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मैं अपीलार्थी अरुण कुमार शर्मा द्वारा सुचना के अधिकार के अंतर्गत दिनांक 22-12-2011 को लोक सुचना अधिकारी उपसंचालक कृषि कल्याण एवं कृषि विभाग को सुचना के अधिकार 2005 के नियम 6/1 के तहत निम्न जानकारी चाही गई। विषय:- जे आर हेडाउ उपसंचालक कृषि टीकमगढ़ का जाति प्रमाणपत्र चाहने वावत् 1 परिशिष्ठ एक नियम क्र 3 अनुसार अनुविभागीय अधिकारी राजस्व द्वारा जारी प्रमाण पत्र कर सत्य प्रमाणित प्रतिलिपि। 2 दिनांक 10-08-1950 को या उसके पूर्व जे आर हेडाउ के माता पिता का स्थाई निवास का पता नगर पटवारी हल्का एवं तहसील जिला इत्यादि का पता मय प्रमाणित अभिलेख के। 3 जे आर हेडाउ की जाति/जनजाति/उपजाति का प्रमाण पत्र। 4 शासकीय संवा में आने के पूर्व जे आर हेडाउ के माता पिता द्वारा जनजाति का प्रमाण पत्र क्या प्राप्त किया था। 5 संविधान के अनुच्छेद 341 के अधीन मप्र के राज्य के संबंध में अनूसूचित जनजाति के रुप में किस जिले से इन्हें विनिर्दिष्ठ किया। 6 अनुसूचित जनजाति संशोधित अधिनियम 1976 के अंतर्गत मप्र राज्य की सूची में हेडाउ जाति का अनुक्रमांक कितने पर अंकित है। 7 सेवा अभिलेखानुसार क्या इनका जाति प्रमाण पत्र प्राधिकृत अधिकारी द्वारा परिशिष्ठ चार के नियम 8/2 अनुुसार अस्थायी प्रमाण पत्र जारी किया गया था यदि हां तो क्यों। 8 क्या जे आर हेडाउ का परिशिष्ठ तीन नियम क्रमांक 8/1 अनुसार प्रमाणिकरण अधिकारी राजस्व द्वारा तहसीलदार द्वारा जारी प्रमाणपत्र या अनुविभागीय अधिकारी द्वारा जारी प्रमाणपत्र का प्रमाणीकरण किया गया है। यदि हां तो स्पष्टतौर पर अनुभाग जिला प्रदेश पुस्तक क्रमांक का हवाला देकर जारी प्रमाणपत्र की प्रमाणित प्रतिलिपि दिलाने की क्पा हो। नहीं तो फर्जी प्रमाणपत्र अनुसार शासन के नियमों की अनदेखी कर फर्जीतौर पर शासन की सेवा में किस आधार पर है। जो आज दिनांक तक जानकारी प्राप्त नहीं हुई। आवेदक अरुण कुमार शर्मा तालदरवाजा टीकमगढ़
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बुंदेलखंड के विकास के बारे में जो देश के नेता चुनाव के दोरान बादे करते हैं उनको चुनाव के बाद बहाल आने की अपनी आदत को भी बहुत अछि तरह से याद रखते हैं जैसे अभी चुनाव प्रचार के दौरान प्रियंका गाँधी ने कहा के बे बर्शाती मेंढक है वो ही नियम सरे राजनेताओ पर लागु होता है और एक बार चुनाव जीत आने के बाद वो केवल अपने और अपने परिवार के विकास के योजनाओ के बारे में ही सोचते हैं ऐसे में बुंदेलखंड का विकास हो या न हो ! अगर मध्य प्रदेश की बात करें तो सत्यब्रत चतुर्वेदी जो कांग्रेस में बहुत बड़े नेता है लकिन आज तक को ऐसी योजने नहीं आई जो बुंदेलखंड के विकास को बनती हो बुंदेलखंड के विकास में आने बाला पैसा या तो बुंदेलखंड के नेता खा गए या फिर विचोलियों ने खा लिया लकिन आज तक यहाँ का विकास न तो देखने को मिला है और न ही आज तक कोई नेता देखा है और यहाँ के विकास के बारे में सोचता हो! मै अगर उमा भारती की बात करूँ तो वो भी मध्य प्रदेश के मुख्य मंत्री रह चुकी लकिन आज तक बुंदेलखंड के विकास का नामो निशान तक नहीं है ! अगर बुंदेलखंड का विकास यहाँ के लोग सच मै देखना चाहते हैं तो उनको बुंदेलखंड के विकास मै आने बाले पैसे को केवल यहाँ के विकाश को लगाना होगा लोगों को अपने घर को भरने की विचार धरा बदलनी होगी भ्रस्टाचार और कालाबाजारी को रोकना होगा ! मेरा मानना ये है की बुंदेलखंड मै अपार मात्रा मै खनिज है लेकिन उनका फायदा भी दुसरे राज्यों को मिल रहा है ! इस बारे मै भी बुंदेलखंड के राजनेताओ को सोचना होगा तभी जाकर बुंदेलखंड विस्का के पथ पर आगे बढेगा !
