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मैं अपीलार्थी अरुण कुमार शर्मा द्वारा सुचना के अधिकार के अंतर्गत दिनांक 22-12-2011 को लोक सुचना अधिकारी उपसंचालक कृषि कल्याण एवं कृषि विभाग को सुचना के अधिकार 2005 के नियम 6/1 के तहत निम्न जानकारी चाही गई। विषय:- जे आर हेडाउ उपसंचालक कृषि टीकमगढ़ का जाति प्रमाणपत्र चाहने वावत् 1 परिशिष्ठ एक नियम क्र 3 अनुसार अनुविभागीय अधिकारी राजस्व द्वारा जारी प्रमाण पत्र कर सत्य प्रमाणित प्रतिलिपि। 2 दिनांक 10-08-1950 को या उसके पूर्व जे आर हेडाउ के माता पिता का स्थाई निवास का पता नगर पटवारी हल्का एवं तहसील जिला इत्यादि का पता मय प्रमाणित अभिलेख के। 3 जे आर हेडाउ की जाति/जनजाति/उपजाति का प्रमाण पत्र। 4 शासकीय संवा में आने के पूर्व जे आर हेडाउ के माता पिता द्वारा जनजाति का प्रमाण पत्र क्या प्राप्त किया था। 5 संविधान के अनुच्छेद 341 के अधीन मप्र के राज्य के संबंध में अनूसूचित जनजाति के रुप में किस जिले से इन्हें विनिर्दिष्ठ किया। 6 अनुसूचित जनजाति संशोधित अधिनियम 1976 के अंतर्गत मप्र राज्य की सूची में हेडाउ जाति का अनुक्रमांक कितने पर अंकित है। 7 सेवा अभिलेखानुसार क्या इनका जाति प्रमाण पत्र प्राधिकृत अधिकारी द्वारा परिशिष्ठ चार के नियम 8/2 अनुुसार अस्थायी प्रमाण पत्र जारी किया गया था यदि हां तो क्यों। 8 क्या जे आर हेडाउ का परिशिष्ठ तीन नियम क्रमांक 8/1 अनुसार प्रमाणिकरण अधिकारी राजस्व द्वारा तहसीलदार द्वारा जारी प्रमाणपत्र या अनुविभागीय अधिकारी द्वारा जारी प्रमाणपत्र का प्रमाणीकरण किया गया है। यदि हां तो स्पष्टतौर पर अनुभाग जिला प्रदेश पुस्तक क्रमांक का हवाला देकर जारी प्रमाणपत्र की प्रमाणित प्रतिलिपि दिलाने की क्पा हो। नहीं तो फर्जी प्रमाणपत्र अनुसार शासन के नियमों की अनदेखी कर फर्जीतौर पर शासन की सेवा में किस आधार पर है। जो आज दिनांक तक जानकारी प्राप्त नहीं हुई। आवेदक अरुण कुमार शर्मा तालदरवाजा टीकमगढ़
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बुंदेलखंड के विकास के बारे में जो देश के नेता चुनाव के दोरान बादे करते हैं उनको चुनाव के बाद बहाल आने की अपनी आदत को भी बहुत अछि तरह से याद रखते हैं जैसे अभी चुनाव प्रचार के दौरान प्रियंका गाँधी ने कहा के बे बर्शाती मेंढक है वो ही नियम सरे राजनेताओ पर लागु होता है और एक बार चुनाव जीत आने के बाद वो केवल अपने और अपने परिवार के विकास के योजनाओ के बारे में ही सोचते हैं ऐसे में बुंदेलखंड का विकास हो या न हो ! अगर मध्य प्रदेश की बात करें तो सत्यब्रत चतुर्वेदी जो कांग्रेस में बहुत बड़े नेता है लकिन आज तक को ऐसी योजने नहीं आई जो बुंदेलखंड के विकास को बनती हो बुंदेलखंड के विकास में आने बाला पैसा या तो बुंदेलखंड के नेता खा गए या फिर विचोलियों ने खा लिया लकिन आज तक यहाँ का विकास न तो देखने को मिला है और न ही आज तक कोई नेता देखा है और यहाँ के विकास के बारे में सोचता हो! मै अगर उमा भारती की बात करूँ तो वो भी मध्य प्रदेश के मुख्य मंत्री रह चुकी लकिन आज तक बुंदेलखंड के विकास का नामो निशान तक नहीं है ! अगर बुंदेलखंड का विकास यहाँ के लोग सच मै देखना चाहते हैं तो उनको बुंदेलखंड के विकास मै आने बाले पैसे को केवल यहाँ के विकाश को लगाना होगा लोगों को अपने घर को भरने की विचार धरा बदलनी होगी भ्रस्टाचार और कालाबाजारी को रोकना होगा ! मेरा मानना ये है की बुंदेलखंड मै अपार मात्रा मै खनिज है लेकिन उनका फायदा भी दुसरे राज्यों को मिल रहा है ! इस बारे मै भी बुंदेलखंड के राजनेताओ को सोचना होगा तभी जाकर बुंदेलखंड विस्का के पथ पर आगे बढेगा !
