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सागर जिला-

मध्य प्रदेश के उत्तर-मध्य क्षेत्र में स्थित सागर जिला 10252 वर्ग किमी. के क्षेत्रफल में फैला हुआ है। सागर का अर्थ समुद्र होता है और इसका यह नाम शहर के बीचों बीच स्थित एक झील के कारण पड़ा है। झील के तट पर ही सागर किला बना हुआ है। इस शहर की स्थापना 1660 ईसवीं में उदन शाह ने की थी। नोरादेही वन्यजीव अभ्यारण्य इस शहर का मुख्य आकर्षण है। इसके अलावा बीना, नैनागिरी, खुरई, राहतगढ़, रहली, गरहाकोटा, खिमलासा, अबचंद और देवरी आदि यहां के अन्य लोकप्रिय दर्शनीय स्थल हैं। सागर के निवासियों की लोक गीत-संगीत की समृद्ध परंपरा है। बरदी, मोनी, साइरा और धीमरयाई यहां के लोकप्रिय लोक नृत्य हैं।

 

सागर
सागर की एक झलक
राहतगढ़ जलप्रपात

सागर जिला भारत के राज्य मध्य प्रदेश का एक संभाग है । संभाग का मुख्यालय सागर है । संभाग में सागर के अतिरिक्‍त चार अन्‍य जिले हैं, जिनमें से सागर भी एक है. अन्‍य चार जिले दमोह, छतरपुर (chhatarpur) , पन्‍ना और टीकमगढ़(tikamgarh) हैं। भौगोलिक स्थिति भारत के मध्य भाग में 23.10 उत्तरी अक्षांश से 24.27 उत्तरी अक्षांश तथा 78.5 पूर्व देशांस से 79.21 पूर्व देशांस के मध्य फैला सागर जिला मध्य प्रदेश के उत्तर मध्य में स्थित है। यह क्षेत्र आमतौर पर बुंदेलखंड (bundelkhand) के रूप में जाना जाता है। इसके उत्तर में छतरपुर (chhatarpur) और ललितपुर (lalitpur) , पश्चिम में विदिशा व गुना, दक्षिण में नरसिंहपुर, पश्चिम-दक्षिण में रायसेन तथा पूर्व में दमोह जिले की सीमाएं लगती हैं। जिले के दक्षिणी भाग से कर्क रेखा गुजरती है। भौगोलिक दृष्टि से सागर देश के मध्य भाग में स्थित है और इसे ‘‘भारत का हृदय’’ कहना उचित होगा। प्रमुख नदियां व प्राकृतिक संसाधन सागर जिले में प्रमुख रूप से धसान (Dhasan), बेबस, बीना (Bina), बामनेर और सुनार नदियां निकलती हैं। इसके अलावा कड़ान, देहार, गधेरी व कुछ अन्य छोटी बरसाती नदियां भी हैं। अन्य प्राकृतिक संसाधनों के मामले में सागर जिले को समृद्ध नहीं कहा जा सकता लेकिन वास्तव में जो भी संसाधन उपलब्ध हैं, उनका बुद्धिमत्तापूर्ण दोहन बाकी है। कृषि उत्पादन में सागर जिले के कुछ क्षेत्रों की अच्छी पहचान हैं। खुरई तहसील में उन्नत किस्म के गेहूं का उत्पादन बड़ी मात्रा में होता है। अक्षांश - 23.10 से 24.27 उत्तर देशांतर - 78.5 से 79.21 पूर्व औसत वर्षा - 1252 मि.मी. प्रमुख धंधे - बीड़ी निर्माण एवं कृषि प्रमुख फसलें - सोयाबीन, गेहूं उद्योग धंधे सागर में मूलत: कोई बड़ा उद्योग नहीं है. ग्रामीण क्षेत्रों में लोग मुख्‍य रूप से कृषि एवं मजदूरी करते हैं लेकिन शहर में बड़ी संख्या में लोग बीड़ी तथा अगरबत्ती बनाने का काम भी करते हैं. सागर के औद्योगिक विकास के लिए कोई ठोस प्रयास नहीं किए गए. इसी कारण जिले में कुछ छिटपुट कारखानों को छोड़कर कोई प्रमुख औद्योगिक गतिविधियां नहीं होती हैं. करीब एक दशक पहले केंद्र सरकार ने जिले की बीना तहसील के आगासौद गांव में ओमान सरकार के सहयोग से विशाल तेल रिफायनरी स्थापित करने की घोषणा की थी, लेकिन तमाम अवरोधों के चलते अब तक इस विशाल परियोजना की ढंग से शुरुआत भी नहीं हो सकी है. इतिहास विंध्य पर्वत श्रृंखला के बीच स्थित यह जिला पुराने समय से ही मध्य भारत का एक महत्वपूर्ण केंद्र रहा है. सागर के आरंभिक इतिहास की कोई निश्चित जानकारी तो उपलब्ध नहीं है, लेकिन पुस्तकों में दर्ज विवरणों के अनुसार प्रागैतिहासिक काल में यह क्षेत्र गुहा मानव की क्रीड़ा स्थली रहा. पौराणिक साक्ष्यों से ऐसे संकेत मिलते हैं कि इस जिले का भूभाग रामायण और महाभारत काल में विदिशा और दशार्ण जनपदों में शामिल था. इसके बाद ईसा पूर्व छटवीं शताब्दी में यह उत्तर भारत के विस्तृत महाजनपदों में से एक चेदी साम्राज्‍य का हिस्सा बन गया. इसके उपरांत ज्ञात होता है कि इसे पुलिंद देश में सम्मिलित कर लिया गया. पुलिंद देश में बुंदेलखंड (bundelkhand) का पश्चिमी भाग और सागर जिला शामिल था. सागर के संबंध में विस्तृत जानकारी ‘टालमी’ के लिखे विवरणों से प्राप्त होती है. टालमी के अनुसार ‘फुलिटों’ (पुलिंदौं) का नगर ‘आगर’ (सागर) था. गुप्त वंश के शासनकाल में इस क्षेत्र को सर्वाधिक महत्व मिला. समुद्रगुप्त के समय में एरण को स्वभोग नगर के रूप में उद्धृत किया गया है और यह राजकीय तथा सैन्य गतिविधियों का एक महत्वपूर्ण केंद्र था. नवमीं शताब्दी में यहां चंदेल और कलचुरी राजवंशों का आधिपत्य हुआ और 13-14वीं शताब्दी में मुगलों का शासन शुरू होने से पूर्व यहां कुछ समय तक परमारों का शासन भी रहने के संकेत मिलते हैं. ऐतिहासिक साक्ष्‍यों के अनुसार सागर का प्रथम शासक श्रीधर वर्मन को माना जाता है। पंद्रहवीं शताब्दी के उत्तरार्द्ध में सागर पर गौंड़ शासकों ने कब्जा जमाया. फिर महाराजा छत्रसाल ने धामोनी, गढ़ाकोटा और खिमलासा में मुगलों को हराकर अपनी सत्ता स्थापित की लेकिन बाद में इसे मराठाओं को सौंप दिया. सन् 1818 में अंग्रेजों ने अपना कब्जा जमाया और यहां ब्रिटिश साम्राज्‍य का आधिपत्य हो गया. सन् 1861 में इसे प्रशासनिक व्यवस्था के लिए नागपुर में मिला दिया गया और यह व्यवस्था सन् 1956 में नए मध्यप्रदेश राज्‍य का गठन होने तक बनी रही