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MANGA - bundelkhand ka hasya pradhan khand kavya
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बुंदेलखण्ड के लिए विशेष पैकेज पर राज्यसभा में हंगामा नई दिल्ली, 18 अगस्त : बुंदेलखण्ड के लिए विशेष पैकेज को लेकर विपक्षी दलों ने गुरुवार को राज्यसभा में भारी हंगामा किया, जिसके कारण थोड़ी देर के लिए सदन की कार्यवाही स्थगित करनी पड़ी। विपक्षी दलों का आरोप है कि केंद्र सरकार ने बुंदेलखण्ड के लिए जिस विशेष पैकेज की घोषणा की है, उसकी राशि वास्तव में केंद्र सरकार की विभिन्न योजनाओं में मिला दी गई है। बहुजन समाज पार्टी (बसपा), भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) और समाजवादी पार्टी (सपा) ने आरोप लगाया कि प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने बुंदेलखण्ड के लिए 7,266 करोड़ रुपये के जिस पैकेज की घोषणा की थी उसे केंद्र प्रायोजित विभिन्न योजनाओं में मिला दिया गया है। बसपा सांसद गंगा चरण ने कहा कि विशेष पैकेज को केंद्रीय योजनाओं में नहीं मिलाया जाना चाहिए। विशेष पैकेज के रूप में दिया जाने वाला अनुदान केंद्र की ओर से मिलने वाली अतिरिक्त राशि होनी चाहिए। प्रधानमंत्री को घोषणा करनी चाहिए कि बुंदेलखण्ड के लिए कोई विशेष पैकेज नहीं है। उन्होंने कहा कि विशेष पैकेज की राशि का आवंटन महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी अधिनियम और इंदिरा आवास योजना के तहत किया गया है। जवाब में केंद्रीय योजना राज्य मंत्री अश्विनी कुमार ने कहा कि केंद्रीय योजनाओं के तहत राशि का आवंटन इसलिए किया गया, क्योंकि इनके उद्देश्य एक हैं। आवंटन विशेष पैकेज का हिस्सा है। मंत्री के जवाब से असंतुष्ट विपक्षी सदस्यों ने हंगामा किया, जिसके बाद सभापति हामिद अंसारी ने सदन की कार्यवाही 10 मिनट के लिए दोपहर 12 बजे तक स्थगित कर दी। Reference http://www.pradeshtoday.com/new_details.php?news=Special+package+for+Bundelkhand+echo+in+RS
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पैकेज के बावजूद बुंदेलखंड में किसानों की आत्महत्या के मामलों में कमी नहीं आ रही है। पिछले पांच महीनों में ही किसानों की आत्महत्या के लगभग 520 मामले सामने आए हैं। सूखे के दुष्चक्र, नकली बीजों के फेर, फसल बीमा के फायदे से महरूम, कर्ज की मार में फंसे किसान जिंदगी से हार मानते दिख रहे हैं। बांदा के सांसद आर के सिंह पटेल कहते हैं, 'पैकेज का नियोजन सही तरीके से नहीं किया गया है। इसे उन लोगों ने तैयार किया है, जिनका जमीनी हकीकत से कोई वास्ता नहीं हैं।Ó हालांकि इस साल यहां कुछ बेहतर बारिश हुई है लेकिन वह भी नाकाफी मालूम पड़ती है। पैकेज के बाद भी सिंचाई की सुविधाओं में खास फायदा नहीं हुआ है। इस इलाके में धान उगाने के लिए 1,400 रुपये और गेहूं उगाने के लिए 1,500 रुपये प्रति क्विंटल तक की लागत आती है। लागत भी वसूल न हो पाने पर परेशान किसान भला और क्या करेगा?