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पैकेज के बावजूद बुंदेलखंड में किसानों की आत्महत्या के मामलों में कमी नहीं आ रही है। पिछले पांच महीनों में ही किसानों की आत्महत्या के लगभग 520 मामले सामने आए हैं। सूखे के दुष्चक्र, नकली बीजों के फेर, फसल बीमा के फायदे से महरूम, कर्ज की मार में फंसे किसान जिंदगी से हार मानते दिख रहे हैं। बांदा के सांसद आर के सिंह पटेल कहते हैं, 'पैकेज का नियोजन सही तरीके से नहीं किया गया है। इसे उन लोगों ने तैयार किया है, जिनका जमीनी हकीकत से कोई वास्ता नहीं हैं।Ó हालांकि इस साल यहां कुछ बेहतर बारिश हुई है लेकिन वह भी नाकाफी मालूम पड़ती है। पैकेज के बाद भी सिंचाई की सुविधाओं में खास फायदा नहीं हुआ है। इस इलाके में धान उगाने के लिए 1,400 रुपये और गेहूं उगाने के लिए 1,500 रुपये प्रति क्विंटल तक की लागत आती है। लागत भी वसूल न हो पाने पर परेशान किसान भला और क्या करेगा?
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Bundelkhand and Baghelkhand have a rich cultural background. Chandelas and Bundelas rulers of Bundelkhand were great builders and created numerous forts, palaces and temples. The region is full of temples, particularly that of Lord Shiva. Chandelas created a large number of ponds now known as Chandeli-ponds in this region for irrigation and drinking water supply. A famous place of tourist and religious attraction, Orchha, is situated in the district of Tikamgarh. It was the capital of Bundelas before it got shifted to Tikamgarh due to vulnerable strategic position of Orchha in later days. In the background of river Betwa, the fort and numerous temples of Orchha provide 16 a picturesque view. The buildings of Orchha and Datia are magnificent and tell the tales of the creativity of Bundela rulers. Tikamgarh is also religiously famous for its temples of Lord Rama in the Orchha, and the one named Kundeshwar Mahadeo Mandir, near Tikamgarh township.
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'पीपली लाइव' के ऑस्कर से बाहर मुम्बई। बॉलीवुड अभिनेता आमिर खान ने कहा कि उन्हें दुख है कि फिल्म 'पीपली लाइव' ऑस्कर के दूसरे दौर के लिए नहीं चुनी गई, लेकिन उन्होंने प्रसन्नता जताई कि उनकी फिल्म ने भारत का प्रतिनिधित्व किया।
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भारत से 'पीपली लाइव' जाएगी ऑस्कर मेंनई दिल्ली।। आमिर खान प्रॉडक्शन के बैनर तले बनी ' पीपली लाइव ' को 83वें ऑस्कर अवॉर्ड्स के लिए भारत की ओर से नॉमिनेट किया गया है। ' पीपली लाइव ' बेस्ट फॉरेन फिल्म कैटिगरी के लिए भारत की आधिकारिक एंट्री होगी। इससे पहले भारत की ओर से नॉमिनेट फिल्मों में से 'मदर इंडिया', 'सलाम बॉम्बे' और 'लगान' को ही ऑस्कर में फॉरेन लैंग्विज कैटिगरी की बेस्ट फाइव फिल्मों में नॉमिनेशन मिल पाया है। ये फिल्में भी आखिरी सफलता से बस एक कदम दूर रह गईं। इससे पहले आमिर की 'तारे जमीं पर' भी 2009 में ऑस्कर के लिए जा चुकी है, लेकिन वह अंतिम पांच में जगह नहीं बना पाई थी।
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सरकार का आपदा प्रवन्धन विभाग अपने पहले चरण पूर्वानुमान में ही फेल हो जाता है
