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किला जगम्मनपुर :–

जगम्मनपुर किला जिला जालौन के पश्चिमोत्तर सीमा पर पचनदा (जमुना, चंबल, सिंध, पहूज और क्वारी) नदियों के संगम से 4 किमी की दूरी पर पूर्व में स्थित है। यह किला 26–25 उत्तरी अक्षांश एवं 79–15 पूर्वी देशांतर पर स्थित है। जगम्मनपुर किला समतल भूमि को 40 फीट गहरा खोद कर खाई के मध्य में बनाया गया है। जिसका एक खंड तो भूमितल से नीचे पानी भरी खाई के बीच में है। जगम्मनपुर किला एक विशाल महल है जो 3 मंजिला है एक मंजिल भूमि के बराबर तल खंड है और 2 मंजिल भूमि से ऊपर है। महल, महल प्रांगण, किला मैदान सब मिलाकर लगभग –8 एकड़ में किला परिसर है, महल है, राजा का निवास है, सुरक्षा खाई है इसलिए राजसी वैभव के दृष्टिकोण से इसे लोग किला ही कहते है।

राजसी पत्र व्यवहार में भी फोर्ट जगम्मनपुर लिखा जाता है। किला का मुख्य प्रवेश द्वार उत्तर दिशा की ओर है, जिसमें कीलादार बड़े मजबूत फाटक लगे हुए है, दरवाजा कलात्मक एवं चित्रकारी युक्त है। इस मुख्य दरवाजे के सामने सुंदर नजरबाग था जो अब नष्ट हो चुका है। महल का खास दरवाजा भी विशाल है। महल भवन के चारों कोनों पर षट पालीय चार पतले आकार की गुर्णे है। एक गुर्ण दक्षिणी भाग के मध्य में है। महल दरवाजे को अंदल दीवालों पर चूना से तक्षण कला चित्रंकला एवं बाहर पीत की प्लेटों से जड़ा हुआ है। जिसमें लोहे के कीले जड़े है। महल के दरवाजे के अंदर से पश्चिम को एक सुरंग युक्त दालान से चलते हुए उत्तर को धूमें फिर पूर्व को धूमते हुए महल के उत्तरामिमुखी भीतरी द्वार पर पहुँचते है।

यहाँ से महल चौक में पहुँचते है। महल चौक के दक्षिणी भाग में उत्तरामिमुखी लक्ष्मी नारायण का मंदिर है। ऐसी लोक–मान्यता है कि इस मंदिर में प्रतिष्ठित लक्ष्मी नारायण की प्रतिमा की प्रतिष्ठा संत तुलसीदास ने कराई। लोगों की मान्यता है कि संत तुलसीदास जी सन् 1578 ई. में पचनदा आए थे, जिन्हे जगम्मन शाह पचनदा से जगम्मनपुर ले आए थे। उन्होने एक मुखी रूद्राक्ष, दाना–मुखी शंख, भगवान लक्ष्मीनारायण की मूर्ति एवं खडाऊ जगम्मनशाह को दी थी जो अभी भी महल के इस मंदिर में सुरक्षित रखी हुई है।

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