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15 जुलाई 2011 सीएनएन-आईबीएन केंद्र सरकार द्वारा बुंदेलखंड के किसानों के लिए सात हजार करोड़ का पैकेज दिए किए के बावजूद बुंदेलखंड में किसानों की स्थिति में सुधार नहीं हुआ है। पिछले पांच महीनों में 500 से ज्यादा किसानों की खुदकुशी के आंकड़े तो यही संकेत देते हैं कि सरकारी पैकेज पर बुंदेलखंड की गरीबी भारी पड़ रही है। हाल ही में बैंक से लिया कर्ज चुका पाने में असमर्थ 45 वर्षीय वीरपाल राजपूत के आत्महत्या का मामला प्रकाश में आने के बाद बुंदेलखंड में आत्महत्या करनेवाले किसानों की संख्या पिछले 5 माह में 519 तक पहुंच गई है। यह क्षेत्र पिछले आठ साल से सूखे और अकाल से जूझ रहा है। प्राकृतिक आपदा के कारण खेती का काम ना के बराबर हो रहा है, जिसकी वजह से यहां पिछले 10 सालों में 2945 किसानों ने खुदकुशी की है।
मासूम पूछ रही है, पापा को आखिर हुआ क्या है?
प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने खुद बांदा पहुंच कर किसानों के लिए पैकेज की घोषणा की थी। राहुल गांधी ने माया सरकार पर पैकेज का पैसा बुंदेलखंड में खर्च न करने का आरोप लगाया था। उधर, मायावती हर बार इस पैकेज को ऊंट के मुंह में जीरा बताते हुए 80 हजार करोड़ का पैकेज मांग रही हैं। पर किसान शायद राजनीति के इस खेल से बेजार हो चुका है। यही वजह है कि कुछ सालों में बुंदेलखंड के हजारों किसान मौत को गले लगा चुके हैं। सवाल यह है कि आखिर इसका जिम्मेदार कौन है? http://josh18.in.com/hindi/regional-news-news/1117112/0
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बुंदेलखण्ड देश का दूसरा विदर्भ बनता जा रहा है। केन्द्र और राज्य सरकारों के तमाम घोषित उपायों के बावजूद यहॉ के किसानों द्वारा की जा रही आत्महत्याओं का सिलसिला थम नहीं रहा है। स्थिति की भयावहता का अनुमान इस बात से लगाया जा सकता है कि गत माह इलाहाबाद उच्च न्यायालय ने समाचार पत्रों में छप रही आत्महत्याओं की खबरों पर स्वत: संज्ञान लेते हुए केन्द्र व उ.प्र. सरकार से कैफियत तलब की है। http://www.news.bhadas4media.com/index.php/weyoume/283-2011-07-20-06-22-57 लेखक सुनील अमर पत्रकारिता से जुड़े हुए हैं
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Two months after the Supreme Court issued notice to the Uttar Pradesh government to respond to alleged anomalies in MGNREGS pointed out in the survey report of the Centre for Environment and Food Security (CEFS), the state government has formed special teams to investigate the complaints in five districts of Bundelkhand. Five teams have been formed to do spot verification of the anomalies pointed out in the report, which was submitted to the court in February 2011 and prepared by Parshuram Ray, Director of Delhi-based CEFS. Ray had filed a civil writ petition against the Union government seeking a CBI probe into the anomalies in NREGA. During the hearing of the petition, the Supreme Court had ordered a CBI enquiry into misappropriation of NREGA funds in Orrisa. Madhya Pradesh and UP were served notices to respond to the report in the previous order dated May 12.
