विदर्भ नहीं , बुंदेलखंड के किसानों पर बनी है आमिर की “पीपली लाइव” : संजय पाण्डेय नई दिल्ली । बुंदेलखंड एकीकृत पार्टी के संयोजक संजय पाण्डेय के अनुसार आमिर खान की हाल ही में रिलीज हुई फिल्म “पीपली लाइव” विदर्भ नहीं बल्कि बुन्देलखंड के किसानो को लेकर बनी है। बुंदेलखंड के रायसेन जिले के बडवाई गाँव में फिल्माई गई इस फिल्म में बुन्देली संस्कृति तथा रहन सहन के साथ साथ पूरी तरह बुन्देली बोली ही प्रयुक्त की गयी है । उदाहारण के लिए नत्था की पत्नी धनिया अपने जेठ बुधिया से पूछती है ” काये कछू भओ का आज ?” तो उत्तर में बुधिया कहता है कि ” पईसा तौ मिले नैयाँ ” । कहने का तात्पर्य पात्रों के बीच बातचीत में ठेठ बुन्देली ही प्रयुक्त की गयी है। इतना ही नहीं बुंदेलखंड को लेकर केंद्र तथा राज्य सरकारों के बीच जो वाकयुद्ध पिछले कुछ वर्षों से चल रहा है उसको भी इस फिल्म में भी पूरी तरह समाहित किया गया है । “महगाई मारें जात है ” नामक चर्चित गाना बुन्देली साज-बाज के साथ गाया गया एक बुन्देली लोक गीत है । उल्लेखनीय है कि पिछले पॉँच वर्षों के दौरान बुन्देलखण्ड में लाखों किसान सूखे से प्रभावित हुए थे। इसके चलते यहाँ से भारी पलायन तथा भुखमरी के साथ साथ किसानों द्वारा आत्म हत्याओं की ख़बरें देश दुनिया तक पहुंची थी । इसी विषय को लेकर आमिर खान ने “पीपली लाइव” फिल्म बना डाली। किन्तु फिल्म में बुन्देलखंड के किसानों के हालातों का प्रस्तुतीकरण निंदनीय है। The script is installed correctly. Please login at seoslave.com to configure your website.
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बुंदेलखंड में फिर से अकाल की संभावना : बुंदेलखंड में पानी की समस्या हर साल बदती जा रही है परन्तु बुंदेलखंड के लोग आज भी राजनीति का मुंह देख रहे है की वो बुंदेलखंड के विकास करेंगे , नहीं ! बुंदेलखंड के लोगों से में प्रमोद रावत प्रार्थना करता हूँ की अपने पर्यावरण को बचाएं बुंदेलखंड का प्रत्येक व्यक्ति पेड़ पोधे लगाये जिससे बुंदेलखंड में पर्यावरण संतुलन बन जाये में राजनीतिक पार्टियों से यही अनुरोध है की बस बुंदेलखंड में कोई पेड़ पोधे लगाने की योजना बनाये जिससे लोग उनको लगायें और पेड़ पोधों को बचाने का प्रयास करें न की उनको काटें जिस तरह का संरक्षण मध्यप्रदेश सरकार और उत्तरप्रदेश सरकार जंगली जानवरों को बचाने के लिए नए नए उपाय चलती है उसी तरह बुंदेलखंड में जंगलों को बचाना चाहिए ! जो तालाब बुंदेलखंड में चंदेलकालीन है उनको फिर से नया रूप देना चाहिए और जो तालाब खत्म हो चुके हैं उनको फिर से बनाना चाहिए ! क्योंकि बुंदेलखंड में पानी की समस्या आज से नहीं वर्षों से चली आ रही है इसलिए बुंदेलखंड में पानी रोकने के लिए चंदेलकालीन राजाओं ने बहुत अच्छी प्रनाड़ी बना रखी थी जिसके तहत अगर किसी तालाब का पानी बाहर भी जाता है तो वो आगे जाकर किसी दूसरे तालाब को भर देता था लेकिन वो तालाब आज या तो खत्म हो गए हैं या उन पर लोगों द्वारा खेती की जा रही है ! राज्य और भारत सरकार को चाहिए की उन तालाबों की जानकारी ले कर उन तालाबों का पुनरोद्धार किया जाना चाहिए न की बलराम सागर और अन्य तरह के तालाब बनाने की योजना बनाना चाहिए ! क्योंकि इन योजनाओं का फायदा केवल गावं के सरपंचों और प्रधानो को मिल रहा है क्यों जिन लोगों के पास कुछ भी नहीं था आज वो लोग ४ पहिये वहां लेकर घूम रहे है और न तो किसी तलब का निर्माण होता है और न ही उसका फायदा गावों के लोगों को मिलता है ! अगर सरकार किसी तरह का १ अभियान चलाये और उसमे पता लगाये की किसी सरपंच या प्रधान पद पर आने से पहले उसके परिवार के पास कितनी संपत्ति थी और ५ साल बाद उसके परिवार के पास कितनी संपत्ति है तो सारी बात सामने आ जाएगी !
