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rawat167



2013.04.03 06:53:24

बुंदेलखंड में माइक्रो इन्श्योरेन्स की पहल

इफको टोक्यो जनरल इन्श्योरेन्स द्वारा जनवरी माह में लाई गई माइक्रो इन्श्योरेन्स की योजना के अन्तर्गत गरीबी रेखा के नीचे रहने वाले लोगों का इन्श्योरेन्स किया जाता है जिसमें 30 रुपये का प्रीमियम लिया जाता है और 50000 रु दुर्घटना मृत्यु पर दिया जाता है।

कंपनी के कर्मचारी और बुन्देलखंड़ दर्शन टीम के सदस्य सचिन श्रीवास्तव और नावार्ड डी डी एम विवेक गुप्ता ललितपुर इस योजना पर काम किया और ललितपुर जिले के 1200 लोगों को इस योजना के अन्तर्गत जोड़ा गया।

इस उपलब्धि के लिये नाबार्ड और एन जी ओ श्रीगायत्री विकास समिति,सुयश समिति द्वारा एक प्रोग्राम का आयोजन ललितपुर में किया गया जिसमें मुख्य अतिथि केन्द्रीय ग्रामीण मंत्री प्रदीप जैन आदित्य रहे और इन्होने इनके कार्यो की सराहना की तथा श्री विवेक गुप्ता और सचिन श्रीवास्तव को उनकी इस उपलब्धि पर सम्मानित किया।

Sachin Srivastava
Vivek Gupta
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2012.05.02 08:54:41

मैं अपीलार्थी अरुण कुमार शर्मा द्वारा सुचना के अधिकार के अंतर्गत दिनांक 22-12-2011 को लोक सुचना अधिकारी उपसंचालक कृषि कल्याण एवं कृषि विभाग को सुचना के अधिकार 2005 के नियम 6/1 के तहत निम्न जानकारी चाही गई।
विषय:- जे आर हेडाउ उपसंचालक कृषि टीकमगढ़ का जाति प्रमाणपत्र चाहने वावत्
1 परिशिष्ठ एक नियम क्र 3 अनुसार अनुविभागीय अधिकारी राजस्व द्वारा जारी प्रमाण पत्र कर सत्य प्रमाणित प्रतिलिपि।
2 दिनांक 10-08-1950 को या उसके पूर्व जे आर हेडाउ के माता पिता का स्थाई निवास का पता नगर पटवारी हल्का एवं तहसील जिला इत्यादि का पता मय प्रमाणित अभिलेख के।
3  जे आर हेडाउ की जाति/जनजाति/उपजाति का प्रमाण पत्र।
4 शासकीय संवा में आने के पूर्व जे आर हेडाउ के माता पिता द्वारा जनजाति का प्रमाण पत्र क्या प्राप्त किया था।
5 संविधान के अनुच्छेद 341 के अधीन मप्र के राज्य के संबंध में अनूसूचित जनजाति के रुप में किस जिले से इन्हें विनिर्दिष्ठ किया।
6 अनुसूचित जनजाति संशोधित अधिनियम 1976 के अंतर्गत मप्र राज्य की सूची में हेडाउ जाति का अनुक्रमांक कितने पर अंकित है।
7 सेवा अभिलेखानुसार क्या इनका जाति प्रमाण पत्र प्राधिकृत अधिकारी द्वारा परिशिष्ठ चार के नियम 8/2 अनुुसार अस्थायी प्रमाण पत्र जारी किया गया था यदि हां तो क्यों।
8 क्या जे आर हेडाउ का परिशिष्ठ तीन नियम क्रमांक 8/1 अनुसार प्रमाणिकरण अधिकारी राजस्व द्वारा तहसीलदार द्वारा जारी प्रमाणपत्र या अनुविभागीय अधिकारी द्वारा जारी प्रमाणपत्र का प्रमाणीकरण किया गया है। यदि हां तो स्पष्टतौर पर अनुभाग जिला प्रदेश पुस्तक क्रमांक का हवाला देकर जारी प्रमाणपत्र की प्रमाणित प्रतिलिपि दिलाने की क्पा हो। नहीं तो फर्जी प्रमाणपत्र अनुसार शासन के नियमों की अनदेखी कर फर्जीतौर पर शासन की सेवा में किस आधार पर है।
जो आज दिनांक तक जानकारी प्राप्त नहीं हुई।
आवेदक
अरुण कुमार शर्मा
तालदरवाजा टीकमगढ़
  corruption in india | Agriculture department of tikamgarh | J R Hedao
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2012.02.10 04:56:17

बुंदेलखंड के विकास के बारे में जो देश के नेता चुनाव के दोरान बादे करते हैं उनको चुनाव के बाद बहाल आने की अपनी आदत को भी बहुत अछि तरह से याद रखते हैं जैसे अभी चुनाव प्रचार के दौरान प्रियंका गाँधी ने कहा के बे बर्शाती मेंढक है वो ही नियम सरे राजनेताओ पर लागु होता है और एक बार चुनाव जीत आने के बाद वो केवल अपने और अपने परिवार के विकास के योजनाओ के बारे में ही सोचते हैं ऐसे में बुंदेलखंड का विकास हो या न हो !
अगर मध्य प्रदेश की बात करें तो सत्यब्रत चतुर्वेदी जो कांग्रेस में बहुत बड़े नेता है लकिन आज तक को ऐसी योजने नहीं आई जो बुंदेलखंड के विकास को बनती हो  बुंदेलखंड के विकास में आने बाला पैसा या तो बुंदेलखंड के नेता खा गए या फिर विचोलियों ने खा लिया लकिन आज तक यहाँ का विकास न तो देखने को मिला है और न ही आज तक कोई नेता देखा है और यहाँ के विकास के बारे में सोचता हो!
मै अगर उमा भारती की बात करूँ तो वो भी मध्य प्रदेश के मुख्य मंत्री रह चुकी लकिन आज तक बुंदेलखंड के विकास का नामो निशान तक नहीं है !
अगर बुंदेलखंड का विकास यहाँ के लोग सच मै देखना चाहते हैं तो उनको बुंदेलखंड के विकास मै आने बाले पैसे को केवल यहाँ के विकाश को लगाना होगा लोगों को अपने घर को भरने की विचार धरा बदलनी होगी भ्रस्टाचार और कालाबाजारी को रोकना होगा !
मेरा मानना ये है की बुंदेलखंड मै अपार मात्रा मै खनिज है लेकिन उनका फायदा भी दुसरे राज्यों को मिल रहा है ! इस बारे मै भी बुंदेलखंड के राजनेताओ को सोचना होगा तभी जाकर बुंदेलखंड विस्का के पथ पर आगे बढेगा !
  
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2011.08.10 12:06:03

भरोसे की चक्की में पिसते किसान
प्रणव सिरोही / बांदा August 09, 2011

पैकेज के बावजूद बुंदेलखंड में किसानों की आत्महत्या के मामलों में कमी नहीं आ रही है। पिछले पांच महीनों में ही किसानों की आत्महत्या के लगभग 520 मामले सामने आए हैं। सूखे के दुष्चक्र, नकली बीजों के फेर, फसल बीमा के फायदे से महरूम, कर्ज की मार में फंसे किसान जिंदगी से हार मानते दिख रहे हैं। बांदा के सांसद आर के सिंह पटेल कहते हैं, 'पैकेज का नियोजन सही तरीके से नहीं किया गया है। इसे उन लोगों ने तैयार किया है, जिनका जमीनी हकीकत से कोई वास्ता नहीं हैं।Ó हालांकि इस साल यहां कुछ बेहतर बारिश हुई है लेकिन वह भी नाकाफी मालूम पड़ती है। पैकेज के बाद भी सिंचाई की सुविधाओं में खास फायदा नहीं हुआ है। इस इलाके में धान उगाने के लिए 1,400 रुपये और गेहूं उगाने के लिए 1,500 रुपये प्रति क्विंटल तक की लागत आती है। लागत भी वसूल न हो पाने पर परेशान किसान भला और क्या करेगा?
पैकेज के तहत किसानों को मुफ्त बीज और खाद की व्यवस्था भी की गई है। लेकिन पिछले वर्ष कई ऐसे बीज बांट दिए गए जिनसे फसल ही नहीं उगी। किसान आसा राम बताते हैं कि वे 'पेटेंटÓ बीज थे, जिनसे दोबारा फसल नहीं हो पाती क्योंकि उनसे फसल पहले ही ली जा चुकी थी। जब कोहराम मचा तो प्रशासन ने कुछ कार्यवाही का भरोसा जताया लेकिन फसल बीमा के नाम पर भी किसानों को कोई राहत नहीं मिली क्योंकि केवल प्राकृतिक आपदा की स्थिति में ही यह लाभ मिलता है।
पाले से नष्टï हुई दलहन फसलों के मामले में भी ऐसा ही हुआ। तब भी किसान मुआवजे से महरूम रह गए। हालांकि किसानों के लिए एक अच्छी है कि पाले को भी जल्द ही प्राकृतिक आपदा की श्रेणी में लिया जा सकता है और कृषि मंत्री शरद पवार इस मसले को कैबिनेट की मंजूरी दिलाने की कोशिशों में लगे हैं। किसान क्रेडिट कार्ड का भी कोई फायदा नहीं नजर आ रहा है। आमदनी नहीं होने के कारण कर्ज अदा नहीं हो पाता ऐसे में किसान को जमीन ही गंवानी पड़ती है। पटेल कहते हैं, 'पैकेज में मंडियों के निर्माण के लिए भारी खर्च किया जा रहा है जबकि उत्पादकता बढ़ाने पर कोई जोर नहीं हैं। जब उत्पादन नहीं होगा तो मंडियां कैसे गुलजार होंगी। किसानों को जब तक सीधे मदद नहीं मिलेगी, तो उनका भला नहीं होगा।