लेकिन सूखे के सन्दर्भों में तो सरकारी अर्लीवार्निंग सिस्टम यानी हमारा मौसम विभाग हमेशा ही औंधे मुंह ही गिरता है। मौसम विभाग द्वारा पिछले एक महीने में की गयी दो अलग अलग घोषणाओं पर ही नजर डालें तो उसकी कलई खुल जाती है। माह मई के अन्तिम सप्ताह में उसने घोशित किया कि इस वर्ष औसत से अधिक और समय से एक सप्ताह पूर्व ही वर्षा होगी, लेकिन जब समय पर भी वर्षा नहीं हुई तो गलती के कारणों को बिना बताए ही दुबारा घोषणा जून के अरन्तम सप्ताह में कर दी कि अब सूखा पडने की पूरी सम्भावना है तथा मानसून 15 दिन विलम्ब से चल रहा है। लेकिन जिन पर सूखे का असर कहर बन कर टूटता है वह तो अपनी फसल की कटाई करते करते ही जान गए थे कि इस साल भी इन्द्र देव का मिजाज गरम ही रहेगा, और इसके लिए जितना उनके बस में है उतनी तैयारी भी करली थी। लेकिन दसाब्दियों से सूखे की मार झेल रहे किसान के पास अब बचा ही क्या है जिससे वह अब बचाव कर सकेगा। उसके पास नतो कम पानी में पैदा होने वाले बीज बचे हैं और नाही खेत में पानी संचित कर लेने वाली बन्धियां। उसके पास नतो मिश्रत फसलचक्र बचा है नाही उसके साथी पशु और उनकी खाद, पास बचा है तो बस पुरखों द्वारा दिया गया ज्ञान वह भी केवल इस लिए बच गया चूकिं कम पढा लिखा होने के कारण वैज्ञानिकों के ज्ञान तक पहुंच नहीं पाया। अपने इस पारम्परिक ज्ञान के बल बूते किसान सूखे जैसी आपदा के साथ संघर्श ही नहीं कर रहे बल्कि उसमें विजय हासिल करते भी नजर आ रहे हैं। ऐसा भी नहीं कि यह पारम्परिक ज्ञान कुछ गांवों के कुछ लोगों के ही पास सीमित हो, बल्कि यह ज्ञान तो हर गांव के दस पचीस लोगों के पास है जो उन्हे उनके पूर्वजों के द्वारा किम्बदन्तियों कहावतों के रुप में प्राप्त हुआ है। चूंकि यह ज्ञान उनके खानदान को अलग से सामाजिक पहचान देता था अतः वह दसे सम्भाल कर रखते थे और समय समय पर दसका परिमार्जन भी करते थे। लेकिन रीति-रिवाज, परम्पराओं-प्रथाओं, सभ्यता-संस्कृति तथा रुढियों और कुरीतियों में विभेद की समझ बनाए बिना ही तथा कथित वैज्ञानिक मानसिकता ने हमारे सदियों से परिक्षित इस ज्ञान का उपहास उडाया, सीधे और सरीफ किसान इन तथा कथित वैज्ञानिकों को भी सन्यासी समझने की भूल कर बैठे उन्हें क्या पता कि वैज्ञानिकों के वेश वह किसी कम्पनी के सेल्समैन हैं। फिर क्या था किसानों ने इन सेल्स मैनों के इसारे पर अपने उस ज्ञान को विस्म्रित कर दिया, और इसी के साथ ही सूखे की विभीशिका का असर भी अधिक दिखने लगा। इस लिए कि सेल्स मैनों की यह प्रडाली खर्चीली ही नहीं धोखेबाज भी है। डिजास्टर मैनेजमेन्ट केलिए, लागों द्वारा, लोगों केलिए बिना खर्चे के अर्लीवानिंग सिस्टम के ऊपर सेल्समैनों द्वारा, कम्पनियों केलिए करोडों रुपए लाभ का यह अर्लीवार्निं सिस्टम लाद दिया गया। कोशिशें तो बहुतेरी की गयी लेकिन लोगों के अर्लीवार्निं सिस्टम को आज भी पूरी तरह से खतम नहीं किया जा सका। इसके अवशेष तो हर गांव में मिल जायगें लेकिन हमीरपुर जिले की तहसील मौदहा के एक गांव अकबई में डिजास्टर मैनेजमेंन्ट केलिए केवल अर्लीवार्निंग सिस्टम ही नहीं बल्कि पारम्परिक ज्ञान पर आधारित उसके सभी चरण प्रत्यक्ष रुप में विद्यमान हैं। अकबई के लोग रवी फसल की कटाई शुरु करते अगले साल के मौसम का अनुमान लगाना शुरु कर देते हैं। फसल की कटाई पूरी करते करते लोग मय कर लेते हैं कि अगला मौसम कैसा होगा, अतिवृष्टि, अनावृष्टि, ओला, पाला या फिर इस वर्ष किस प्रकार के कीट पतिंगों का प्रकोप होने वाला है। बस फिर क्या है अगर किसान को इतना पता चलजाय। इसके बाद किसान मिजुलकर तय करते हैं कि किस तरह के बीजों का बोना उपयुक्त होगा, मिश्रित फसलों में कौन कौन सी फसलें शामिल की जानी चाहिए। फसल अगैती बोई जाय या पिछैती। इस प्रकार किसान किसी भी आपदा के समय भी किसान अपने खनें खर्वे केलिए अनाज पैदा हीकर लेता है।
