किला अजयगढ़ :–बुंदेलखंड के डंगई परिक्षेत्र के पर्वतीय वनाच्छादित केन नदी के पूर्वांचल में स्थित केदार पर्वत पर अजयगढ़ किला है अजयगढ़ नाम से ही स्पष्ट है कि यह किला अजेय रहा है। यह किला कटोरानुमा पहाड़ी के मध्य सागौन एवं तेंदू के घनघोर सघन वनसे आच्छादित 24–54 उत्तरी अक्षांश एवं 80–18 पूर्वी देशांतर में स्थित है। अजयगढ़ किला पन्ना से 40 किलोमीटर दूरी पर है। केन नदी के दॉये एवं वाघिन नदी , बेरमा के बॉये अर्थात नदी के प्राकृतिक खाई के मध्य विंध्य श्रेणी शिखर केदार है जो साक्षात प्राकृतिक कूंडे में पिंडी के जैसा दिखाई देता है। इसी केदार शिखर पर अजयगढ़ किला है। जिसे चंदेल राजा जयशक्ति ने सन् 830 ई. के लगभग बनवाया था। 50 फुट के आधार के बाद पहाड़ को सीधा काट कर किला खड़ा किला गया है जिस पर चढ़ना असंभव है। इसके अतिरिक्त चारों ओर से विशाल शिलाखण्डों की सुरक्षाभित्ती है। जिसे पार कर दुर्ग में प्रविष्ट होना कठिन है। इस दुर्ग का मुख्य दरवाजा पूर्व को है जबकि दुर्ग के अंदर पहुँचने के लिए सात दरवाजों को पार करते हुये कठिन टेढ़े–मेढ़े मार्ग से गुजरना होता है। यदि ऊपरी दरवाजे की चौकी से नीेचे पत्थर ही खिसका दिया जाएं तो शत्रु भी समाप्त और प्रवेश मार्ग भी बंद। दुर्ग निर्माण शैली का यह दुर्ग एक चमम्कार ही है जो अंग्रेजी अक्षर ’’यू’’ आकार के पहाड़ी गहरे खंदक के शीर्ष पर निर्मित है। किले पर निर्मित रंगमहल को खजुराहों कलां से बेहतर है चंदेल राजा इसी महल में रहा करते थे। अजयगढ़ किला एक पुरातत्वीय संग्रहालय जैसा है। परकोटे के पत्थरों एवं पहाड़ काटकर बनाय गये दुर्ग की प्राचीर पर देवों की प्रतिमाएं उत्कीर्ण है, जिनमें जैन प्रतिमाओं की अधिकता है। कहीं–कहीं तो जैन प्रतिमाएं लेबी पंक्तियों में देखी जाती है। ग्यारहवीं सदी के जैन मंदिर भी है। पत्थरों के सुदृढ़ भूलभुलैयाँ जैसे सात दरवाजे पार कर पहाड़ के ऊपर किले प्रांगण में पहुँचते है। दुर्ग पर रंगमहल में पत्थर काटकर कई तालाब बनाये गये है, जिनमें गंगा कुण्ड एवं यमुना कुण्ड विशेष प्रसिद्ध है तथा हर समय जल से भरे रहते है। परकोटे के अंदर किले आधार तल में पहाड़ काटकर एक गुफा मंदिर हैं जिसे भूतेश्वर शिवमंदिर के नाम से जाना जाता है। मंदिर से एक गुुफा रंगमहल तक जाती है। |