  
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2011.04.30 11:44:53

Bundelkhand and Baghelkhand have a rich cultural background. Chandelas
and Bundelas rulers of Bundelkhand were great builders and created
numerous forts, palaces and temples. The region is full of temples,
particularly that of Lord Shiva. Chandelas created a large number of ponds
now known as Chandeli-ponds in this region for irrigation and drinking water
supply.
A famous place of tourist and religious attraction, Orchha, is situated in the
district of Tikamgarh. It was the capital of Bundelas before it got shifted to
Tikamgarh due to vulnerable strategic position of Orchha in later days. In the
background of river Betwa, the fort and numerous temples of Orchha provide
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a picturesque view. The buildings of Orchha and Datia are magnificent and
tell the tales of the creativity of Bundela rulers. Tikamgarh is also religiously
famous for its temples of Lord Rama in the Orchha, and the one named
Kundeshwar Mahadeo Mandir, near Tikamgarh township.
  
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2011.01.21 05:14:07

'पीपली लाइव' के ऑस्कर से बाहर

मुम्बई। बॉलीवुड अभिनेता आमिर खान ने कहा कि उन्हें दुख है कि फिल्म 'पीपली लाइव' ऑस्कर के दूसरे दौर के लिए नहीं चुनी गई, लेकिन उन्होंने प्रसन्नता जताई कि उनकी फिल्म ने भारत का प्रतिनिधित्व किया।

आमिर खान ने संवाददाता सम्मेलन में कहा कि उन्हें खुशी है कि उनकी फिल्म ऑस्कर के लिए नामित होने वाली 60 फिल्मों में शामिल की गई।

उन्होंने हालांकि कहा कि वे ऑस्कर के लिए फिल्में नहीं बनाते, बल्कि वे दर्शकों के लिए फिल्में बनाते हैं।

पीपली लाइव अनुषा रिज्वी के निर्देशन में बनी पहली फिल्म है और इसमें गांव और शहरों के बीच के फासले को दिखाया गया है।

फिल्म 83वें एकेडमी पुरस्कार की विदेशी भाषा फिल्म श्रेणी के लिए चुनी गई नौ फिल्मों में शामिल नहीं हो पाई।

इस वर्ष इस श्रेणी में इथोपिया और ग्रीनलैंड ने पहली बार फिल्में भेजीं।

दूसरे दौर के लिए चुनी गई नौ फिल्मों की 21-23 जनवरी को समीक्षा होगी और इनमें से पुन: पांच फिल्मों का चयन किया जाएगा, जिनकी घोषणा आगामी मंगलवार को होगी।


  
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2010.09.25 09:05:01

भारत से 'पीपली लाइव' जाएगी ऑस्कर में

नई दिल्ली।। आमिर खान प्रॉडक्शन के बैनर तले बनी ' पीपली लाइव ' को 83वें ऑस्‍कर अवॉर्ड्स के


लिए भारत की ओर से नॉमिनेट किया गया है। ' पीपली लाइव ' बेस्‍ट फॉरेन फिल्‍म कैटिगरी के लिए भारत की आधिकारिक एंट्री होगी।

अब आमिर के सामने फिल्म को दुनिया भर की फिल्मों के सामने ' पीपली लाइव ' को बेस्ट फाइव के नॉमिनेशन तक पहुंचाने की होगी।

आम आदमी को केंद्र बनाकर बनाई गई इस फिल्म की डायरेक्टर अनुष्का रिजवी हैं। उन्होंने किसानों और ग्रामीणों की समस्याओं को संवदेशनील तरीके से फिल्माते हुए नेताओं और मीडिया की कार्यप्रणाली पर कटाक्ष किया है। बर्लिन फिल्म फेस्टिवल में पीपली लाइव फिल्म की स्पेशल स्क्रीनिंग की गई थी और 31वें डर्बन इंटरनैशनल फिल्म फेस्टिवल में इसे बेस्ट फर्स्ट फीचर फिल्म का अवॉर्ड भी मिल चुका है।

 इससे पहले भारत की ओर से नॉमिनेट फिल्मों में से 'मदर इंडिया', 'सलाम बॉम्बे' और 'लगान' को ही ऑस्कर में फॉरेन लैंग्विज कैटिगरी की बेस्ट फाइव फिल्मों में नॉमिनेशन मिल पाया है। ये फिल्में भी आखिरी सफलता से बस एक कदम दूर रह गईं। इससे पहले आमिर की 'तारे जमीं पर' भी 2009 में ऑस्कर के लिए जा चुकी है, लेकिन वह अंतिम पांच में जगह नहीं बना पाई थी।


  
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2010.09.22 12:13:33

बुंदेलखंड के लिए साढ़े चार अरब जारी

भोपाल । राज्य शासन के योजना आर्थिक एवं सांख्यिकी विभाग की ओर से मध्यप्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले 6 जिलों के लिए भारत सरकार से स्वीकृत विशेष आर्थिक पैकेज के तहत कार्यों के लिए साढ़े चार अरब रूपए जारी किए गए हैं।
आयुक्त स्तरीय गठित मूल्यांकन समिति की प्रथम बैठक में यह जानकारी दी गई। अध्यक्षता मूल्यांकन समिति के अध्यक्ष तथा सागर राजस्व संभाग के कमिश्नर एस.के. वेद ने की। बैठक में यह तय हुआ कि बैठक प्रत्येक माह के द्वितीय सप्ताह में हुआ करेगी ताकि कार्यो के क्रियान्वयन के क्षेत्र में कठिनाइयों का तत्काल निराकरण तत्काल किया जा सके। जारी राशि में से जल संसाधन विभाग को 3 अरब 6 करोड़ 47 लाख रूपए, वाटरशेड मेनेजमेंट के लिए 98 करोड़ 52 लाख 50 हजार रूपए, वन विभाग को 23 करोड़ 52 लाख रूपए तथा पशु चिकित्सा विभाग को 20 करोड़ 88 लाख रूपए दिए गए हैं।

इन जिलों को इतनी-इतनी राशि स्वीकृत

वैसे सागर को 7 अरब 92 करोड़ 80 लाख रूपए, दमोह को 5 अरब 47 करोड़ 6 लाख रूपए, छतरपुर 8 अरब 20 करोड़ 16 लाख रूपए, टीकमगढ़ 3 अरब 97 करोड़ 82 लाख रूपए, पन्ना 3 अरब 33 करोड़ 59 लाख रूपए और दतिया को 3 अरब 22 करोड़ 9 लाख रूपए स्वीकृत हैं।

 

टिप्पड़ी-  हमें नहीं लगता की इस पैकेज  का भी सर्कार कोई फायदा ले पायेगी और ये पैसे की भी बर्वादी होगी बुंदेलखंड के विकाश के लिए सर्कार को कोई विशेष विभाग बनाना चाहिए जो की बुंदेलखंड में किये जा रहे विशष कार्यों पर ध्यान रखे !

सागर.