The teams headed by Joint Secretary Anita Srivastava for Jhansi, Additional Commissioner Anurag Yadav for Chitrakoot, Assistant Commissioner J Shukla for Banda, Assistant Commissioner VK Bhagwat for Laitpur and Deputy commissioner NP Singh for Mahoba have been asked to conduct spot inspection in the coming week. Sources inform that the teams have been asked to complete their inspection by the end of this week and submit their report by August 3 to the state government for further action. In the report of the CEFS, which had surveyed around 800 households, it had come out that in Bundelkhand while about 50 per cent of the poorest Dalits surveyed in the report did not get single day of NREGA work, average work given to the surveyed household came out to be just 20 days. In its previous order, the court had said that in case of default, “the court would be compelled to take appropriate action against the defaulting officers/officials/authorities.” The next hearing of the case is scheduled for September 12.
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Bundelkhand and Baghelkhand have a rich cultural background. Chandelas and Bundelas rulers of Bundelkhand were great builders and created numerous forts, palaces and temples. The region is full of temples, particularly that of Lord Shiva. Chandelas created a large number of ponds now known as Chandeli-ponds in this region for irrigation and drinking water supply. A famous place of tourist and religious attraction, Orchha, is situated in the district of Tikamgarh. It was the capital of Bundelas before it got shifted to Tikamgarh due to vulnerable strategic position of Orchha in later days. In the background of river Betwa, the fort and numerous temples of Orchha provide 16 a picturesque view. The buildings of Orchha and Datia are magnificent and tell the tales of the creativity of Bundela rulers. Tikamgarh is also religiously famous for its temples of Lord Rama in the Orchha, and the one named Kundeshwar Mahadeo Mandir, near Tikamgarh township.
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'पीपली लाइव' के ऑस्कर से बाहर मुम्बई। बॉलीवुड अभिनेता आमिर खान ने कहा कि उन्हें दुख है कि फिल्म 'पीपली लाइव' ऑस्कर के दूसरे दौर के लिए नहीं चुनी गई, लेकिन उन्होंने प्रसन्नता जताई कि उनकी फिल्म ने भारत का प्रतिनिधित्व किया।
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भारत से 'पीपली लाइव' जाएगी ऑस्कर मेंनई दिल्ली।। आमिर खान प्रॉडक्शन के बैनर तले बनी ' पीपली लाइव ' को 83वें ऑस्कर अवॉर्ड्स के लिए भारत की ओर से नॉमिनेट किया गया है। ' पीपली लाइव ' बेस्ट फॉरेन फिल्म कैटिगरी के लिए भारत की आधिकारिक एंट्री होगी। इससे पहले भारत की ओर से नॉमिनेट फिल्मों में से 'मदर इंडिया', 'सलाम बॉम्बे' और 'लगान' को ही ऑस्कर में फॉरेन लैंग्विज कैटिगरी की बेस्ट फाइव फिल्मों में नॉमिनेशन मिल पाया है। ये फिल्में भी आखिरी सफलता से बस एक कदम दूर रह गईं। इससे पहले आमिर की 'तारे जमीं पर' भी 2009 में ऑस्कर के लिए जा चुकी है, लेकिन वह अंतिम पांच में जगह नहीं बना पाई थी।