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बुदेलखंड पर योजना आयोग की आठ को अहम बैठक नयी दिल्ली। राजनैतिक दृष्टि से संवेदनशील तथा सूखे की मार झेल रहे बुदेलखंड क्षेत्र में सूखे से निबटने की नीतियों के प्रभावी क्रियान्वयन के लिये योजना आयोग द्वारा नवगठित सलाहकार समिति की पहली महत्वपूर्ण बैठक आठ सितंबर को राजधानी में होगी। गठन के साथ ही राजनैतिक विवाद में घिर गई समिति की पहली बैठक में चर्चित बुदेलखंड पैकेज के मद्देनजर इन योजनाओं की प्रगति का जायजा लेने क्षेत्र के विकास के लिये बहुआयामी नीतियां बनाने तथा क्षेत्र से सम्बद्ध राज्य सरकारों.मध्य प्रदेश एवं उत्तर प्रदेश की भागीदारी . नयी नीतियां बनाये जाने सहित तमाम मुद्दों पर व्यापक चर्चा की जायेगी। योजना आयोग के उपाध्यक्ष मोंटेक सिंह अहलूवालिया समिति के अध्यक्ष हैं। बुदेलखंड क्षेत्र से सांसद तथा इस समिति के सदस्य केंद्रीय ग्रामीण विकास राज्यमंत्री प्रदीप जैन आदित्य ने कहा कि अत्यंत पिछडा बुंदेलखंड क्षेत्र वर्षों से उपेक्षित रहा है। इस समिति का गठन क्षेत्र को सूखे से उबारकर इसके त्वरित सर्वांगीण विकास की मंशा से किया गया है। इसमें किसी प्रकार की राजनीति ढुंढना कतई अनुचित है और वैसे भी विकास के नाम पर राजनीति करना कभी भी कांग्रेस का एजेंडा नहीं रहा। उन्होंने कहा कि उपेक्षित बुंदेलखंड में आम आदमी और किसान की दुर्दशा को देख राहुल गांधी ने वहां के विकास का.विजन. देखा और केंद्र ने भी क्षेत्र के विकास के लिये 7266 करोड रूपये का बुंदेलखंड पैकेज दिया। ऐसे में अगर योजना आयोग क्षेत्र के सभी दलों के सांसदों को साथ लेकर वहां की विकास योजनाओं के प्रभावी तथा पारदर्शी क्रियान्वयन के लिये कोई समिति बनाता है तो इससे किसी को भी ऐतराज आखिर कैसे हो सकता है।
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khajuraho ignored by the state goverment कुंभकर्णी नींद में संस्कृति विभाग के अफसर, कैलेंडर से गायब खजुराहो महोत्सव, लोकरंग को भी भूले खजुराहो मध्य प्रदेश की संस्कृति विभाग की वेबसाइट पर आज भी नहीं मध्यप्रदेश सरकार और महकमे के मंत्री भले ही राज्य की संस्कृति को विश्व मंच पर देखने की इच्छा रखते हों, लेकिन अधिकारी उनका सपना तोड़ने पर आमादा हैं. इसका ताजा प्रमाण है संस्कृति विभाग की वेबसाइट जो पिछले दो साल से अपडेट ही नहीं की गई है. लाखों रुपये की पगार पाने वाला महकमा अपने फर्ज़ को लेकर कितना गंभीर है, इसकी बानगी देखनी हो तो ज़रा www.mpculture.in पर क्लिक करके देखिये... अंतर्राष्ट्रीय ख्याति प्राप्त खजुराहो महोत्सव आपको ढूँढे नहीं मिलेगा. इससे पहले अपनी स्थापना के पच्चीस साल पूरे करने वाला लोकरंग महोत्सव भी अफसरों की नींद नहीं खोल पाया था और विभाग की वेबसाइट पर देश-दुनिया के कलाप्रेमी इस बड़े आयोजन से रूबरु नहीं हो सके. मध्यप्रदेश