बुंदेलखंड के विकास के लिए हजारों करोड़ के विशेष पैकेज दिए जा रहे हैं किंतु दूसरी ओर इसे खर्च करने वाली एजेंसियों की कार्यक्षमता की स्थिति यह है कि वे महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) के तहत संभाग के तीन जिलों को आवंटित 30 करोड़ की राशि का उपयोग नहीं कर सकीं।

लिहाजा, यह राशि लेप्स हो गई। इससे अंदाजा लगाया जा सकता है कि सूखा और अन्य समस्याओं से जूझ रहे संभाग के जिलों में विकास को लेकर प्रशासनिक मशीनरी कितनी संजीदा है।

पन्ना में नहीं हुए पचास फीसदी काम : विकास के लिए विशेष पैकेज से सींचे जा रहे पन्ना जिले में वर्ष 2007-08 व 2008-09 में लोक निर्माण विभाग द्वारा स्वीकृत कार्य से लगभग 17 काम अभी भी अधूरे पड़े हैं। केंद्र सरकार से मिली 93.56 लाख की राशि का उपयोग भी नहीं किया गया,वहीं ग्रामीण यांत्रिकी विभाग ने 155 कार्य मंजूर किए थे, जिसमें से 77 कामों पर ध्यान नहीं दिया गया। इस वजह से 449.14 लाख की राशि लेप्स हो गई।

जल संसाधन विभाग के 55 कार्य अपूर्ण रहे, जिसमें 237.33 लाख रुपए की राशि लेप्स हो गई।

इस तरह कुल 8 करोड़ 16 लाख 4 हजार की राशि का उपयोग नहीं हो सका है। दो जिलों में 22 करोड़ लेप्स: टीकमगढ़ जिले में 2008-09 में लोक निर्माण विभाग, ग्रामीण यांत्रिकी विभाग और जल संसाधन विभाग ने 213 कामों पर ध्यान नहीं दिया,नतीजतन लगभग 10 करोड़ की राशि लेप्स हो गई।

इसी तरह छतरपुर जिले में 179 कार्य पूरे नहीं होने से 12 करोड़ की राशि का इस्तेमाल नहीं हो सका। इस तरह तीनों जिलों की 30 करोड़ 26 लाख 4 हजार की राशि का उपयोग नहीं किया गया। यही हाल सागर जिले का रहा, जहां करोड़ों रुपए की लागत के काम नहीं कराए गए।

केंद्र का विशेष पैकेज

बुंदेलखंड में हाशिये पर आ पहुंची कांग्रेस ने अपना जनाधार बढ़ाने के लिए विशेष ध्यान देना शुरू किया है। इसी के मद्देनजर करीब ६ माह पहले बुंदेलखंड के उत्थान के लिए 3 हजार 627 करोड़ रुपए का विशेष पैकेज दिया है।

इस राशि को दो साल में खर्च करने का लक्ष्य रखा गया है। बुंदेलखंड के सागर, दमोह, छतरपुर,टीकमगढ़ पन्ना के अलावा दतिया जिले में इस राशि से विकासात्मक कार्य कराए जाने हैं। इस राशि में से एक बहुत बड़ा भाग सिंचाई सुविधाओं के विस्तार पर खर्च होना है।

बुंदेलखंड के विकास के लिए हर संभव प्रयास किए जा रहे हैं। राशि का उपयोग नहीं होना चिंताजनक है। इसलिए अब मानीटरिंग पर विशेष ध्यान दिया जाएगा।


  bundelkhand package | Madhya pradesh goverment | MP | shivraj singh sarkar
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2010.09.07 09:44:04

सरकार का आपदा प्रवन्धन विभाग अपने पहले चरण पूर्वानुमान में ही फेल हो जाता है

http://lh5.ggpht.com/_XpcuWNz7k5Y/S-6a36PvsSI/AAAAAAAABQ0/I3_m79kQKt0/bundelkhand_100.jpgभारत सरकार ने देश को दैवीय आपदाओं के प्रभव से बचाने अथवा उनके प्रभाव को कम करने के उद्देश्य से डिजास्टर मैनेज मेन्ट डिपार्टमेन्ट की स्थापना की है जो देश के किसी भी भाग में बाढ, सूखा, भूस्खलन या भूकम्प से बचाने या उसके प्रभाव को कम करने की जिम्मेदारी सम्भालता है। किसी भी आपदा के प्रवन्धन का पहला चरण है उस आपदा की पूर्व जानकारी और इसके लिए भरत सरकार नें अर्लीवार्निं सिस्टम की स्थापना कर रखी है। इसमें कोई सन्देह नहीं कि हमारा जैसा अर्लीवार्निन सिस्टम दुनियां में और कहीं नहीं है।

लेकिन सूखे के सन्दर्भों में तो सरकारी अर्लीवार्निंग सिस्टम यानी हमारा मौसम विभाग हमेशा ही औंधे मुंह ही गिरता है। मौसम विभाग द्वारा पिछले एक महीने में की गयी दो अलग अलग घोषणाओं पर ही नजर डालें तो उसकी कलई खुल जाती है। माह मई के अन्तिम सप्ताह में उसने घोशित किया कि इस वर्ष औसत से अधिक और समय से एक सप्ताह पूर्व ही वर्षा होगी, लेकिन जब समय पर भी वर्षा नहीं हुई तो गलती के कारणों को बिना बताए ही दुबारा घोषणा जून के अरन्तम सप्ताह में कर दी कि अब सूखा पडने की पूरी सम्भावना है तथा मानसून 15 दिन विलम्ब से चल रहा है।

लेकिन जिन पर सूखे का असर कहर बन कर टूटता है वह तो अपनी फसल की कटाई करते करते ही जान गए थे कि इस साल भी इन्द्र देव का मिजाज गरम ही रहेगा, और इसके लिए जितना उनके बस में है उतनी तैयारी भी करली थी। लेकिन दसाब्दियों से सूखे की मार झेल रहे किसान के पास अब बचा ही क्या है जिससे वह अब बचाव कर सकेगा। उसके पास नतो कम पानी में पैदा होने वाले बीज बचे हैं और नाही खेत में पानी संचित कर लेने वाली बन्धियां। उसके पास नतो मिश्रत फसलचक्र बचा है नाही उसके साथी पशु और उनकी खाद, पास बचा है तो बस पुरखों द्वारा दिया गया ज्ञान वह भी केवल इस लिए बच गया चूकिं कम पढा लिखा होने के कारण वैज्ञानिकों के ज्ञान तक पहुंच नहीं पाया।

अपने इस पारम्परिक ज्ञान के बल बूते किसान सूखे जैसी आपदा के साथ संघर्श ही नहीं कर रहे बल्कि उसमें विजय हासिल करते भी नजर आ रहे हैं। ऐसा भी नहीं कि यह पारम्परिक ज्ञान कुछ गांवों के कुछ लोगों के ही पास सीमित हो, बल्कि यह ज्ञान तो हर गांव के दस पचीस लोगों के पास है जो उन्हे उनके पूर्वजों के द्वारा किम्बदन्तियों कहावतों के रुप में प्राप्त हुआ है। चूंकि यह ज्ञान उनके खानदान को अलग से सामाजिक पहचान देता था अतः वह दसे सम्भाल कर रखते थे और समय समय पर दसका परिमार्जन भी करते थे।

लेकिन रीति-रिवाज, परम्पराओं-प्रथाओं, सभ्यता-संस्कृति तथा रुढियों और कुरीतियों में विभेद की समझ बनाए बिना ही तथा कथित वैज्ञानिक मानसिकता ने हमारे सदियों से परिक्षित इस ज्ञान का उपहास उडाया, सीधे और सरीफ किसान इन तथा कथित वैज्ञानिकों को भी सन्यासी समझने की भूल कर बैठे उन्हें क्या पता कि वैज्ञानिकों के वेश वह किसी कम्पनी के सेल्समैन हैं। फिर क्या था किसानों ने इन सेल्स मैनों के इसारे पर अपने उस ज्ञान को विस्म्रित कर दिया, और इसी के साथ ही सूखे की विभीशिका का असर भी अधिक दिखने लगा। इस लिए कि सेल्स मैनों की यह प्रडाली खर्चीली ही नहीं धोखेबाज भी है।