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सरकार का आपदा प्रवन्धन विभाग अपने पहले चरण पूर्वानुमान में ही फेल हो जाता है
लेकिन सूखे के सन्दर्भों में तो सरकारी अर्लीवार्निंग सिस्टम यानी हमारा मौसम विभाग हमेशा ही औंधे मुंह ही गिरता है। मौसम विभाग द्वारा पिछले एक महीने में की गयी दो अलग अलग घोषणाओं पर ही नजर डालें तो उसकी कलई खुल जाती है। माह मई के अन्तिम सप्ताह में उसने घोशित किया कि इस वर्ष औसत से अधिक और समय से एक सप्ताह पूर्व ही वर्षा होगी, लेकिन जब समय पर भी वर्षा नहीं हुई तो गलती के कारणों को बिना बताए ही दुबारा घोषणा जून के अरन्तम सप्ताह में कर दी कि अब सूखा पडने की पूरी सम्भावना है तथा मानसून 15 दिन विलम्ब से चल रहा है। लेकिन जिन पर सूखे का असर कहर बन कर टूटता है वह तो अपनी फसल की कटाई करते करते ही जान गए थे कि इस साल भी इन्द्र देव का मिजाज गरम ही रहेगा, और इसके लिए जितना उनके बस में है उतनी तैयारी भी करली थी। लेकिन दसाब्दियों से सूखे की मार झेल रहे किसान के पास अब बचा ही क्या है जिससे वह अब बचाव कर सकेगा। उसके पास नतो कम पानी में पैदा होने वाले बीज बचे हैं और नाही खेत में पानी संचित कर लेने वाली बन्धियां। उसके पास नतो मिश्रत फसलचक्र बचा है नाही उसके साथी पशु और उनकी खाद, पास बचा है तो बस पुरखों द्वारा दिया गया ज्ञान वह भी केवल इस लिए बच गया चूकिं कम पढा लिखा होने के कारण वैज्ञानिकों के ज्ञान तक पहुंच नहीं पाया। अपने इस पारम्परिक ज्ञान के बल बूते किसान सूखे जैसी आपदा के साथ संघर्श ही नहीं कर रहे बल्कि उसमें विजय हासिल करते भी नजर आ रहे हैं। ऐसा भी नहीं कि यह पारम्परिक ज्ञान कुछ गांवों के कुछ लोगों के ही पास सीमित हो, बल्कि यह ज्ञान तो हर गांव के दस पचीस लोगों के पास है जो उन्हे उनके पूर्वजों के द्वारा किम्बदन्तियों कहावतों के रुप में प्राप्त हुआ है। चूंकि यह ज्ञान उनके खानदान को अलग से सामाजिक पहचान देता था अतः वह दसे सम्भाल कर रखते थे और समय समय पर दसका परिमार्जन भी करते थे। लेकिन रीति-रिवाज, परम्पराओं-प्रथाओं, सभ्यता-संस्कृति तथा रुढियों और कुरीतियों में विभेद की समझ बनाए बिना ही तथा कथित वैज्ञानिक मानसिकता ने हमारे सदियों से परिक्षित इस ज्ञान का उपहास उडाया, सीधे और सरीफ किसान इन तथा कथित वैज्ञानिकों को भी सन्यासी समझने की भूल कर बैठे उन्हें क्या पता कि वैज्ञानिकों के वेश वह किसी कम्पनी के सेल्समैन हैं। फिर क्या था किसानों ने इन सेल्स मैनों के इसारे पर अपने उस ज्ञान को विस्म्रित कर दिया, और इसी के साथ ही सूखे की विभीशिका का असर भी अधिक दिखने लगा। इस लिए कि सेल्स मैनों की यह प्रडाली खर्चीली ही नहीं धोखेबाज भी है। डिजास्टर मैनेजमेन्ट केलिए, लागों द्वारा, लोगों केलिए बिना खर्चे के अर्लीवानिंग सिस्टम के ऊपर सेल्समैनों द्वारा, कम्पनियों केलिए करोडों रुपए लाभ का यह अर्लीवार्निं सिस्टम लाद दिया गया। कोशिशें तो बहुतेरी की गयी लेकिन लोगों के अर्लीवार्निं सिस्टम को आज भी पूरी तरह से खतम नहीं किया जा सका। इसके अवशेष तो हर गांव में मिल जायगें लेकिन हमीरपुर जिले की तहसील मौदहा के एक गांव अकबई में डिजास्टर मैनेजमेंन्ट केलिए केवल अर्लीवार्निंग सिस्टम ही नहीं बल्कि पारम्परिक ज्ञान पर आधारित उसके सभी चरण प्रत्यक्ष रुप में विद्यमान हैं। अकबई के लोग रवी फसल की कटाई शुरु करते अगले साल के मौसम का अनुमान लगाना शुरु कर देते हैं। फसल