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सूर्य मंदिर मड़खेरा टीकमगढ़

टीकमगढ़ मोहनगढ़ बस मार्ग पर शिवराजपुर नाला पार करने पर एक कच्चा मार्ग बांयी ओर से सीधा मड़खेरा की ओर जाता है। जिला मुख्यालय से इस स्थान की कुल दूरी 22 किलोमीटर है गांव तो मात्र एक खिरक समान ही है। परंतु सूर्य मठ होने से मड़खेरा प्रसिद्ध है। यह सूर्य मंदिर जिसे स्थानीय लोग मठ भी कहते है। विशाल एवं कलात्मक है। इसकी छैकन भूमितल से 3 फुट ऊँची है। छैकन पर एक फुट ऊँचा मंदिर का आसन है। जिस पर कवशाल मंदिर खड़ा हुआ है। मंदिर पत्थर का बना हुआ है। जिसका कलश तो गायब है परंतु कमल चक्र यथावत् है। मंदिर का द्वार पूर्व की ओर है। मुख्य द्वार के सामने सभा मंडच है जो तीन ओर से खुला हुआ है। सामने दो अलंकृत खम्भे हे। खंभों पर फूल पत्ती की बेलें लटकते हुये घंटे मनमोहक है। प्रवेश द्वार की ऊपरी चैखट पर सूर्य नारायण मय सात अश्व रथ निर्मित है।

चैखट के आजू-बाजू दोंनो तरफ गंगा जमुना लहरी मय मकरंद एवं कच्छप दर्शाये गये हैं। मंदिर का आंतरिक भाग रक्ताभ दिखाई पड़ता है। गर्भगृह दो भागों में विभक्त है। प्रथम भाग चैखट से संलग्न 4 फुट का पुजारी प्रकोष्ठ एवं द्वितीय मुख्य गर्थ जो 8 फुट वर्गागार है। गर्भगृह में एक उच्चासन पर भगवान सूर्य की विशाल प्रतिमा प्रतिष्ठत है। मूर्ति मुकुट से जूतों तक अलंकृत है। कानों में कुण्डल,गलों में मालायें,हार,कटि में करधनी,धोती दुपट्टा धारण किये है। मस्तक के पीछे प्रभामंडल है। सूर्य भगवान के दायें बायें उनकी पत्निया ऊषा एवं प्रत्युषा खड़ी है। जिनके समीप मालाधारी व्योमचारी मिथुन है। नीचे आरन शिला पर आजू बाजू दो सेविकायें एवं दो पुरुष दंड एवं पिंगल खडे हुये है। गर्भगृह का भीतरी भाग साफ सपाट है। अलबत्ता बायें भाग की दीवार पर 4 स्थानों पर शब्दांकन है। प्रथम चार अक्षर ह ज उ श हैं। द्वितीय पर दो पं रां चैथे पर त्रउरु जल हैं। इस चैथे लेख से संवत 765 अर्थात सन् 638 ई. का आभाष होता है। जों मंदिर निर्माण का वर्ष हो सकता है। यह सूर्य मंदिर वाकाटकों या वर्धन सम्राट हर्ष द्वारा बनवाया हुआ हो सकता है। क्योकि वह सूर्य उपासक भी थे।

मड़खेरा सूर्य मंदिर का बाहरी हिस्सा भी नाना देवी देवताओं की मूतियों से अलंकृत है। जिसमें शीतला देवी, अष्ठभुजीधारी दुर्गा, अष्टभुजी नटराज, इन्द्रमय ऐरापति, अग्निदेव दायें हाथ में माला बायें हाथ में कमंडल लिये समीप में है। उनका वाहन मेष, समीप में ही उनकी पत्नी स्वाहा खडी हुई है। यम,कुबेर,वरुण,वायु और गणेश की मूतियां भी अंकित हैं। मत्सय बाराह और नृसिंह आदि की मूतियां भी है। मंदिर के दक्षिणी- पश्चिमी और उत्तरी भाग के मध्य के गवाक्षों में सूर्य भगवान की मूतियां मध्य अश्वरथ संजोई गई है। मंदिर का निर्माण संरचना बाहर से अष्ठभुजा युक्त लगता है। जबकि 15 फुट से ऊँचे कमल चक्र तक क्रमशः गोलाकार एवं पतला होता गया है। मूतियों का अंकन निचले हिस्ते है। जबकि शिखर वाले हिस्से को घोंडो के खुर की टाप डिजाइन से अलंकृत किया गया है। खुर की डिजाइन रचना मनमोहक है। यह अश्वटाप शैली अलंकृत संभवतः सूर्य मंदिर के लिये ही प्रयुक्त की गई हो। गर्भगृह और सभामंडप के मध्य पुजारी प्रकोष्ठ के ऊपर, एक आसन पर एक विशाल सिंह पूंछ उठाये, पूर्वाभिमुख पैरों में एक हाथी दबोचे खड़ा है। जिसके दांये बाये दो योद्धा खड़े है। सिंह प्रकाश एवं सूर्य पताका का चिन्ह है। निश्चत ही मड़खेरा सूर्य मंदिर बुंदेलखंड की विशिष्ट सांस्कृतिक धरोहर है।

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