डिजास्टर मैनेजमेन्ट केलिए, लागों द्वारा, लोगों केलिए बिना खर्चे के अर्लीवानिंग सिस्टम के ऊपर सेल्समैनों द्वारा, कम्पनियों केलिए करोडों रुपए लाभ का यह अर्लीवार्निं सिस्टम लाद दिया गया। कोशिशें तो बहुतेरी की गयी लेकिन लोगों के अर्लीवार्निं सिस्टम को आज भी पूरी तरह से खतम नहीं किया जा सका। इसके अवशेष तो हर गांव में मिल जायगें लेकिन हमीरपुर जिले की तहसील मौदहा के एक गांव अकबई में डिजास्टर मैनेजमेंन्ट केलिए केवल अर्लीवार्निंग सिस्टम ही नहीं बल्कि पारम्परिक ज्ञान पर आधारित उसके सभी चरण प्रत्यक्ष रुप में विद्यमान हैं।

अकबई के लोग रवी फसल की कटाई शुरु करते अगले साल के मौसम का अनुमान लगाना शुरु कर देते हैं। फसल की कटाई पूरी करते करते लोग मय कर लेते हैं कि अगला मौसम कैसा होगा, अतिवृष्टि, अनावृष्टि, ओला, पाला या फिर इस वर्ष किस प्रकार के कीट पतिंगों का प्रकोप होने वाला है। बस फिर क्या है अगर किसान को इतना पता चलजाय। इसके बाद किसान मिजुलकर तय करते हैं कि किस तरह के बीजों का बोना उपयुक्त होगा, मिश्रित फसलों में कौन कौन सी फसलें शामिल की जानी चाहिए। फसल अगैती बोई जाय या पिछैती। इस प्रकार किसान किसी भी आपदा के समय भी किसान अपने खनें खर्वे केलिए अनाज पैदा हीकर लेता है।


  Bundelkhand
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2010.09.03 06:42:37

बुदेलखंड पर योजना आयोग की आठ को अहम बैठक

नयी दिल्ली। राजनैतिक दृष्टि से संवेदनशील तथा सूखे की मार झेल रहे बुदेलखंड क्षेत्र में सूखे से निबटने की नीतियों के प्रभावी क्रियान्वयन के लिये योजना आयोग द्वारा नवगठित सलाहकार समिति की पहली महत्वपूर्ण बैठक आठ सितंबर को राजधानी में होगी। 

गठन के साथ ही राजनैतिक विवाद में घिर गई समिति की पहली बैठक में चर्चित बुदेलखंड पैकेज के मद्देनजर इन योजनाओं की प्रगति का जायजा लेने क्षेत्र के विकास के लिये बहुआयामी नीतियां बनाने तथा क्षेत्र से सम्बद्ध राज्य सरकारों.मध्य प्रदेश एवं उत्तर प्रदेश की भागीदारी . नयी नीतियां बनाये जाने सहित तमाम मुद्दों पर व्यापक चर्चा की जायेगी। योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया समिति के अध्यक्ष हैं। बुदेलखंड क्षेत्र से सांसद तथा इस समिति के सदस्य केंद्रीय ग्रामीण विकास राज्यमंत्री प्रदीप जैन आदित्य ने कहा कि अत्यंत पिछडा बुंदेलखंड क्षेत्र वर्षों से उपेक्षित रहा है। इस समिति का गठन क्षेत्र को सूखे से उबारकर इसके त्वरित सर्वांगीण विकास की मंशा से किया गया है। इसमें किसी प्रकार की राजनीति ढुंढना कतई अनुचित है और वैसे भी विकास के नाम पर राजनीति करना कभी भी कांग्रेस का एजेंडा नहीं रहा। उन्होंने कहा कि उपेक्षित बुंदेलखंड में आम आदमी और किसान की दुर्दशा को देख राहुल गांधी ने वहां के विकास का.विजन. देखा और केंद्र ने भी क्षेत्र के विकास के लिये 7266 करोड रूपये का बुंदेलखंड पैकेज दिया। ऐसे में अगर योजना आयोग क्षेत्र के सभी दलों के सांसदों को साथ लेकर वहां की विकास योजनाओं के प्रभावी तथा पारदर्शी क्रियान्वयन के लिये कोई समिति बनाता है तो इससे किसी को भी ऐतराज आखिर कैसे हो सकता है।

गौरतलब है कि गत 30 अगस्त को एक सरकारी आदेश के तहत गठित इस पंद्रह सदस्यीय समिति में कांग्रेस सहित क्षेत्र के सभी दलों के सांसद भी शामिल हैं।  श्री जैन ने कहा कि समिति के जरिए क्षेत्र के विकास में सभी दलों के सांसदों की महत्वपूर्ण भूमिका रहेगी। लेकिन विपक्ष का आरोप है कि कांग्रेस ने मध्यप्रदेश तथा उत्तर प्रदेश सरकारों को पैकेज के लाभ का सेहरा नहीं लेने देने की मंशा से यह चतुराई भरा कदम उठाया है। कांग्रेस सूत्रों के अनुसार दरअसल दोनों राज्य सरकारें पैकेज के फंड का सही इस्तेमाल नहीं कर रही थीं और इसके बारे में काफी शिकायतें भी आ रही थीं। ऐसे में अगर इन्हीं राज्य सरकारों के दलों के सांसदों को समिति में शामिल करके कार्यक्रमों के क्रियान्वयन को पारदर्शी बनाने की कोशिश की गई है तो आपत्ति क्यों है। 

समिति में श्री जैन के अलावा केन्द्रीय योजना मंत्री वी नारायण सामी, बहुजन समाजपार्टी के आर.के. सिंह पटेल एवं विजय बहादुर, समाजवादी पार्टी के घनश्याम अनुरागी तथा भारतीय जनता पार्टी के अशोक अर्गल तथा जितेन्द्र सिंह बुंदेला भी शामिल है। श्री जैन ने कहा कि दरअसल विकास केन्द्र के साथ साथ राज्यों की सहभागिता से ही संभव है लेकिन दुख की बात है कि बुंदेलखंड वर्षो से सूखे की मार झेल रहा है। विकास यहां अछूता ही रह गया है। क्षेत्र में पर्यटन की आपार संभावनाएं है जिससे काफी लोगों को रोजगार मिल सकता है। लेकिन दोनों राज्य सरकारों ने क्षेत्र की उपेक्षा की जिससे क्षेत्र की स्थिति बद से बदतर होती गई। राज्य सरकारों ने जो योजनाएं बनायी थी उनके क्रियान्वयन से कहीं ज्यादा उनका ध्यान राजनीतिक फायदा लेने का रहा। ऐसे में अब अगर क्षेत्र में स्थिति सुधारने के लिए सरकार बुंदेलखंड पैकेज के बाद और प्रभावी कदम उठा रही है तो उनका सभी को स्वागत करना चाहिए। 


  Bundelkhand | Panel on Bundelkand to meet soon | Planning Commission on bundelkhand
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2010.07.27 07:37:45

khajuraho ignored by the state goverment

कुंभकर्णी नींद में संस्कृति विभाग के अफसर, कैलेंडर से गायब खजुराहो महोत्सव, लोकरंग को भी भूले

खजुराहो मध्य प्रदेश की संस्कृति विभाग की वेबसाइट पर आज भी नहीं 

मध्यप्रदेश सरकार और महकमे के मंत्री भले ही राज्य की संस्कृति को विश्व मंच पर देखने की इच्छा रखते हों, लेकिन अधिकारी उनका सपना तोड़ने पर आमादा हैं. इसका ताजा प्रमाण है संस्कृति विभाग की वेबसाइट जो पिछले दो साल से अपडेट ही नहीं की गई है. लाखों रुपये की पगार पाने वाला महकमा अपने फर्ज़ को लेकर कितना गंभीर है, इसकी बानगी देखनी हो तो ज़रा www.mpculture.in पर क्लिक करके देखिये... अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त खजुराहो महोत्सव आपको ढूँढे नहीं मिलेगा. इससे पहले अपनी स्थापना के पच्चीस साल पूरे करने वाला लोकरंग महोत्सव भी अफसरों की नींद नहीं खोल पाया था और विभाग की वेबसाइट पर देश-दुनिया के कलाप्रेमी इस बड़े आयोजन से रूबरु नहीं हो सके. मध्यप्रदेश शासन के संस्कृति विभाग की आधिकारिक वेबसाइट www.mpculture.in पर सांस्कृतिक आयोजनों को दर्शाने वाला कला पंचांग तो मौजूद है, लेकिन दरअसल विभाग के अफसरों ने साल 2008 में हुए अंतर्राष्ट्रीय रामलीला महोत्सव के बाद के किसी आयोजन की सुध लेना ज़रूरी नहीं समझा और इसके बाद के तमाम आयोजनों के बारे में इस वेबसाइट पर कोई जानकारी मौजूद नहीं है. सांस्कृतिक आयोजनों पर करोड़ों रुपये खर्च करने के बावज़ूद विभाग की वेबसाइट पर ही उनका प्रचार-प्रसार नहीं किया जाना ये साबित करता है कि अफसर अपने कर्तव्य के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति ही कर रहे हैं. ऐसे में एक सवाल विभाग के मुखिया के सामने भी है कि क्या ऐसे गैर ज़िम्मेदार अमले के बूते ही प्रदेश की संस्कृति विश्व पटल तक पहुँच पायेगी…?

