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गढ़कुडार का किला :–

गढ़कुडार किला  तरीचर एवं चन्देरी  के मध्य 20–30 उत्तरी अक्षांश एंव 78–57 पूर्वी देशांतर पर स्थित है। जिला टीकमगढ़  के निवाडी तहसील के उत्तरी अंचल में निवाडी तरीचर, संधरी मार्ग पर गढ़कुडार दुर्ग  कुडार ग्राम में स्थित है। कुडार का दुर्ग महत्वपूर्ण दुर्गों में से एक है। यह दुर्ग ऐसे स्थल पर निर्मित है कि 10–12 किमी. दूर से तो दिखता है परंतु जैसे जैसे इसके नजदीक पहंुचते है विलोपित हो जाता है। तात्पर्य है कि यह किला चारों तरफ से पहाडियों द्वारा निर्मित कूडे के मध्य में एक टीले पर निर्मित है। इस किले का वास्तु भी बडा विचित्र है गडकुडार  दिखने का छिपा छिपउल का खेल खेलने में माहिर है जब नजदीक में आप पहुंचते है तो आपको पूछना पड सकता है कि किला कहां है। तात्पर्य कि गडकुडार को चारों तरफ के पहाड अपनी गोदी में बिठाये हुये है। पहाडियों से किसी तरह गुजरते हुये किले पर पहंुचते है बसा पहाड और हल्कीलामी पहाड की दुबच में कुडार ग्राम है।

हल्कीलामी एवं खजुआ पहाड की खांद से एक संकीर्ण पहाडी पगडंडी से किले तक जाया जाता है। किला कुडार कूडे के आकार वाली पहाडियों में मध्य बना है। तो जब आप किले के अंदर पहंुचते है तो आपको भी महसूस होता है कि आप कूडे के अंदर खडे हुये है। यह चंदेल कालीन है जिसका जीर्णोधार ओरछा  के महाराजा वीरसिंह जू देव ने करवाया था। यह भूल भुलैया सा तिलिस्मी किला है जिसमें अगणित कोटर (घोंसले, गुुफायें एवं छोटे छोटे अंध तलघर) है। संभवत: इन्हीं कोटरों के कारण इसे कोढार और कुडार नाम दिया गया है। कालंतर में यह गढ़कुडार  अथवा गढ़कुढार (कोढरी युक्त) कहा जाने लगा है।

विलोचमैन ने अकबर नामा में गढ़कुडार  को किडार नाम से उल्लेखित किया है। किला लगभग 1 हेक्टेयर वर्गाकार विस्तार में टोरिया के शिखर पर निर्मित है। जिसके चारों तरफ ढालू पठारी ऊबड खाबड किला मैदान है। किला पहाडी के चारों ओर परकोटा है। परकोटा में 21 गुर्जे है। किला दरवाजे के दायें वायें सप्त कोठी गोलाकार मीनारें है जो किले के चारो बाहरी कोने पर है। किला पंचख्डीय है। जो चारों ओर से एक समान है। यह किला भूल भुलैया सा तिलिस्मी किला है। मध्य में 8 फुट वर्गाकार प्रांगण है वर्गाकार चौक के चारों ओर मोटी चूना पत्थर के खंभों एवं दीवारों पर गोल बादामी लाद से निर्मित चौडे चौडे धनुषाकार दरवाजे वाले कमरें है। यदि अंदर के 1 कोटर में आप खडे हो जाये तो एक दिशा के सभी कोटरों पर आपकी नजर रहेगी।

कोटरों में प्रकाश के लिये छतों पर छोटे छोटे छिद्र बने है जिनसे धीमा धीमा प्रकाश आता रहता है। इस प्रकार दरवाजे से चौक प्रांगण तक जाने के लिये जो मार्ग है वह पांच कोटरों के पर करता हुआ जाता है। प्रवेश करने वाले व्यक्ति को कोटरों में बैठे लोग देख सकतें है लेकिन किले के अंदर प्रवेश कर जाने वाला व्यक्ति किसी को नहीं देख सकता है, पहले तो ऐसा ही लगता है कि मन में भय होता है कि मैं किस मौत के घर में घुस गया हूँ यदि आप साहस कर आगे बढते ही जातें है और शत्रु है तो लौटकर बाहर निकलना कठिन ही रहेगा। जैसे ही आप प्रांगण में पहुँचते है और 6–7 फुट ऊंचे किले प्रांगण में पहुंचते है तो किले प्रांगण के चारों और पंचखंडीय भूल भुलैया कमरे है। जो बुंदेला स्थापत्य शैली में है। जिनमें ऊपर से नीचे तक गुप्तद्वार है। यदि आप रास्ता भूल जायें तो दुर्ग से बाहर निकलना कठिन ही है।

 
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