शासन के संस्कृति विभाग की आधिकारिक वेबसाइट www.mpculture.in पर सांस्कृतिक आयोजनों को दर्शाने वाला कला पंचांग तो मौजूद है, लेकिन दरअसल विभाग के अफसरों ने साल 2008 में हुए अंतर्राष्ट्रीय रामलीला महोत्सव के बाद के किसी आयोजन की सुध लेना ज़रूरी नहीं समझा और इसके बाद के तमाम आयोजनों के बारे में इस वेबसाइट पर कोई जानकारी मौजूद नहीं है. सांस्कृतिक आयोजनों पर करोड़ों रुपये खर्च करने के बावज़ूद विभाग की वेबसाइट पर ही उनका प्रचार-प्रसार नहीं किया जाना ये साबित करता है कि अफसर अपने कर्तव्य के नाम पर सिर्फ खानापूर्ति ही कर रहे हैं. ऐसे में एक सवाल विभाग के मुखिया के सामने भी है कि क्या ऐसे गैर ज़िम्मेदार अमले के बूते ही प्रदेश की संस्कृति विश्व पटल तक पहुँच पायेगी…? http://www.mpculture.in/html/khajuraho.asp
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बुंदेलखंड में सोने के भंडार का पता चलानई दिल्ली | वर्षो से सूखे की मार झेलता रहा बुंदेलखंड सोना भी उगल सकता है। इस सूखी मिट्टी के शुरुआती लक्षण और परीक्षण पूरी तरह ठीक निकले तो यह क्षेत्र कीमती धातु सोने के लिए भी जाना जाएगा। बुंदेलखंड के ललितपुर जिले में सोने के भंडार का पता चला है। सब कुछ ठीक रहा तो आने वाले दो-तीन वर्षो में बुंदेलखंड का यह इलाका उत्तर प्रदेश में सोने के सबसे बड़े भंडार के लिए मशहूर होगा। उत्तर प्रदेश खनन विभाग को ललितपुर से 90 किलोमीटर दूर गिरार गांव में जमीन से 290 मीटर नीचे सोने के भंडार का पता चला है। यहां से निकले सोने का विस्तृत ब्योरा जानने के लिए उत्तर प्रदेश खनन विभाग ने कनाडियाई कंपनी मैक्सटेक रिसोर्सेस लिमिटेड के साथ दो वर्षो के लिए एक सहमति पत्र (एमओयू) पर हस्ताक्षर किए हैं। राज्य सरकार से मिले रिकानिसंस परमिट (आरपी) के तहत यह कंपनी सोने की गुणवत्ता और भंडार खोजने के लिए 67 करोड़ रुपये खर्च करेगी। इसी के तहत सोने के भंडार क्षेत्र की एरियल मैपिंग, सरफेस सैंपलिंग की जाएगी। खनन विभाग को सोनभद्र जिले में भी सोने के भंडार का पता चला है। शुरुआती जानकारियों के मुताबिक यहां सोने की मात्रा बुंदेलखंड क्षेत्र से कम होने के कयास लगाए जा रहे हैं। दैनिक जागरण से बातचीत में उत्तर प्रदेश के जियोलॉजी व माइनिंग विभाग में सलाहकार एसए ़फारुकी ने बताया कि गिरार गांव में सोने के भंडार का पता चला है। सोने की खोज 3.5 किलोमीटर लंबे व 300-400 मीटर चौड़े क्षेत्रफल में हुई है। यहां से 0.5 ग्राम प्रति टन से 13.5 ग्राम प्रति टन (एक टन मिट्टी से प्राप्त होने वाली सोने की मात्रा) की गुणवत्ता वाला सोना मिलने की संभावना है। फिलहाल, इससे ज्यादा कुछ कहना जल्दबाजी होगी। यूनाइटेड नेशन फे्रमवर्क क्लासीफिकेशन (यूएनएफसी) प्रणाली के तहत अप्रैल, 2005 तक भारत में 390.29 मिलियन टन सोने के अयस्क (स्वर्ण युक्त मिट्टी) का अनुमान लगाया गया है। इसमें 1.925 करोड़ टन को सुरक्षित श्रेणी में रखा गया। जबकि 37.104 करोड़ टन को बचे हुए संसाधनों को श्रेणी में रखा गया है। अयस्क के रूप में सोने का भंडार बिहार, कर्नाटक, राजस्थान पश्चिम बंगाल, आंध प्रदेश, केरल और मध्य प्रदेश में मिला है। सबसे ज्यादा स्वर्ण घनत्व वाला अयस्क कर्नाटक, राजस्थान, पश्चिम बंगाल, बिहार और आंध्र प्रदेश में मिला है। देश में सोने का भंडार पता लगाने के लिए भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण (जीएसआई) ने उत्तर प्रदेश, झारखंड, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, राजस्थान, कर्नाटक, केरल में काम शुरू किया था। इस दौरान मिनिरल एक्स्प्लोरेशन कॉरपोरेशन लिमिटेड ने झारखंड, मध्य प्रदेश और राजस्थान में जबकि हुट्टी गोल्ड माइंस कंपनी ने कर्नाटक के रायचूर जिले में सोने का उत्खनन किया था। वैसे दुनिया में ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, चीन, पेरू, कनाडा और इंडोनेशिया में सोने के बेहतर भंडार मौजूद हैं। सोने का उपयोग आमतौर पर सोने का इस्तेमाल आभूषण बनाने में किया जाता है। अब सोने ने इलेक्ट्रॉनिक्स में जगह बनानी शुरू कर दी है। इंडियन ब्यूरो ऑफ माइंस के मुताबिक सोने की 85 फीसदी खपत आभूषणों में होती है। जबकि इलेक्ट्रानिक्स में छह फीसदी और गिन्नियों में दो फीसदी खपत होती है। प्लैटिनम और पैलेडियम को सोने के विकल्प के तौर पर इस्तेमाल किया जा रहा है। परंतु इनकी कीमत सोने से अधिक होने के कारण इनका इस्तेमाल कम ही है।
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बुंदेलखंड में फिर से अकाल की संभावना : बुंदेलखंड में पानी की समस्या हर साल बदती जा रही है परन्तु बुंदेलखंड के लोग आज भी राजनीति का मुंह देख रहे है की वो बुंदेलखंड के विकास करेंगे , नहीं ! बुंदेलखंड के लोगों से में प्रमोद रावत प्रार्थना करता हूँ की अपने पर्यावरण को बचाएं बुंदेलखंड का प्रत्येक व्यक्ति पेड़ पोधे लगाये जिससे बुंदेलखंड में पर्यावरण संतुलन बन जाये में राजनीतिक पार्टियों से यही अनुरोध है की बस बुंदेलखंड में कोई पेड़ पोधे लगाने की योजना बनाये जिससे लोग उनको लगायें और पेड़ पोधों को बचाने का प्रयास करें न की उनको काटें जिस तरह का संरक्षण मध्यप्रदेश सरकार और उत्तरप्रदेश सरकार जंगली जानवरों को बचाने के लिए नए नए उपाय चलती है उसी तरह बुंदेलखंड में जंगलों को बचाना चाहिए ! जो तालाब बुंदेलखंड में चंदेलकालीन है उनको फिर से नया रूप देना चाहिए और जो तालाब खत्म हो चुके हैं उनको फिर से बनाना चाहिए ! क्योंकि बुंदेलखंड में पानी की समस्या आज से नहीं वर्षों से चली आ रही है इसलिए बुंदेलखंड में पानी रोकने के लिए चंदेलकालीन राजाओं ने बहुत अच्छी प्रनाड़ी बना रखी थी जिसके तहत अगर किसी तालाब का पानी बाहर भी जाता है तो वो आगे जाकर किसी दूसरे तालाब को भर देता था लेकिन वो तालाब आज या तो खत्म हो गए हैं या उन पर लोगों द्वारा खेती की जा रही है ! राज्य और भारत सरकार को चाहिए की उन तालाबों की जानकारी ले कर उन तालाबों का पुनरोद्धार किया जाना चाहिए न की बलराम सागर और अन्य तरह के तालाब बनाने की योजना बनाना चाहिए ! क्योंकि इन योजनाओं का फायदा केवल गावं के सरपंचों और प्रधानो को मिल रहा है क्यों जिन लोगों के पास कुछ भी नहीं था आज वो लोग ४ पहिये वहां लेकर घूम रहे है और न तो किसी तलब का निर्माण होता है और न ही उसका फायदा गावों के लोगों को मिलता है ! अगर सरकार किसी तरह का १ अभियान चलाये और उसमे पता लगाये की किसी सरपंच या प्रधान पद पर आने से पहले उसके परिवार के पास कितनी संपत्ति थी और ५ साल बाद उसके परिवार के पास कितनी संपत्ति है तो सारी बात सामने आ जाएगी !
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केन बेतवा नदी गठजोड़ परियोजना नहीं.. बुंदेलखंड (bundelkhand की खामोश मौत !