http://www.mpculture.in/html/khajuraho.asp

 


  khajuraho | Bundelkhand | chhatarpur
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2010.07.14 05:38:36

बुंदेलखंड में सोने के भंडार का पता चला

नई दिल्ली | वर्षो से सूखे की मार झेलता रहा बुंदेलखंड सोना भी उगल सकता है। इस सूखी मिट्टी के शुरुआती लक्षण और परीक्षण पूरी तरह ठीक निकले तो यह क्षेत्र कीमती धातु सोने के लिए भी जाना जाएगा। बुंदेलखंड के ललितपुर जिले में सोने के भंडार का पता चला है। सब कुछ ठीक रहा तो आने वाले दो-तीन वर्षो में बुंदेलखंड का यह इलाका उत्तर प्रदेश में सोने के सबसे बड़े भंडार के लिए मशहूर होगा। उत्तर प्रदेश खनन विभाग को ललितपुर से 90 किलोमीटर दूर गिरार गांव में जमीन से 290 मीटर नीचे सोने के भंडार का पता चला है। यहां से निकले सोने का विस्तृत ब्योरा जानने के लिए उत्तर प्रदेश खनन विभाग ने कनाडियाई कंपनी मैक्सटेक रिसोर्सेस लिमिटेड के साथ दो वर्षो के लिए एक सहमति पत्र (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए हैं।

राज्य सरकार से मिले रिकानिसंस परमिट (आरपी) के तहत यह कंपनी सोने की गुणवत्ता और भंडार खोजने के लिए 67 करोड़ रुपये खर्च करेगी। इसी के तहत सोने के भंडार क्षेत्र की एरियल मैपिंग, सरफेस सैंपलिंग की जाएगी। खनन विभाग को सोनभद्र जिले में भी सोने के भंडार का पता चला है। शुरुआती जानकारियों के मुताबिक यहां सोने की मात्रा बुंदेलखंड क्षेत्र से कम होने के कयास लगाए जा रहे हैं। दैनिक जागरण से बातचीत में उत्तर प्रदेश के जियोलॉजी व माइनिंग विभाग में सलाहकार एसए ़फारुकी ने बताया कि गिरार गांव में सोने के भंडार का पता चला है। सोने की खोज 3.5 किलोमीटर लंबे व 300-400 मीटर चौड़े क्षेत्रफल में हुई है। यहां से 0.5 ग्राम प्रति टन से 13.5 ग्राम प्रति टन (एक टन मिट्टी से प्राप्त होने वाली सोने की मात्रा) की गुणवत्ता वाला सोना मिलने की संभावना है। फिलहाल, इससे ज्यादा कुछ कहना जल्दबाजी होगी। यूनाइटेड नेशन फे्रमवर्क क्लासीफिकेशन (यूएनएफसी) प्रणाली के तहत अप्रैल, 2005 तक भारत में 390.29 मिलियन टन सोने के अयस्क (स्वर्ण युक्त मिट्टी) का अनुमान लगाया गया है। इसमें 1.925 करोड़ टन को सुरक्षित श्रेणी में रखा गया। जबकि 37.104 करोड़ टन को बचे हुए संसाधनों को श्रेणी में रखा गया है। अयस्क के रूप में सोने का भंडार बिहार, कर्नाटक, राजस्थान पश्चिम बंगाल, आंध प्रदेश, केरल और मध्य प्रदेश में मिला है।

सबसे ज्यादा स्वर्ण घनत्व वाला अयस्क कर्नाटक, राजस्थान, पश्चिम बंगाल, बिहार और आंध्र प्रदेश में मिला है। देश में सोने का भंडार पता लगाने के लिए भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (जीएसआई) ने उत्तर प्रदेश, झारखंड, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, राजस्थान, कर्नाटक, केरल में काम शुरू किया था। इस दौरान मिनिरल एक्स्प्लोरेशन कॉरपोरेशन लिमिटेड ने झारखंड, मध्य प्रदेश और राजस्थान में जबकि हुट्टी गोल्ड माइंस कंपनी ने कर्नाटक के रायचूर जिले में सोने का उत्खनन किया था। वैसे दुनिया में ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, चीन, पेरू, कनाडा और इंडोनेशिया में सोने के बेहतर भंडार मौजूद हैं। सोने का उपयोग आमतौर पर सोने का इस्तेमाल आभूषण बनाने में किया जाता है।

अब सोने ने इलेक्ट्रॉनिक्स में जगह बनानी शुरू कर दी है। इंडियन ब्यूरो ऑफ माइंस के मुताबिक सोने की 85 फीसदी खपत आभूषणों में होती है। जबकि इलेक्ट्रानिक्स में छह फीसदी और गिन्नियों में दो फीसदी खपत होती है। प्लैटिनम और पैलेडियम को सोने के विकल्प के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है। परंतु इनकी कीमत सोने से अधिक होने के कारण इनका इस्तेमाल कम ही है।


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2010.07.07 12:00:23

बुंदेलखंड में फिर से अकाल की संभावना :

बुंदेलखंड में पानी की समस्या हर साल बदती जा रही है परन्तु बुंदेलखंड के लोग आज भी राजनीति का मुंह देख रहे है की वो बुंदेलखंड के विकास करेंगे , नहीं !

बुंदेलखंड के लोगों से में प्रमोद रावत प्रार्थना करता हूँ की अपने पर्यावरण को बचाएं बुंदेलखंड का प्रत्येक व्यक्ति पेड़ पोधे लगाये जिससे बुंदेलखंड में पर्यावरण संतुलन बन जाये में राजनीतिक पार्टियों से यही अनुरोध है की बस बुंदेलखंड में कोई पेड़ पोधे लगाने की योजना बनाये जिससे लोग उनको लगायें और पेड़ पोधों को बचाने का प्रयास करें न की उनको  काटें जिस तरह का संरक्षण मध्यप्रदेश सरकार और उत्तरप्रदेश सरकार जंगली जानवरों को बचाने के लिए नए नए उपाय चलती है उसी तरह बुंदेलखंड में जंगलों को बचाना चाहिए !

जो तालाब  बुंदेलखंड में चंदेलकालीन है उनको फिर से नया रूप देना चाहिए और जो तालाब खत्म हो चुके हैं उनको फिर से बनाना चाहिए !

क्योंकि बुंदेलखंड में पानी की समस्या आज से नहीं वर्षों से चली आ रही है इसलिए बुंदेलखंड में पानी रोकने के लिए चंदेलकालीन राजाओं ने बहुत अच्छी प्रनाड़ी बना रखी थी जिसके तहत अगर किसी तालाब का पानी बाहर भी जाता है तो वो आगे जाकर किसी दूसरे तालाब को भर देता था लेकिन वो तालाब आज या तो खत्म हो गए हैं या उन पर लोगों द्वारा खेती की जा रही है !

राज्य और भारत सरकार को चाहिए की उन तालाबों की जानकारी ले कर उन तालाबों का पुनरोद्धार किया जाना चाहिए न की बलराम सागर और अन्य तरह के तालाब बनाने की योजना बनाना चाहिए !

क्योंकि इन योजनाओं का फायदा केवल गावं के सरपंचों और प्रधानो को मिल रहा है क्यों जिन लोगों के पास कुछ भी नहीं था आज वो लोग ४ पहिये वहां लेकर घूम रहे है और न तो किसी तलब का निर्माण होता है और न ही उसका फायदा गावों के लोगों को मिलता है !