की कटाई पूरी करते करते लोग मय कर लेते हैं कि अगला मौसम कैसा होगा, अतिवृष्टि, अनावृष्टि, ओला, पाला या फिर इस वर्ष किस प्रकार के कीट पतिंगों का प्रकोप होने वाला है। बस फिर क्या है अगर किसान को इतना पता चलजाय। इसके बाद किसान मिजुलकर तय करते हैं कि किस तरह के बीजों का बोना उपयुक्त होगा, मिश्रित फसलों में कौन कौन सी फसलें शामिल की जानी चाहिए। फसल अगैती बोई जाय या पिछैती। इस प्रकार किसान किसी भी आपदा के समय भी किसान अपने खनें खर्वे केलिए अनाज पैदा हीकर लेता है।
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बुदेलखंड पर योजना आयोग की आठ को अहम बैठक नयी दिल्ली। राजनैतिक दृष्टि से संवेदनशील तथा सूखे की मार झेल रहे बुदेलखंड क्षेत्र में सूखे से निबटने की नीतियों के प्रभावी क्रियान्वयन के लिये योजना आयोग द्वारा नवगठित सलाहकार समिति की पहली महत्वपूर्ण बैठक आठ सितंबर को राजधानी में होगी। गठन के साथ ही राजनैतिक विवाद में घिर गई समिति की पहली बैठक में चर्चित बुदेलखंड पैकेज के मद्देनजर इन योजनाओं की प्रगति का जायजा लेने क्षेत्र के विकास के लिये बहुआयामी नीतियां बनाने तथा क्षेत्र से सम्बद्ध राज्य सरकारों.मध्य प्रदेश एवं उत्तर प्रदेश की भागीदारी . नयी नीतियां बनाये जाने सहित तमाम मुद्दों पर व्यापक चर्चा की जायेगी। योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया समिति के अध्यक्ष हैं। बुदेलखंड क्षेत्र से सांसद तथा इस समिति के सदस्य केंद्रीय ग्रामीण विकास राज्यमंत्री प्रदीप जैन आदित्य ने कहा कि अत्यंत पिछडा बुंदेलखंड क्षेत्र वर्षों से उपेक्षित रहा है। इस समिति का गठन क्षेत्र को सूखे से उबारकर इसके त्वरित सर्वांगीण विकास की मंशा से किया गया है। इसमें किसी प्रकार की राजनीति ढुंढना कतई अनुचित है और वैसे भी विकास के नाम पर राजनीति करना कभी भी कांग्रेस का एजेंडा नहीं रहा। उन्होंने कहा कि उपेक्षित बुंदेलखंड में आम आदमी और किसान की दुर्दशा को देख राहुल गांधी ने वहां के विकास का.विजन. देखा और केंद्र ने भी क्षेत्र के विकास के लिये 7266 करोड रूपये का बुंदेलखंड पैकेज दिया। ऐसे में अगर योजना आयोग क्षेत्र के सभी दलों के सांसदों को साथ लेकर वहां की विकास योजनाओं के प्रभावी तथा पारदर्शी क्रियान्वयन के लिये कोई समिति बनाता है तो इससे किसी को भी ऐतराज आखिर कैसे हो सकता है।
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We want solved water problem in bundelkhand and its solution.रोटी को पैदा करने कि लिए सिचाई के जल कि आवश्यकता है जिसके लिए सदियों से बुंदेलखंड का किशन परेसान है ! यदि पानी का भरपूर प्रबंध कर दिया जाता है तो सारी समस्याओं का समाधान स्वमेब हो जायेगा! अनेक क्षेत्रों में थोडा थोडा से विकास सरकारी खजाने की बर्बादी के सिवा कुछ नहीं है क्योंकि उससे न तो विकास दीखता है और न ही रोटी होती है और न रोजगार ! उपाय : पानी के प्रबंध के लिए धसान नदी पर वरापटा पर बांध बनाना उपयुक्त रहेगा क्योंकि केवल २०० मी. बांध बनना है और दोनों तरफ ऊँचे ऊँचे पहाड़ है केवल नदी पर ही पक्का बांध बनना है इस पर चाहे कितना भी पैसा लगे २०० मी.पक्का ऊँचा बांध बन जाने से छतरपुर और टीकमगढ़ के सभी लोगों की सभी समस्याओं का समाधान हो जायेगा ! क्योंकि पानी का प्रबंध मुख्या है वही जीवन है ! डॉ.काशीप्रसाद त्रिपाठी टीकमगढ़