आज सारा विश्व एक कुनबे के रूप में आम जन मंच पर खड़े होकर अपने अपने देश, प्रदेश की वसुन्धरा को बचाने की गुहार करने की मुहिम में बढ़ चढ़कर हिस्सा ले रहा है वहीं वीभत्स अकाल यात्रा के कारण पिछले छः वर्षों से अकाल की मांद में पिसता चला आ रहा बुन्देलखण्ड अपनी उसी पुरानी टीस के साथ आज विष्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर केन बेतवा नदी (betwa river) गठजोड़ परियोजना के विरोध में सामूहिक रूप से सड़कों पर अपनी ही अस्मिता की जन सुनवाई लेकर केन्द्र और राज्य सरकारों के सामने विरोध में आ खड़ा हुआ है। चित्रकूट धाम मण्डल जनपद बांदा में आज प्रातः जब सारा विश्व, विश्व पर्यावरण दिवस पर अपनी-अपनी औपचारिकताऎं महज निभाकर जलवायु परिवर्तन से टूट चुकी धरती के प्रति संवेदना व्यक्त करने का प्रयत्न कर रहा था उसी समय बदहाली से दशकों पीछे पहुंच चुका बुन्देलखण्ड जल संकट को आम जन मुद्दा बनाते हुए केन बेतवा नदी गठजोड़ के खिलाफ एक सामूहिक हस्ताक्षर अभियान एवं हजारों जन संदेश लिखित पोस्टकार्डों जो कि मा0 प्रधानमंत्री डां0 मनमोहन सिंह को संबोधित हैं में अपनी क्षेत्र की परिस्थितियों एवं व्यवहारिक परिणीतियों को व्यक्त कर प्रेषित करने की जुगत में 52 डिग्री दहकते तापमान के बीच भूख और प्यास को झेलते हुए बूढ़े, बच्चे, महिलायें और खासकर गरीब किसान के साथ सैकड़ो अधिवक्ता कचेहरी कैम्पस, महेश्वरी देवी चैराहा, न्यू मार्केट, रोडवेज बस स्टैण्ड में पर्यावरण के प्रति लोगों को जागरूक करते हुए इस सामूहिक जन आन्दोलन में अपनी उपस्थिति के साथ दर्ज होने की अपील कर रहा था। इस आन्दोलन में प्रवास सोसाइटी के नेतृत्व में अन्य समाज सेवी संगठन जिनमें प्रमुख रूप से बुंदेलखंड (bundelkhand) भविष्य परिषद, मानवोदय सेवा संस्थान, बामसेफ कार्यकर्ता रामफल चैधरी, डा0 शैलेष कुमार रंजन, मन्दाकिनी बचाव की संयोजक अर्चना मिश्रा, जनषक्ति महिला संगठन एवं आषीष सागर ने उन तमाम खामियों की मुखालफत करते हुए इस प्रस्तावित परियोजना में खर्च होने वाली 7615 करोड़ की भारी भरकम राशि एवं योजना की नीति की पुर्नसमीक्षा करते हुए इसे बुंदेलखंड (bundelkhand) में गहराते हुए जलसंकट, जल, जमीन जंगल तीनों ही दृष्टि में इसको प्रतिकूल बताते हुए प्रधानमंत्री महोदय से केन बेतवा नदी गठजोड़ को मृत किये जाने की मांग करते हुए "प्लीज काल मी" कार्यक्रम के तहत सैकड़ों फोन काल्स एवं फैक्स व ज्ञापन केन्द्र सरकार को भेजे हैं और सामूहिक रूप से यह निर्णय लिया कि इस परियोजना के निर्णायक परिणाम तक प्रत्येक माह की 5 तारीख को यह आन्दोलन बुंदेलखंड (bundelkhand) के प्रति जनपद वार तहसीलों और गांवों में चलाया जायेगा। ‘‘नदियों को कल-कल बहने दो। लोगों को जिन्दा रहने दो।।’’आषीष सागर, प्रवास, बुन्देलखण्ड
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पूर्वांचल, हरितप्रदेश, बुंदेलखंड, विदर्भ और तेलंगानाआज मुझे तेलंगाना के साथियों ने दिल्ली में प्रदर्शन लिए याद किया. जंतर-मंतर पहुंचते ही मैने काले कोट वाले वकीलों के जखीरे को देखा. यह सभी विधिवेत्ता मुट्ठी बांधे अपने दांतों को भीचते हुए तेलंगाना की मांग का इजहार बड़े ही गुस्से से कर रहे थे. पिंजरे से आजाद पंछी की तरह समाजवादी निरंकुशता की कैद से आजाद मै भी वहाँ पहुंचा था. कलावती के विदर्भ के भी काफी लोग मिले जहाँ किसान आज भी आत्महत्या करते हुए असहज म्रत्यु का वरण कर रहे है. आज पूरे देश के संसदीय एवं विधानसभा क्षेत्रों की नई सीमारेखाओं का परिसीमन हो रहा है. घुट रही जन आकान्छाओं एवं क्षेत्रीय स्वाभिमान का मर्दन करते हुए तानाशाह राजनेता मात्र अपनी गद्दी के लिए चिंतित है. कुछ मायावती जी जैसे चालाक चालाक नेता है जो बिल्कुल सही प्रतीकात्मक राजनीति करते है. सुखदेव राजभर, स्वामी प्रसाद मौर्य, बाबू सिंह कुशवाहा और दारा सिंह चौहान को पद देदिया