अगर सरकार किसी तरह का १ अभियान चलाये और उसमे पता लगाये की किसी सरपंच या प्रधान पद पर आने से पहले उसके परिवार के पास कितनी संपत्ति थी  और ५ साल बाद उसके परिवार के पास कितनी संपत्ति है  तो सारी बात सामने आ जाएगी !

 


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2010.06.23 14:03:35

केन बेतवा नदी गठजोड़ परियोजना नहीं.. बुंदेलखंड (bundelkhand की खामोश मौत !

  • जल, जमीन, जंगल एवं जैव विविधता पर खतरा
  • पारम्परिक कृषि दुष्प्रभाव
  • बांधों व नहर निर्माण के कारण सैकड़ों गांवो का विस्थापन
  • मछुवारों व तालाबों पर विपरीत प्रभाव
  • अन्तर्राज्जीय विवाद (यू0पी0-म0प्र0 सीमांकन)
  • हजारों वर्ग किलोमीटर की उपजाऊ भूमि, वन्य जीव जन्तु एवं पन्ना नेशनल टाईगर पार्क भूमि अधिग्रहण के दायरे में।

आज सारा विश्व एक कुनबे के रूप में आम जन मंच पर खड़े होकर अपने अपने देश, प्रदेश की वसुन्धरा को बचाने की गुहार करने की मुहिम में बढ़ चढ़कर हिस्सा ले रहा है वहीं वीभत्स अकाल यात्रा के कारण पिछले छः वर्षों से अकाल की मांद में पिसता चला आ रहा बुन्देलखण्ड अपनी उसी पुरानी टीस के साथ आज विष्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर केन बेतवा नदी (betwa river) गठजोड़ परियोजना के विरोध में सामूहिक रूप से सड़कों पर अपनी ही अस्मिता की जन सुनवाई लेकर केन्द्र और राज्य सरकारों के सामने विरोध में आ खड़ा हुआ है।

चित्रकूट धाम मण्डल जनपद बांदा में आज प्रातः जब सारा विश्व, विश्व पर्यावरण दिवस पर अपनी-अपनी औपचारिकताऎं महज निभाकर जलवायु परिवर्तन से टूट चुकी धरती के प्रति संवेदना व्यक्त करने का प्रयत्न कर रहा था उसी समय बदहाली से दशकों पीछे पहुंच चुका बुन्देलखण्ड जल संकट को आम जन मुद्दा बनाते हुए केन बेतवा नदी गठजोड़ के खिलाफ एक सामूहिक हस्ताक्षर अभियान एवं हजारों जन संदेश लिखित पोस्टकार्डों जो कि मा0 प्रधानमंत्री डां0 मनमोहन सिंह को संबोधित हैं में अपनी क्षेत्र की परिस्थितियों एवं व्यवहारिक परिणीतियों को व्यक्त कर प्रेषित करने की जुगत में 52 डिग्री दहकते तापमान के बीच भूख और प्यास को झेलते हुए बूढ़े, बच्चे, महिलायें और खासकर गरीब किसान के साथ सैकड़ो अधिवक्ता कचेहरी कैम्पस, महेश्वरी देवी चैराहा, न्यू मार्केट, रोडवेज बस स्टैण्ड में पर्यावरण के प्रति लोगों को जागरूक करते हुए इस सामूहिक जन आन्दोलन में अपनी उपस्थिति के साथ दर्ज होने की अपील कर रहा था।

इस आन्दोलन में प्रवास सोसाइटी के नेतृत्व में अन्य समाज सेवी संगठन जिनमें प्रमुख रूप से बुंदेलखंड (bundelkhand) भविष्य परिषद, मानवोदय सेवा संस्थान, बामसेफ कार्यकर्ता रामफल चैधरी, डा0 शैलेष कुमार रंजन, मन्दाकिनी बचाव की संयोजक अर्चना मिश्रा, जनषक्ति महिला संगठन एवं आषीष सागर ने उन तमाम खामियों की मुखालफत करते हुए इस प्रस्तावित परियोजना में खर्च होने वाली 7615 करोड़ की भारी भरकम राशि एवं योजना की नीति की पुर्नसमीक्षा करते हुए इसे बुंदेलखंड (bundelkhand) में गहराते हुए जलसंकट, जल, जमीन जंगल तीनों ही दृष्टि में इसको प्रतिकूल बताते हुए प्रधानमंत्री महोदय से केन बेतवा नदी गठजोड़ को मृत किये जाने की मांग करते हुए "प्लीज काल मी" कार्यक्रम के तहत सैकड़ों फोन काल्स एवं फैक्स व ज्ञापन केन्द्र सरकार को भेजे हैं और सामूहिक रूप से यह निर्णय लिया कि इस परियोजना के निर्णायक परिणाम तक प्रत्येक माह की 5 तारीख को यह आन्दोलन बुंदेलखंड (bundelkhand)  के प्रति जनपद वार तहसीलों और गांवों में चलाया जायेगा।

‘‘नदियों को कल-कल बहने दो। लोगों को जिन्दा रहने दो।।’’

आषीष सागर, प्रवास, बुन्देलखण्ड

http://www.bundelkhand.in/

 


  
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2010.06.19 08:58:32

image पन्ना टाइगर रिजर्व

पन्ना नेशनल पार्क के जंगल का गहरा भूरा रंग अब मानसून की आहट के साथ हरे रंग में बदल गया है, यहां का धुंधवा पहाड़ बांधवगढ़ से लाई गई बाघिन और उसके नवजात 4 बच्चों की अठखेलियों से पुन: पुलकित हुआ था और पार्क के फील्ड डायरेक्टर व डीएफओ हर्ष व्यक्त कर पत्रकारों को मिठाइयां भी खिला चुके हैं पर वास्तव में पन्ना क्षेत्र की जनता को फिलहाल कोई विशेष हर्ष नहीं है। उनके लिये दु:ख की बात यह है कि हमारे इलाके के जन्मजात बाघ समाप्त हो गये हैं। अब जो भी बाघ-बाघिन हैं, वे बाहर से लाये जा रहे हैं।

 

पौराणिक कर्णावती (केन) नदी के दोनों ओर लगभग 545 वर्ग किलोमीटर के क्षेत्र में फैले पन्ना नेशनल पार्क की विधिवत स्थापना सन् 1981 में हुई थी जबकि 1994 में भारत सरकार ने यहां 'प्रोजेक्ट टाइगर रिजर्व' की स्थापना की। उस समय यह राष्ट्रीय उद्यान लगभग 50-60 बाघों सहित सैकड़ों चीतल, सांभर, नीलगाय, भालुओं व सियारों से भरा हुआ था, लेकिन व्यवस्था का करिश्मा देखिये कि टाइगर रिजर्व प्रोजेक्ट की स्थापना के बाद से यहां बाघ लगातार घटते चले गए और राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण की एक टीम ने पिछले वर्ष अचानक यह खुलासा किया कि यहां एक भी बाघ नहीं है। बाद में यहां पदस्थ करोड़ों का बजट उदरस्थ कर चुके अफसरों ने भी माना कि हां सारे बाघ चुक गए। पन्ना बाघ अभयारण्य की यह कहानी देश की भ्रष्ट व्यवस्था और इसके लचीले कानूनों की पोल में पल रहे उस सामंतवाद की कहानी है, जो आजादी के बाद चेहरा बदलकर सामने आया है। इसकी ऊपरी परत पर तो एक संस्कारवान भले मानुस का चेहरा है पर अंदरुनी परत में कई क्रूर सामंतों के बिगड़ैल शहजादे छिपे हुये हैं जिनकी जिंदगी के दो ही मायने दिखाई पड़ते हैं-शिकार एवं मैथुन।