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विदर्भ नहीं , बुंदेलखंड के किसानों पर बनी है आमिर की “पीपली लाइव” : संजय पाण्डेय नई दिल्ली । बुंदेलखंड एकीकृत पार्टी के संयोजक संजय पाण्डेय के अनुसार आमिर खान की हाल ही में रिलीज हुई फिल्म “पीपली लाइव” विदर्भ नहीं बल्कि बुन्देलखंड के किसानो को लेकर बनी है। बुंदेलखंड के रायसेन जिले के बडवाई गाँव में फिल्माई गई इस फिल्म में बुन्देली संस्कृति तथा रहन सहन के साथ साथ पूरी तरह बुन्देली बोली ही प्रयुक्त की गयी है । उदाहारण के लिए नत्था की पत्नी धनिया अपने जेठ बुधिया से पूछती है ” काये कछू भओ का आज ?” तो उत्तर में बुधिया कहता है कि ” पईसा तौ मिले नैयाँ ” । कहने का तात्पर्य पात्रों के बीच बातचीत में ठेठ बुन्देली ही प्रयुक्त की गयी है। इतना ही नहीं बुंदेलखंड को लेकर केंद्र तथा राज्य सरकारों के बीच जो वाकयुद्ध पिछले कुछ वर्षों से चल रहा है उसको भी इस फिल्म में भी पूरी तरह समाहित किया गया है । “महगाई मारें जात है ” नामक चर्चित गाना बुन्देली साज-बाज के साथ गाया गया एक बुन्देली लोक गीत है । उल्लेखनीय है कि पिछले पॉँच वर्षों के दौरान बुन्देलखण्ड में लाखों किसान सूखे से प्रभावित हुए थे। इसके चलते यहाँ से भारी पलायन तथा भुखमरी के साथ साथ किसानों द्वारा आत्म हत्याओं की ख़बरें देश दुनिया तक पहुंची थी । इसी विषय को लेकर आमिर खान ने “पीपली लाइव” फिल्म बना डाली। किन्तु फिल्म में बुन्देलखंड के किसानों के हालातों का प्रस्तुतीकरण निंदनीय है।
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महेंद्र सागर तालाब में सुधार के नाम पर सरकार से किया गया धोखा ! टीकमगढ़ जिले के महेंद्र सारगर तालाब में सुधार और पानी बदने को लेकर किया गया सारा काम बर्बाद होने की कगार पर है मध्य प्रदेश सरकार ने महेंद्र सागर तालाब में गहरीकरण के नाम पर लाखों रूपए सरकार से लिया लकिन सरकार को या बताना भूल गए की महेंद्र सागर तालाब में पानी का आने का साधन क्या है में लोगों का ध्यान इस तरफ लगाना चाहूँगा की टीकमगढ़ का महेंद्र सागर तालाब ऊँचाई पर बना हुआ है जिससे तालाब में टीकमगढ़ जिले का पानी नहीं आता ! परन्तु सरकार ने इस बात पर ध्यान नहीं दिया की कहाँ क्या करवाना जरूरी है जिससे टीकमगढ़ के महेंद्र सागर तालाब में लबालब पानी हो जाये क्योंकि अभी पिछले ५ साल से टीकमगढ़ के तालाब का पानी सुख रहा है परन्तु सब ने इस बात का रोना रोया की टीकमगढ़ जिले में बरसात नहीं होती है जबकि सही कारन की तरफ न तो सरकार का ध्यान गया और न ही लोगों का और न ही किसी राजनितिक पार्टी का ! अगर टीकमगढ़ के तालाब के अस्तित्वा को बचाना है और उसका वही प्राकतिक सोंदर्य देखना चाहते हैं तो हमारे द्वारा दिया जाने वाले समाधान पर सरकार को और राजनीतिक पार्टी को या टीकमगढ़ के लोगों को विचार करना पड़ेगा ! इसलिए में अपनी बात को अब बताना चाहूँगा की आखिर टीकमगढ़ का तालाब अपना असितत्व क्यों खो रहा है ? टीकमगढ़ के तालाब महेंद्र सागर तालाब में पानी आने का एक मात्र साधन पठा का बड़ा तालाब है जिसके पूरा भर जाने पर उस तालाब से पानी बाहर निकलकर टीकमगढ़ के महेंद्र सागर तालाब को भरता था , परन्तु अब उस तालाब पर चेक बनाया जा चूका है जो करीब ४-५ साल पहले बनाया गया था तब से आज तक टीकमगढ़ महेंद्र सागर तालाब में पानी नहीं आया और अब और अब महेंद्र सागर तालाब अपने पूरे अस्तित्व को खोता जा रहा है और अगर इस बात पर जिला सरकार द्वारा कोई कार्यवाही नहीं हुई तो टीकमगढ़ तालाब अतीत के पन्नो में रह जायेगा की कभी वो भरता था !
