तहत अप्रैल, 2005 तक भारत में 390.29 मिलियन टन सोने के अयस्क (स्वर्ण युक्त मिट्टी) का अनुमान लगाया गया है। इसमें 1.925 करोड़ टन को सुरक्षित श्रेणी में रखा गया। जबकि 37.104 करोड़ टन को बचे हुए संसाधनों को श्रेणी में रखा गया है। अयस्क के रूप में सोने का भंडार बिहार, कर्नाटक, राजस्थान पश्चिम बंगाल, आंध प्रदेश, केरल और मध्य प्रदेश में मिला है।

सबसे ज्यादा स्वर्ण घनत्व वाला अयस्क कर्नाटक, राजस्थान, पश्चिम बंगाल, बिहार और आंध्र प्रदेश में मिला है। देश में सोने का भंडार पता लगाने के लिए भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (जीएसआई) ने उत्तर प्रदेश, झारखंड, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, राजस्थान, कर्नाटक, केरल में काम शुरू किया था। इस दौरान मिनिरल एक्स्प्लोरेशन कॉरपोरेशन लिमिटेड ने झारखंड, मध्य प्रदेश और राजस्थान में जबकि हुट्टी गोल्ड माइंस कंपनी ने कर्नाटक के रायचूर जिले में सोने का उत्खनन किया था। वैसे दुनिया में ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, चीन, पेरू, कनाडा और इंडोनेशिया में सोने के बेहतर भंडार मौजूद हैं। सोने का उपयोग आमतौर पर सोने का इस्तेमाल आभूषण बनाने में किया जाता है।

अब सोने ने इलेक्ट्रॉनिक्स में जगह बनानी शुरू कर दी है। इंडियन ब्यूरो ऑफ माइंस के मुताबिक सोने की 85 फीसदी खपत आभूषणों में होती है। जबकि इलेक्ट्रानिक्स में छह फीसदी और गिन्नियों में दो फीसदी खपत होती है। प्लैटिनम और पैलेडियम को सोने के विकल्प के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है। परंतु इनकी कीमत सोने से अधिक होने के कारण इनका इस्तेमाल कम ही है।


  Bundelkhand | gold in lalitpur | Bundelkhand mineral wealth | bundelkhand khanij sampada
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2010.07.07 12:00:23
rawat167

बुंदेलखंड में फिर से अकाल की संभावना :

बुंदेलखंड में पानी की समस्या हर साल बदती जा रही है परन्तु बुंदेलखंड के लोग आज भी राजनीति का मुंह देख रहे है की वो बुंदेलखंड के विकास करेंगे , नहीं !

बुंदेलखंड के लोगों से में प्रमोद रावत प्रार्थना करता हूँ की अपने पर्यावरण को बचाएं बुंदेलखंड का प्रत्येक व्यक्ति पेड़ पोधे लगाये जिससे बुंदेलखंड में पर्यावरण संतुलन बन जाये में राजनीतिक पार्टियों से यही अनुरोध है की बस बुंदेलखंड में कोई पेड़ पोधे लगाने की योजना बनाये जिससे लोग उनको लगायें और पेड़ पोधों को बचाने का प्रयास करें न की उनको  काटें जिस तरह का संरक्षण मध्यप्रदेश सरकार और उत्तरप्रदेश सरकार जंगली जानवरों को बचाने के लिए नए नए उपाय चलती है उसी तरह बुंदेलखंड में जंगलों को बचाना चाहिए !

जो तालाब  बुंदेलखंड में चंदेलकालीन है उनको फिर से नया रूप देना चाहिए और जो तालाब खत्म हो चुके हैं उनको फिर से बनाना चाहिए !

क्योंकि बुंदेलखंड में पानी की समस्या आज से नहीं वर्षों से चली आ रही है इसलिए बुंदेलखंड में पानी रोकने के लिए चंदेलकालीन राजाओं ने बहुत अच्छी प्रनाड़ी बना रखी थी जिसके तहत अगर किसी तालाब का पानी बाहर भी जाता है तो वो आगे जाकर किसी दूसरे तालाब को भर देता था लेकिन वो तालाब आज या तो खत्म हो गए हैं या उन पर लोगों द्वारा खेती की जा रही है !

राज्य और भारत सरकार को चाहिए की उन तालाबों की जानकारी ले कर उन तालाबों का पुनरोद्धार किया जाना चाहिए न की बलराम सागर और अन्य तरह के तालाब बनाने की योजना बनाना चाहिए !

