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Bundelkhand Package is not going properly. |
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Written by Pramod Rawat
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Wednesday, 10 August 2011 12:06 |
| भरोसे की चक्की में पिसते किसान | | प्रणव सिरोही / बांदा August 09, 2011 |
पैकेज के बावजूद बुंदेलखंड में किसानों की आत्महत्या के मामलों में कमी नहीं आ रही है। पिछले पांच महीनों में ही किसानों की आत्महत्या के लगभग 520 मामले सामने आए हैं। सूखे के दुष्चक्र, नकली बीजों के फेर, फसल बीमा के फायदे से महरूम, कर्ज की मार में फंसे किसान जिंदगी से हार मानते दिख रहे हैं। बांदा के सांसद आर के सिंह पटेल कहते हैं, 'पैकेज का नियोजन सही तरीके से नहीं किया गया है। इसे उन लोगों ने तैयार किया है, जिनका जमीनी हकीकत से कोई वास्ता नहीं हैं।Ó हालांकि इस साल यहां कुछ बेहतर बारिश हुई है लेकिन वह भी नाकाफी मालूम पड़ती है। पैकेज के बाद भी सिंचाई की सुविधाओं में खास फायदा नहीं हुआ है। इस इलाके में धान उगाने के लिए 1,400 रुपये और गेहूं उगाने के लिए 1,500 रुपये प्रति क्विंटल तक की लागत आती है। लागत भी वसूल न हो पाने पर परेशान किसान भला और क्या करेगा? पैकेज के तहत किसानों को मुफ्त बीज और खाद की व्यवस्था भी की गई है। लेकिन पिछले वर्ष कई ऐसे बीज बांट दिए गए जिनसे फसल ही नहीं उगी। किसान आसा राम बताते हैं कि वे 'पेटेंटÓ बीज थे, जिनसे दोबारा फसल नहीं हो पाती क्योंकि उनसे फसल पहले ही ली जा चुकी थी। जब कोहराम मचा तो प्रशासन ने कुछ कार्यवाही का भरोसा जताया लेकिन फसल बीमा के नाम पर भी किसानों को कोई राहत नहीं मिली क्योंकि केवल प्राकृतिक आपदा की स्थिति में ही यह लाभ मिलता है। पाले से नष्टï हुई दलहन फसलों के मामले में भी ऐसा ही हुआ। तब भी किसान मुआवजे से महरूम रह गए। हालांकि किसानों के लिए एक अच्छी है कि पाले को भी जल्द ही प्राकृतिक आपदा की श्रेणी में लिया जा सकता है और कृषि मंत्री शरद पवार इस मसले को कैबिनेट की मंजूरी दिलाने की कोशिशों में लगे हैं। किसान क्रेडिट कार्ड का भी कोई फायदा नहीं नजर आ रहा है। आमदनी नहीं होने के कारण कर्ज अदा नहीं हो पाता ऐसे में किसान को जमीन ही गंवानी पड़ती है। पटेल कहते हैं, 'पैकेज में मंडियों के निर्माण के लिए भारी खर्च किया जा रहा है जबकि उत्पादकता बढ़ाने पर कोई जोर नहीं हैं। जब उत्पादन नहीं होगा तो मंडियां कैसे गुलजार होंगी। किसानों को जब तक सीधे मदद नहीं मिलेगी, तो उनका भला नहीं होगा।
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