नागौद एवं पन्ना राज परिवार शिकारी दल के अगुआ बताये जाते हैं। इनको पन्ना राष्ट्रीय अभयारण्य को अपनी बपौती माने की छूट मिली सन् 2003-04 से जब नागौद राजपरिवार से संबंधित नागेन्द्र सिंह उर्फ बिटलू हुजूर को प्रदेश का गृहमंत्री बनाया गया। सन् 89-93 के बीच जब नागेन्द्र सिंह प्रदेश पर्यटन निगम के अध्यक्ष थे, तब खजुराहो में खोला गया उनका होटल अभी सन् 2004 से गुलजार हुआ। होटल को संचालित करने वाले नागेन्द्र सिंह के पुत्र श्यामेन्द्र सिंह उर्फ बिन्नी राजा ने इंदिरा गांधी गरीबी हटाओ योजना के माध्यम से सबल स्वसहायता समूह बनाया और उसके नाम पर केन नदी के किनारे झिन्ना नामक स्थान पर जंगल के अंदर छोटी-छोटी सर्वसुविधा युक्त झोंपडिय़ां (हट्स) बनवाई, जिनमें चुनिंदा विदेशी पर्यटकों को जंगल में मंगल मनाने के लिये रुकाया जाने लगा। उसी दरम्यान अनेक सालों से मंडला के नजदीक केन नदी में ट्री हाउस बनाकर रहने वाला स्वीडिश नागरिक जील कहीं गायब हो गया। बताया गया कि वह बिन्नी राजा को अपना ट्री हाउस बेचकर अपने देश चला गया है। बिन्नी का ट्री हाउस हो गया तो शीघ्र ही पन्ना के एक समय के बिगड़ैल नवाबजादे युवराज व रिश्ते में ससुर लगने वाले लोकेन्द्र सिंह ने भी वहां ट्री हाउस बनवा लिया और कुछ दिनों के भीतर पन्ना राजलक्ष्मी होटल के मालिक खनिज व्यवसाई प्रदीप सिंह राठौर का भी रिसोर्ट वहां बन गया। पांडव फॉल के पास एक दुर्गम रेंज में बने इन आधुनिक ऐयाश गृहों में आने-जाने व रहने वालों का शीघ्र ही पूरे उद्यान में दबदबा हो गया। नागेन्द्र सिंह के पुत्र बिन्नी राजा की कुछ गाडिय़ां हमेशा कभी हिनौता रेंज, कभी मंडला व कभी कल्दा आदि रेंजों में घूमने लगीं, जिनमें ''डिस्कवरी'' लिखा हआ था। बताया गया कि इन गाडिय़ों के माध्यम से जंगली जानवरों को 'शूट' कर डिस्कवरी चैनल को भेजा जाता है। वन्य प्राणी संरक्षण के लिए प्रदेश की जो समिति बनी, उसमें बिन्नी राजा एवं लोकेन्द्र सिंह भी सदस्य बन गए। लिहाजा, राष्ट्रीय उद्यान में शाम 5:30 बजे से सुबह तक रात में किसी का भी प्रवेश वर्जित है, पर इन महानुभावों की सशस्त्र गाडिय़ों में लगातार अंजान लोग और ये स्वयं रात में कभी यहां से घुसते, कभी वहां से निकलते सर्वत्र जंगल में देखे जाने लगे।

अभी हाल बांधवगढ़ में एक शेरनी को जीप द्वारा कुचलकर मारने के प्रसंग में जब मंत्री पुत्र बिन्नी राजा का नाम आया तो पन्ना व सतना की आम जनता को कोई आश्चर्य नहीं हुआ। गोया, बांधवगढ़ में भी बिन्नी राजा का रिसोर्ट है। अनेक लोग यह जानते हैं कि एक अरसे पूर्व परसमनिया (सतना) के जंगल में जो घायल बाघिन मिली थी, जिसका प्राणांत बाद में भोपाल में हो गया; वह पन्ना की कल्दा रेन्ज से भाग कर वहां पहुंची थी और वह भी ठोकरों से घायल थी। इस बाघिन को पार्क की आखिरी बाघिन कहा जाता है। उसके बच्चे भी थे जो आज तक नहीं मिले। इन कांड में तीन आदिवासी तो पकड़े गए पर मंत्री के भाई होने के नाते एक अन्य मुजरिम कन्नू हुजूर बचा ही रह गया।

मधुर व्यवहार के लिए मशहूर प्रदेश के पूर्व गृहमंत्री व वर्तमान में लोक निर्माण मंत्री नागेन्द्र सिंह के बड़े चिरंजीव श्यामेन्द्र सिंह उर्फ बिन्नी राजा का नाम वर्तमान में दक्षिणी बुंदेलखंड के सभी प्रचलित 'राजाओं' के नामों में सबसे बड़ा है। गोया, आजकल वे इन सब की आंखों के तारे हैं। हर दबदबेदार आदमी एक बार उनके साथ बैठना चाहता है। खजुराहो से जुड़ी ट्रेवल्स कंपनियां व होटल सदैव उनकी कृपा की मोहताज हैंं। जंगली गांवों में पुख्ता धारणा है कि बिन्नी राजा और उनकी शिकारी टोली ने पिछले पांच वर्षों में क्षेत्रीय डांग के एक सैकड़ा से अधिक बाघों व तेंदुओं को मारा है। पुरानी शिकारगाहें आबाद हो गई हैं और अन्य जानवर भी रोजाना मारे व खाए जा रहे हैं। पन्ना राष्ट्रीय अभयारण्य में जबसे नागौद के कचलोहा गांव के एक शिकारी युवक विक्रम सिंह डीएफओ बनकर आ गए, तबसे आग में जैसे घी जैसा पड़ गया। अब दिक्कत यह है कि बीट गार्ड अवैध शिकार एवं शिकारियों की रिपोर्ट किसे दें क्योंकि डीएफओ तो स्वयं बिन्नी राजा का पारिवारिक सदस्य है और उन्हीं के साथ घूमता है। जब कभी इस डीएफओ को हटाकर यहां गहन जांच की जाएगी तो अभी तक की सारी रिपोर्टें धरी की धरी रह जाएंगी और रिपोर्ट आएगी कि बाड़ी ने ही खेत को खा लिया है। कभी खुली सशस्त्र जिप्सियों में तो कभी बंद बड़ी गाडिय़ों में शिकारी जंगलों में मंडराते देखे जाते हैं। स्थानीय इलाकेदारों और पन्ना के रियासती परिवार द्वारा उनको दिए जा रहे समर्थन की वजह से गांवों में आवाज उठाने की दम किसी में नहीं है। लगभग एक वर्ष पूर्व मंडला के पास की एक महिला ने अपने साथ किए गए कदाचार और अत्याचार की जब रिपोर्ट लिखानी चाही तो कई दिनों की हीलाहवाली के बाद बिन्नी राजा के खिलाफ धारा 447/323/34 की साधारण रिपोर्ट दर्ज की गई और उन्हें मंडला थाने बुलाकर वहीं से जमानत दे दी गई। स्थिति यह है कि किसी ग्रामीण के पशु जंगली एरिया में घुस जाने पर उसे अपमानित व दण्डित किया जाता है, परंतु बाघ मारकर ले जाने वाले या बाघ के बच्चों की विदेश तस्करी कर देने वालों और सांभर, हिरण, खरगोश रोजाना खाने वालों पर किसी का नियंत्रण नहीं है।

बहुत कम लोग जानते हैं कि नागौद राजपरिवार के बिन्नी राजा की मां तथा स्वयं उनकी धर्मपत्नी नेपाल की हैं। नेपाल के रिश्ते का जिक्र इसलिए किया जा रहा है, क्योंकि नेपाल के रास्ते चीन हमारे देश के वन्य प्राणियों और उनकी खालों,दांतों,नाखूनों व चमड़ों का बड़ा ग्राहक है।

पन्ना राज परिवार के लोकेन्द्र सिंह की पुत्री कामाक्षा सिंह बिन्नी राजा के चचेरे भाई प्रीतेन्द्र सिंह को व्याही हैं। कामाक्षा आजकल नागौद नगर पंचायत की अध्यक्ष हैं। नागौद राज परिवार के आखिरी राजा महेन्द्र सिंह के बारे में कहा जाता है कि सोते शेर को मारना उनका शौक था और उन्होंने अपनी जिंदगी में 157 शेर मारे थे। इस मामले में नाती पूरी तरह बाबा पर गया है। मंत्री नागेन्द्र सिंह ने भी पिछले वर्ष एक साक्षात्कार में स्वीकार किया कि सन् 71 के पूर्व अपने युवा काल में मैंने 5 शेर मारे थे। असल में सन् 48 में परसमनिया का इलाका शिकार खेलने के लिए नागौद राज परिवार को तथा इसी तरह केन का इलाका पन्ना व छतरपुर राज परिवार को दिया गया था। प्रिवीपर्स के साथ शिकार की यह छूट भी शामिल थी। सन् 71 से प्रिवीपर्स खत्म हो गए, लेकिन शिकार का यह खेल कभी कम कभी ज्यादा चलता ही रहा। नागौद व पन्ना राज परिवार तथा उनसे जुड़े लोग आजकल भी जंगलों में काबिज हैं। यहां के खनिज व वन संसाधनों के उपार्जन में ये लोग खदान मालिकों व ठेकेदारों से पैसा वसूलते हैं। जो पैसा नहीं देगा वह इलाके में काम नहीं कर सकता।