लेकिन इनके कहने से इनके समाज को और कहीं प्रतिनिधित्व मिलेगा, राम जाने? इसी तर्ज पर बहन जी उत्तर प्रदेश के बटवारे का बयान तो दे डाली लेकिन उनकी बहुसंख्यक सरकार विधानसभा से प्रस्ताव पारित कराने की प्रक्रिया से हिचकिचा रही है. प्रतीकात्मक राजनीति की बेताज महारानी चाहे कुछ करे या न करे लेकिन ढपोरशंख की भाँती वादा करने में बिल्कुल पीछे नहीं है मेरी भूतपूर्व पार्टी के अभूतपूर्व नेता का तो जवाब नहीं. उनकी पूरी राजनीति विसंगतियों की है. उत्तराखंड को प्रथक करने का प्रस्ताव करके, विरोध कर डाला. आजतक उत्तराखंड में उनकी स्वीकार्यता न है और न होगी. यूपीए सरकार बचा कर कांग्रेस की इच्छा होने के बावजूद गठबंधन नहीं किया और कांग्रेस की राजनीति को पुनर्जीवन दे कर कर भी यथावत दुश्मन भी बने रहे. वामपंथियों के साथ जा कर नारायणन को कांग्रेस के समर्थन से राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार घोषित करके कलाम साहब के पक्ष में अटलजी को सुझाव दे डाले. सोमवार दिल्ली की प्रेसवार्ता में एस.पी. जैसवाल, जगदम्बिका पाल, जितिन प्रसाद की सीट छोडी और दूसरे ही दिन पलटवार करते हुए अपना उम्मीदवार दे डाला. लोकसभा चुनावों में कई उम्मीदवारों के टिकट एक ही दिन में दो-दो बार बदल डाले. हाल में ही मेरे मामले मेरी उलझनों को सुलझाते-सुलझाते एक ब एक मुझे ही मेरे अपमान की ज्वाला में अपने अनुज के प्रायोजित शब्दबाण से झुलसा गए. अब पूर्वांचल और उत्तरप्रदेश के बटवारे को रोकने की मुहीम चला रहे है. यहाँ आज़मगढ़ का यादव भी चींख-चींख कर कह रहा है “ए भाई कबले हमहने के ईहाँ इटावा राज करी, कल्बों हमहनों क आपन राज आई की ना”. इस जनवाणी की व्याख्या मुझसा तुच्छ प्राणी क्या करे. ईश्वर करे की मेरे भूतपूर्व दल के अभूतपूर्व नेता उत्तराखंड की भाँती पूर्वांचल, हरितप्रदेश और बुंदेलखंड की जनाभावनों के प्रतिकूल अपने राजनैतिक आचरण को सुधारें वरना उन्हें राजनीति के हाशिये पर जा कर अपने ही गृह जनपद इटावा के प्रसिद्द कवि श्री गोपालदास नीरज का यह गीत न गाना पड़े, “कारवाँ गुजर गया और हम खड़े-खड़े गुबार देखते रहे.”
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बांदा। प्रधानमंत्री डा. मनमोहन सिंह व कांग्रेस महासचिव राहुल गांधी के बुंदेलखंड (bundelkhand) आगमन की सुगबुगाहट शुरू हो गई है। प्रदेश कांग्रेस के महासचिव तथा बांदा सदर के विधायक विवेक सिंह की देखरेख में स्थानीय जीआईसी मैदान में जनसभा की तैयारियां भी शुरू कर दी गई हैं। कांग्रेस खेमें से 15 मई के आसपास प्रधानमंत्री व राहुल गांधी के बांदा आगमन की जानकारी मिल रही है। बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के गढ़ बुंदेलखंड (bundelkhand) में सेंधमारी की चल रही कांग्रेस की गतिविधियों में यह कार्यक्रम महत्वपूर्ण माना जा रहा है। कांग्रेस के प्रदेश महासचिव और मीç़डया प्रभारी तथा बांदा सदर विधायक विवेक सिंह ने बताया, ""प्रधानमंत्री डा$ मनमोहन सिंह व कांग्रेस के महासचिव राहुल गांधी की संभावित जनसभा 15 मई के आसपास होगी। यहां के जीआईसी ग्राउंड में हम इसकी तैयार कर रहे हैं।"" बीते साल भी राहुल गांधी ने बुंदेलखंड (bundelkhand) के कई गांवों का गुपचुप दौरा किया था तथा इस दौरान दलितों के घरों में रूककर बसपा की नींद उ़डा दी दी थी। उल्लेखनीय है कि मायावती सरकार में बांदा के नसीमुद्दीन सिद्दीकी, बाबू सिंह कुशवाहा व दद्दू प्रसाद, अमरनाथ भास्कर व गंगा प्रसाद सहित दो दर्जन बसपाइयों को मंत्री पद के साथ-साथ विभिन्न आयोगों, निगमों में पदासीन कर लालबत्ती से नवाजा गया है। बसपा के जिला महासचिव लल्लू प्रसाद निषाद का कहना है, ""पीएम या राहुल के आने का कोई खास असर नहीं प़डता है। दलित समाज जागरूक हो गया है। अब नाटक-नौटंकी का जमाना नहीं रहा।
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