क्योंकि इन योजनाओं का फायदा केवल गावं के सरपंचों और प्रधानो को मिल रहा है क्यों जिन लोगों के पास कुछ भी नहीं था आज वो लोग ४ पहिये वहां लेकर घूम रहे है और न तो किसी तलब का निर्माण होता है और न ही उसका फायदा गावों के लोगों को मिलता है !

अगर सरकार किसी तरह का १ अभियान चलाये और उसमे पता लगाये की किसी सरपंच या प्रधान पद पर आने से पहले उसके परिवार के पास कितनी संपत्ति थी  और ५ साल बाद उसके परिवार के पास कितनी संपत्ति है  तो सारी बात सामने आ जाएगी !

 


  Bundelkhand | बुंदेलखंड | water Problem in bundelkhand | bundelkhand me akal
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2010.07.07 10:44:09
rawat167

bundelkhand,politics on bundelkhand

बुंदेलखंड को लेकर उत्तर प्रदेश में फिर राजनीति गरमा गयी है. बुदेलखंड के लिए पैकेज देने के कांग्रेस के दांव के बाद दूसरे दल कांग्रेस को पटखनी देने की जुगत में हैं. कांग्रेस और सपा तो लगातार इसे सियासी पैकेज साबित करने में जुटी है, जबकि बुंदेलखंड मसले पर भाजपा किस करवट बैठेगी ये अभी साफ़ नहीं है....

ये कहने में कोई गुरेज़ नहीं है कि बुंदेलखंड पर दिल्ली की सरकार के पैकेज घोषित करने के बाद से उत्तर प्रदेश की राजनीति में भूचाल आ गया है. कांग्रेस ने बुंदेलखंड पर अपना दांव चल दिया है तो सपा-बसपा इस दांव को उलटा करने में जुट गयी है. कांग्रेस नेता इस पैकेज के बाद बुंदेलखंड में पार्टी को खड़ा करने के सपने सजोने लगे हैं. कांग्रेस नेताओं को लगता है कि बुंदेलखंड के बहाने उन्हें एक बड़ा हथियार मिल गया है. कांग्रेस के वरिष्ठ नेता प्रमोद तिवारी का मानना है कि राहुल गांधी उस इलाके कि समस्याओं से खुद रूबरू हुए थे, जो दस सालों से उपेक्षित था, अब अगर बसपा को लग रहा है कि ये पैकेज कम है तो क्यों नहीं बसपा राज्य के बजट से उस कमी को पूरा करके बुंदेलखंड के लिए काम करती.

इसके पलटवार में बहुजन समाज पार्टी का कहना है कि आधी-अधूरी धनराशि का पैकेज घोषित कर इस इलाके की बदहाली के लिए कांग्रेस जिम्मेदारी से बच नहीं सकती। बसपा नेता स्वामी प्रसाद मौर्या कहते हैं कि कांग्रेसी इसको लेकर राहुल गांधी के महिमामंडन में जुटे हैं, उन्हें बुंदेलखंड की समस्याओं से कुछ लेना-देना नहीं है. श्री मौर्या का कहना है कि बुन्देलखण्ड की जनता ने झांसी और ललितपुर के विधानसभा उपचुनाव में बसपा को जिता के बता दिया है कि वो किसके साथ है. इस हार के बाद ही कांग्रेस को पैकेज की याद आयी.
कुछ इसी तरह की बातें सपा भी कर रही है. सपा बुंदेलखंड पर कांग्रेस की राजनीति आलोचना कर रही है तो बसपा को भी आड़े हाथों ले रही है. सपा प्रवक्ता राजेन्द्र चौधरी का कहना है कि ये सब वोट बैंक के लिए हो रहा है न कि बुंदेलखंड की जनता के भले के लिए.
जबकि भारतीय जनता पार्टी इस मसले पर अपना रुख तय नहीं कर पायी है. वो इस पैकेज के बहाने केंद्र और राज्य दोनों पर निशाना साधना चाहती है. वरिष्ठ भाजपा नेता मुरली मनोहर जोशी का कहना है कि अगर वाकई ये जनता के भले के लिए है तो अच्छी बात है लेकिन अगर इसमें राजनीति की गंध आती हो तो ये ठीक नहीं है. क्योंकि बुंदेलखंड की समस्याओं पर गंभीरता से सोचने की जरूरत है. बहरहाल ये साफ़ नज़र आ रहा है कि सभी दल अपनी रणनीति २०१२ के विधानसभा चुनाव को लेकर बना रहे हैं. सबकी कोशिश है कि किसी तरह से बुंदेलखंड की जनता को खुश कर लिया जाए.


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  Bundelkhand | बुंदेलखंड
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