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I SUGGEST THE NAME OF SAGAR MEDICAL COLLEGE IS "SANGEETA NARAD -BUNDELKHAND MEDICAL COLLEGE, SAGAR BECAUSE KU. SANGEETA NARAD WAS A BRILLIANT SCIENCE STUDENT DURING 1982-1984. IN 1985, HE WAS DIED ON A ROAD ACCIDENT FROM RETURNING HOME.
AFTER HER DEATH, THE UNIVERSITY OF SAGAR STARTED SOME FELLOWSHIPS IN SCIENCE FACUILTY FROM 1986
I INVITE YOUR THOUGHT ABOUT THIS SUBJECT AND SEND YOUR COMMNET ON MY BELOW MENTIONED ADDRESS
VAESHA JOSHI VARDHAMN HOSTEL EB 303, SCH 94, OPP. BOMBAY HOSPITAL INDORE
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khajuraho ignored by the state goverment कुंभकर्णी नींद में संस्कृति विभाग के अफसर, कैलेंडर से गायब खजुराहो महोत्सव, लोकरंग को भी भूले खजुराहो मध्य प्रदेश की संस्कृति विभाग की वेबसाइट पर आज भी नहीं मध्यप्रदेश सरकार और महकमे के मंत्री भले ही राज्य की संस्कृति को विश्व मंच पर देखने की इच्छा रखते हों, लेकिन अधिकारी उनका सपना तोड़ने पर आमादा हैं. इसका ताजा प्रमाण है संस्कृति विभाग की वेबसाइट जो पिछले दो साल से अपडेट ही नहीं की गई है. लाखों रुपये की पगार पाने वाला महकमा अपने फर्ज़ को लेकर कितना गंभीर है, इसकी बानगी देखनी हो तो ज़रा www.mpculture.in पर क्लिक करके देखिये... अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त खजुराहो महोत्सव आपको ढूँढे नहीं मिलेगा. इससे पहले अपनी स्थापना के पच्चीस साल पूरे करने वाला लोकरंग महोत्सव भी अफसरों की नींद नहीं खोल पाया था और विभाग की वेबसाइट पर देश-दुनिया के कलाप्रेमी इस बड़े आयोजन से रूबरु नहीं हो सके. मध्यप्रदेश शासन के संस्कृति विभाग की आधिकारिक वेबसाइट www.mpculture.in पर सांस्कृतिक आयोजनों को दर्शाने वाला कला पंचांग तो मौजूद है, लेकिन दरअसल विभाग के अफसरों ने साल 2008 में हुए अंतर्राष्ट्रीय रामलीला महोत्सव के बाद के किसी आयोजन की सुध लेना ज़रूरी नहीं समझा और इसके बाद के तमाम आयोजनों के बारे में इस वेबसाइट पर कोई जानकारी मौजूद नहीं है. सांस्कृतिक आयोजनों पर करोड़ों रुपये खर्च करने के बावज़ूद विभाग की वेबसाइट पर ही उनका प्रचार-प्रसार नहीं किया जाना ये साबित करता है कि अफसर अपने कर्तव्य के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति ही कर रहे हैं. ऐसे में एक सवाल विभाग के मुखिया के सामने भी है कि क्या ऐसे गैर ज़िम्मेदार अमले के बूते ही प्रदेश की संस्कृति विश्व पटल तक पहुँच पायेगी…? http://www.mpculture.in/html/khajuraho.asp
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