यह विडंबना ही है कि देश व प्रदेश सरकार की मदद से यहां खूबसूरत बाघ अभयारण्य बना परंतु इसकी व्यवस्था और इस पर नियंत्रण अघोषित तौर पर उनका हो गया जो खानदानी शिकारी हैं। न केवल पन्ना वल्कि बांधवगढ़ में भी इन्होंने अपने रिसोर्टों और वहां पदस्थ वन विभाग के अधिकारियों व पुलिस के माध्यम से अपना नियंत्रण और दबदबा स्थापित कर लिया है। जैसे भेड़ों की रक्षा के लिए भेडिय़ों को नियुक्त कर दिया जाए, कुछ इसी तरह ही पन्ना बाघ अभयारण्य की दशा है। प्रदेश सरकार हमेशा यहां पाखंड करती रहती है, पर मुख्य समस्या की तरफ से अंधी बनी हुई है। कभी पारधियों और बहेलियों पर आरोप जड़कर तो कभी संसार चंद गिरोह का नाम उछालकर प्रपंच किया जाता है। मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान स्वयं बाघ के बच्चों को देखने के लिए सपरिवार पेंच के जंगलों में चले जाते हैं, पर पन्ना के जंगलों पर कुछ नहीं बोलते। शायद, हकीकत से वाकिफ होंगे।


  Panna | Panna National Park | पन्ना नेशनल पार्क | पन्ना
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2010.06.19 08:31:56

पूर्वांचल, हरितप्रदेश, बुंदेलखंड, विदर्भ और तेलंगाना

आज मुझे तेलंगाना के साथियों ने दिल्ली में प्रदर्शन लिए याद किया. जंतर-मंतर पहुंचते ही मैने काले कोट वाले वकीलों के जखीरे को देखा. यह सभी विधिवेत्ता मुट्ठी बांधे अपने दांतों को भीचते हुए तेलंगाना की मांग का इजहार बड़े ही गुस्से से कर रहे थे. पिंजरे से आजाद पंछी की तरह समाजवादी निरंकुशता की कैद से आजाद मै भी वहाँ पहुंचा था. कलावती के विदर्भ के भी काफी लोग मिले जहाँ किसान आज भी आत्महत्या करते हुए असहज म्रत्यु का वरण कर रहे है. आज पूरे देश के संसदीय एवं विधानसभा क्षेत्रों की नई सीमारेखाओं का परिसीमन हो रहा है. घुट रही जन आकान्छाओं एवं क्षेत्रीय स्वाभिमान का मर्दन करते हुए तानाशाह राजनेता मात्र अपनी गद्दी के लिए चिंतित है. कुछ मायावती जी जैसे चालाक चालाक नेता है जो बिल्कुल सही प्रतीकात्मक राजनीति करते है. सुखदेव राजभर, स्वामी प्रसाद मौर्य, बाबू सिंह कुशवाहा और दारा सिंह चौहान को पद देदिया लेकिन इनके कहने से इनके समाज को और कहीं प्रतिनिधित्व मिलेगा, राम जाने? इसी तर्ज पर बहन जी उत्तर प्रदेश के बटवारे का बयान तो दे डाली लेकिन उनकी बहुसंख्यक सरकार विधानसभा से प्रस्ताव पारित कराने की प्रक्रिया से हिचकिचा रही है. प्रतीकात्मक राजनीति की बेताज महारानी चाहे कुछ करे या न करे लेकिन ढपोरशंख की भाँती वादा करने में बिल्कुल पीछे नहीं है

मेरी भूतपूर्व पार्टी के अभूतपूर्व नेता का तो जवाब नहीं. उनकी पूरी राजनीति विसंगतियों की है. उत्तराखंड को प्रथक करने का प्रस्ताव करके, विरोध कर डाला. आजतक उत्तराखंड में उनकी स्वीकार्यता न है और न होगी. यूपीए सरकार बचा कर कांग्रेस की इच्छा होने के बावजूद गठबंधन नहीं किया और कांग्रेस की राजनीति को पुनर्जीवन दे कर कर भी यथावत दुश्मन भी बने रहे. वामपंथियों के साथ जा कर नारायणन को कांग्रेस के समर्थन से राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार घोषित करके कलाम साहब के पक्ष में अटलजी को सुझाव दे डाले. सोमवार दिल्ली की प्रेसवार्ता में एस.पी. जैसवाल, जगदम्बिका पाल, जितिन प्रसाद की सीट छोडी और दूसरे ही दिन पलटवार करते हुए अपना उम्मीदवार दे डाला. लोकसभा चुनावों में कई उम्मीदवारों के टिकट एक ही दिन में दो-दो बार बदल डाले. हाल में ही मेरे मामले मेरी उलझनों को सुलझाते-सुलझाते एक ब एक मुझे ही मेरे अपमान की ज्वाला में अपने अनुज के प्रायोजित शब्दबाण से झुलसा गए. अब पूर्वांचल और उत्तरप्रदेश के बटवारे को रोकने की मुहीम चला रहे है. यहाँ आज़मगढ़ का यादव भी चींख-चींख कर कह रहा है “ए भाई कबले हमहने के ईहाँ इटावा राज करी, कल्बों हमहनों क आपन राज आई की ना”. इस जनवाणी की व्याख्या मुझसा तुच्छ प्राणी क्या करे. ईश्वर करे की मेरे भूतपूर्व दल के अभूतपूर्व नेता उत्तराखंड की भाँती पूर्वांचल, हरितप्रदेश और बुंदेलखंड की जनाभावनों के प्रतिकूल अपने राजनैतिक आचरण को सुधारें वरना उन्हें राजनीति के हाशिये पर जा कर अपने ही गृह जनपद इटावा के प्रसिद्द कवि श्री गोपालदास नीरज का यह गीत न गाना पड़े,

“कारवाँ गुजर गया और हम खड़े-खड़े गुबार देखते रहे.”


  बुंदेलखंड | Bundelkhand
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2010.05.19 07:28:36

बांदा। प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह व कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी के बुंदेलखंड (bundelkhand) आगमन की सुगबुगाहट शुरू हो गई है। प्रदेश कांग्रेस के महासचिव तथा बांदा सदर के विधायक विवेक सिंह की देखरेख में स्थानीय जीआईसी मैदान में जनसभा की तैयारियां भी शुरू कर दी गई हैं। कांग्रेस खेमें से 15 मई के आसपास प्रधानमंत्री व राहुल गांधी के बांदा आगमन की जानकारी मिल रही है। बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के गढ़ बुंदेलखंड (bundelkhand) में सेंधमारी की चल रही कांग्रेस की गतिविधियों में यह कार्यक्रम महत्वपूर्ण माना जा रहा है। कांग्रेस के प्रदेश महासचिव और मीç़डया प्रभारी तथा बांदा सदर विधायक विवेक सिंह ने बताया, ""प्रधानमंत्री डा$ मनमोहन सिंह व कांग्रेस के महासचिव राहुल गांधी की संभावित जनसभा 15 मई के आसपास होगी। यहां के जीआईसी ग्राउंड में हम इसकी तैयार कर रहे हैं।"" बीते साल भी राहुल गांधी ने बुंदेलखंड (bundelkhand) के कई गांवों का गुपचुप दौरा किया था तथा इस दौरान दलितों के घरों में रूककर बसपा की नींद उ़डा दी दी थी। उल्लेखनीय है कि मायावती सरकार में बांदा के नसीमुद्दीन सिद्दीकी, बाबू सिंह कुशवाहा व दद्दू प्रसाद, अमरनाथ भास्कर व गंगा प्रसाद सहित दो दर्जन बसपाइयों को मंत्री पद के साथ-साथ विभिन्न आयोगों, निगमों में पदासीन कर लालबत्ती से नवाजा गया है। बसपा के जिला महासचिव लल्लू प्रसाद निषाद का कहना है, ""पीएम या राहुल के आने का कोई खास असर नहीं प़डता है। दलित समाज जागरूक हो गया है। अब नाटक-नौटंकी का जमाना नहीं रहा।
  Bundelkhand
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