सागर जिले की कुछ प्रमुख स्थान-

नैनागिरी- रेशनडिगिरी नाम से लोकप्रिय नैनागिरी एक प्राचीन और पवित्र नगर है। यहां 36 जैन मंदिर एक पहाड़ी पर और 15 मंदिर एक घाटी पर बने हुए हैं। सभी मंदिर शिखरनुमा हैं और चारों तरफ से दीवार से घिर हुए हैं। इसमें से एक मंदिर एक तालाब के बीचोंबीच बना है, जो बेहद आकर्षक लगता है।

बड़े बाबा का मंदिर- बड़े बाबा का मंदिर नैनागिरी का प्रथम मंदिर कहलाता है। पार्श्‍वनाथ मंदिर के प्रमुख आराध्य देव हैं जिनकी 11 फीट ऊंची प्रतिमा यहां स्‍थापित है। पांच संतों की सफेद मूर्तियां भी मंदिर में स्थापित हैं।

बारा मंदिर- माना जाता है कि बारा मंदिर लगभग 100 साल पहले धरती से निकला था। मंदिर में पार्श्‍वनाथ की 4 फीट 7 इंच की खड़ी प्रतिमा स्थापित है। 11वीं और 12वीं शताब्दी की 13 मूर्तियां भी यहां पूजी जाती हैं।

मगरमच्छ केन्द्र- देवरी का यह मगरमच्छ केन्द्र इस तरह का अनोखा स्थान है। यहां चंबल नदी में मगरमच्छों के प्रजनन और पुर्नवास का काम किया जाता है। यहां करीब 1600 घडियाल और 200 मगरमच्छों को देखा जा सकता है।

