अनसुइया अत्री आश्रम स्फटिक शिला से लगभग 4 किमी. की दूरी पर घने वनों से घिरा यह एकान्त आश्रम स्थित है। इस आश्रम में अत्री मुनी, अनुसुइया, दत्तात्रेयय और दुर्वाशा मुनी की प्रतिमा स्थापित हैं। | ऐसा कहा जाता है जब अत्रि मुनि यहां से कुछ ही दूरी पर तपस्या कर रहे थे तो उनकी पत्नी अनसूइया ने पतिव्रता धर्म का पालन करते हुए इस स्थान पर अपना निवास बनाया था। कविंदती है कि देवी अनसूइया की महिमा जब तीनों लोगों में गाए जाने लगी तो अनसूइया के पतिव्रत धर्म की परीक्षा लेने के लिए पार्वती, लक्ष्मी और सरस्वती ने ब्रह्मा, विष्णु और महेश को मजबूर कर दिया। पौराणिक कथा के अनुसार तब ये त्रिदेव देवी अनसूइया की परीक्षा लेने साधुवेश में उनके आश्रम पहुंचे और उन्होंने भोजन की इच्छा जाहिर की। लेकिन उन्होंने अनुसूइया के सामने शर्त रखी कि वह उन्हें गोद में बैठाकर ऊपर से निर्वस्त्र होकर आलिंगन के साथ भोजन कराएंगी। इस पर अनसूइया संशय में पड़ गई। उन्होंने आंखें बंद कर अपने पति को स्मरण किया तो सामने खड़े साधुओं के रूप में उन्हें ब्रह्मा, विष्णु और महेश खड़े दिखलाई दिए। अनुसूइया ने मन ही मन अपने पति का स्मरण किया और त्रिदेव छह महीने के शिशु बन गए। तब माता अनसूइया ने त्रिदेवों को उनकी शर्त के अनुरूप ही भोजन कराया। इस प्रकार त्रिदेव बाल्यरूप का आनंद लेने लगे। उधर तीनों देवियां अनसूइया के समक्ष अपने पतियों को मूल रूप में लाने की प्रार्थना करने लगीं। अपने सतीत्व के बल पर अनसूइया ने तीनों देवों को पिफर से पूर्व में ला दिया। तभी से वह मां सती अनसूइया के नाम से प्रसिद्ध हुई। मंदिर के गर्भ गृह में अनसूइया की भव्य पाषाण मूर्ति विराजमान है, जिसके ऊपर चांदी का छत्र रखा है। मंदिर परिसर में शिव, पार्वती, भैरव, गणेश और वनदेवताओं की मूर्तियां विराजमान हैं। मंदिर से कुछ ही दूरी पर अनसूइया पुत्र भगवान दत्तात्रेय की त्रिमुखी पाषाण मूर्ति स्थापित है। अब यहां पर एक छोटा सा मंदिर बनाया गया है। मंदिर से कुछ ही दूरी पर महर्षि अत्रि की गुफा और जल प्रपात का विहंगम दृश्य श्रद्धालुओं और साहसिक पर्यटन के शौकीनों के लिए आकर्षण का केंद्र है क्योंकि गुफा तक पहुंचने के लिए सांकल पकड़कर रॉक क्लाइबिंग भी करनी पड़ती है। गुफा में महर्षि अत्रि की पाषाण मुर्ति है। गुफा के बाहर अम़त गंगा और जल प्रपात का द़श्य मन मोह लेता है। यहां का जलप्रपात शायद देश का अकेला ऐसा जल प्रपात है जिसकी परिक्रमा की जाती है। साथ ही अमृतगंगा को बिना लांघे ही उसकी परिक्रमा भी की जाती है। ठहरने के लिए यहां पर एक छोटा लॉज उपलब्ध है। आधुनिक पर्यटन को चकाचौंध से दूर यह इलाका इको-फ्रैंडली पर्यटन का नायाब उदाहरण भी है। यहां भवन पारंपरिक पत्थर और लकडि़यों के बने हैं। हर साल दिसंबर के महीने में अनसूइया पुत्र दत्तात्रेय जयंती के मौके पर यहां एक मेले का आयोजन किया जाता है। मेले में आसपास के गांव के लोग अपनी-अपनी डोली लेकर पहुंचते हैं। वैसे पूरे साल भर यहां की यात्रा की जाती है। इसी स्थान से पंचकेदारों में से एक केदार रुद्रनाथ के लिए भी रास्ता जाता है। यहां से रुद्रनाथ की दूरी तकरीबन 7-8 किलोमीटर है। प्रकृति के बीच शांत और भक्तिमय माहौल में श्रद्धालु और पर्यटक अपनी सुधबुध खो बैठता है। |
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