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पूर्वांचल, हरितप्रदेश, बुंदेलखंड, विदर्भ और तेलंगानाआज मुझे तेलंगाना के साथियों ने दिल्ली में प्रदर्शन लिए याद किया. जंतर-मंतर पहुंचते ही मैने काले कोट वाले वकीलों के जखीरे को देखा. यह सभी विधिवेत्ता मुट्ठी बांधे अपने दांतों को भीचते हुए तेलंगाना की मांग का इजहार बड़े ही गुस्से से कर रहे थे. पिंजरे से आजाद पंछी की तरह समाजवादी निरंकुशता की कैद से आजाद मै भी वहाँ पहुंचा था. कलावती के विदर्भ के भी काफी लोग मिले जहाँ किसान आज भी आत्महत्या करते हुए असहज म्रत्यु का वरण कर रहे है. आज पूरे देश के संसदीय एवं विधानसभा क्षेत्रों की नई सीमारेखाओं का परिसीमन हो रहा है. घुट रही जन आकान्छाओं एवं क्षेत्रीय स्वाभिमान का मर्दन करते हुए तानाशाह राजनेता मात्र अपनी गद्दी के लिए चिंतित है. कुछ मायावती जी जैसे चालाक चालाक नेता है जो बिल्कुल सही प्रतीकात्मक राजनीति करते है. सुखदेव राजभर, स्वामी प्रसाद मौर्य, बाबू सिंह कुशवाहा और दारा सिंह चौहान को पद देदिया लेकिन इनके कहने से इनके समाज को और कहीं प्रतिनिधित्व मिलेगा, राम जाने? इसी तर्ज पर बहन जी उत्तर प्रदेश के बटवारे का बयान तो दे डाली लेकिन उनकी बहुसंख्यक सरकार विधानसभा से प्रस्ताव पारित कराने की प्रक्रिया से हिचकिचा रही है. प्रतीकात्मक राजनीति की बेताज महारानी चाहे कुछ करे या न करे लेकिन ढपोरशंख की भाँती वादा करने में बिल्कुल पीछे नहीं है मेरी भूतपूर्व पार्टी के अभूतपूर्व नेता का तो जवाब नहीं. उनकी पूरी राजनीति विसंगतियों की है. उत्तराखंड को प्रथक करने का प्रस्ताव करके, विरोध कर डाला. आजतक उत्तराखंड में उनकी स्वीकार्यता न है और न होगी. यूपीए सरकार बचा कर कांग्रेस की इच्छा होने के बावजूद गठबंधन नहीं किया और कांग्रेस की राजनीति को पुनर्जीवन दे कर कर भी यथावत दुश्मन भी बने रहे. वामपंथियों के साथ जा कर नारायणन को कांग्रेस के समर्थन से राष्ट्रपति पद का उम्मीदवार घोषित करके कलाम साहब के पक्ष में अटलजी को सुझाव दे डाले. सोमवार दिल्ली की प्रेसवार्ता में एस.पी. जैसवाल, जगदम्बिका पाल, जितिन प्रसाद की सीट छोडी और दूसरे ही दिन पलटवार करते हुए अपना उम्मीदवार दे डाला. लोकसभा चुनावों में कई उम्मीदवारों के टिकट एक ही दिन में दो-दो बार बदल डाले. हाल में ही मेरे मामले मेरी उलझनों को सुलझाते-सुलझाते एक ब एक मुझे ही मेरे अपमान की ज्वाला में अपने अनुज के प्रायोजित शब्दबाण से झुलसा गए. अब पूर्वांचल और उत्तरप्रदेश के बटवारे को रोकने की मुहीम चला रहे है. यहाँ आज़मगढ़ का यादव भी चींख-चींख कर कह रहा है “ए भाई कबले हमहने के ईहाँ इटावा राज करी, कल्बों हमहनों क आपन राज आई की ना”. इस जनवाणी की व्याख्या मुझसा तुच्छ प्राणी क्या करे. ईश्वर करे की मेरे भूतपूर्व दल के अभूतपूर्व नेता उत्तराखंड की भाँती पूर्वांचल, हरितप्रदेश और बुंदेलखंड की जनाभावनों के प्रतिकूल अपने राजनैतिक आचरण को सुधारें वरना उन्हें राजनीति के हाशिये पर जा कर अपने ही गृह जनपद इटावा के प्रसिद्द कवि श्री गोपालदास नीरज का यह गीत न गाना पड़े, “कारवाँ गुजर गया और हम खड़े-खड़े गुबार देखते रहे.”
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