श्री दिगंबर जैन चौधरी मंदिर- गरहा कोटा के इस दिगंबर जैन मंदिर में 63 मूर्तियां देखी जा सकती हैं। मंदिर में स्थापित पार्श्‍वनाथ की प्रतिमा के शीश को 1000 सापों ने घेर रखा है। मंदिर का शिखर 60 फीट तक ऊंचा है। गरहा कोटा सागर से 28 मील की दूरी पर है। दमोह में यहां का नजदीकी रेलवे स्टेशन है।

श्री बीना बाराह तीर्थ- सागर जिले के बीना में स्थित यह तीर्थस्थल भगवान शांतिनाथ को समर्पित है। मंदिर की मुख्य मूर्ति को काफी कलात्मक तरीके से ईंट और गारे से निर्मित किया गया है। भगवान ऋषभदेव और अन्य जैन र्तीथकरों की आकर्षक मूर्तियां भी यहां देखी जा सकती है। यह तीर्थस्थल देवरी से 6 किमी. और सागर से 72 किमी. की दूरी पर है।

ईसूरवर- विन्ध्य पर्वत की एक पहाड़ी पर स्थित यह खूबसूरत गांव सागर से करीब 25 किमी. दूर है। इस गांव को राज्य के जैन तीर्थ का प्रमुख केन्द्र माना जाता है। यहां का ईसूरवर जैन मंदिर खासा लोकप्रिय है। यहां आयोजित होने वाली रथयात्रा और निर्वाण पर्व बड़ी धूमधाम से मनाए जाते हैं।

बमोरा- खुरई ताल्लुक का यह गांव यहां बने प्राचीन मंदिर के लिए लोकप्रिय है। पत्थरों से बने इस मंदिर में किसी प्रकार के मसाले का इस्तेमाल नहीं किया गया है। मंदिर में भगवान वराह की लौह प्रतिमा स्थापित है। साथ ही एक घुडसवार की सुंदर मूर्ति भी यहां देखी जा सकती है। मंदिर के भीतर शिव की प्रतिमा भी स्थापित है। अनेक बौद्ध अवशेष भी बमोरा में देखे जा सकते हैं।

धमोनी- झांसी रोड़ पर स्थित धमोनी क्षेत्र अपने 52 एकड में फैले किले के लिए चर्चित है। पुरातात्विक दृष्टि से भी यह एक महत्वपूर्ण स्थल है। प्रकृति ने इस स्थान को अनुपम सुंदरता प्रदान की है।

भापेल- राहतगढ़ रोड पर स्थित यह खूबसूरत गांव सागर से लगभग 15 किमी. की दूरी पर है। यहां स्थित महादेव मंदिर के कारण इस स्थान को फूलर नाम से भी जाना जाता है। महादेव मंदिर को यहां के स्थानीय निवासी फूलनाथ कहकर पुकारते हैं। 15 दिसंबर 1857 को यहां ब्रिटिश सेना और विद्रोहियों के बीच भयंकर मुठभेड हुई थी।

रणगीर- दाहर नदी के तट पर बसा यह शांत और प्रदूषण मुक्त गांव रेहली से 17 किमी. और सागर से 34 किमी. दूर है। इसी स्थान पर छत्रसाल बुन्देला और दमोनी के मुगल फौजदार खालिक के बीच टकराव हुआ था। हरसिद्धी देवी मंदिर यहां का मुख्य आकर्षण है। अश्विनी और चैत्र में महीने में यहां मेला लगता है। यहां के सरकारी रेस्ट हाउस में ठहरने की व्यवस्था है।

सागर जिले का वर्गीकरण इस प्रकार है

जिला क्षेत्रफल (वर्ग कि.मी.) जनसंख्या तहसील विकासखंड संभाग
सागर 6,375 20,21,783

सागर,राहतगढ़,रहली,बीना,
गडाकोटा,देवरी,केसली,
बंडा,शाहगढ़,खुरई,मालथोन

सागर,राहतगढ़,रहली,बीना,
गडाकोटा,देवरी,केसली,
बंडा,शाहगढ़,खुरई,मालथोन,जैसीनगर

सागर
Area 6375 sq. km
Latitude 23° 10’ to 24° 27’ North
Longitude 78° 4’ to 79° 21’ East
Population (2001) 2021783
Males 1073032
Females 948751
Sex Ratio 884 females per 1000 males
Literacy Rate 60.08%
No. of Tehsil 11
No.of Blocks 12
Postal Code 470001
STD Code 07582
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