झाँसी का किला :–झाँसी का किला बंगरा पहाड़ी पर 25–5 उत्तरी अक्षांश एवं 78–35 पूर्वी देशांतर पर स्थित है। इस किले का निर्माण ओरछा के महाराजा वीरसिंह जूदेव प्रथम (1605–27) ने 1613 ई. में कराया था। उस समय पहाड़ी के आसपास बस्ती नहीं थी। ओरछा के किले से बंगरा पहाड़ी पर निर्मित किला थोड़ा–थोड़ा (झॉईसा) दिखने के कारण झाँसी कहां जाने लगा था। झाँसी किला ओरछा नगर की सुरक्षा के लिए बतौर चेकपोस्ट बनाया गया था, ताकि उत्तर पश्चिम की तरफ से कोई आक्रमणकारी सीधा ओरछा न आ सके। परन्तु गैर क्षेत्रीय मराठों के बुंदेलखंड में पदार्पण से ओरछा नगर का पराभव हुआ एवं झाँसी को अभ्युदय एंव विकास का सुअवसर मिल गया था। अंग्रेजों एवं मराठों की सत्तात्मक खींचतान एवं संघर्ष ने झाँसी को अधिक प्रसिद्धि दिलाई। अंग्रेजों ने झाँसी को मध्य रेलवे का जंक्शन बनाकर एवं चारो ओर से सड़क मार्ग से भी जोड़कर इसे एक आधुनिक एवं बुंदेलखंड का जाना माना प्रसिद्ध महत्वपूर्ण नगर बनने का अवसर प्रदान कर दिया था। झाँसी किला बंगरा पहाड़ी की पूर्वी श्रेणी पर बनाया गया था जो लगभग 4 हेक्टेयर में निर्मित है, जिसकी चारो दिशाओं में उभरी सी कोनियां है। निर्माण के समय इसके दो दरवाजे थे। प्रथम किले का मुख्य प्रवेश द्वार जो बडा बाजार की ओर पूर्व दिशा को है। इस प्रवेश मार्ग के मोड़ पर सुदृढ़ दरवाजे बनाए गये है। दूसरा छोटा निकास द्वार किले के पश्चिमी दक्षिणी पाश्र्व के परकोटा प्रांगण में से एक गुर्ज के पास से दक्षिणमुखी पहाड़ी ख्ंादक में खुलता है। यह आपातकाल द्वार है जो किले के बाहर गहरी खंदक की ओर है। किले के पूर्वी भाग के परकोटा भित्ती के बाजू अर्थात उत्तर दिशा की ओर से दक्षिण की ओर चलते हुये एक संर्कीण गलियारे में प्रविष्ट होते है। गलियारा के दायें परकोटा भित्ति में बजंरगबली की प्रतिमा स्थापित है। यहाँ पर एक पूर्वामिमुखी घूम कर किले के प्रथम दरवाजे में प्रविष्ट होते है। दरवाजे के अंदर दक्षिण की ओर मुडकर अंदर परकोटा प्रांगण में पश्चिम की ओर मुडकर पूर्वामिमुखी दूसरे दरवाजे में प्रविष्ट होते है। इस दूसरे दरवाजे के अंदर पहरेदारों की बैठक बनी हुई है। ऊपर सुंदर हबेली है। अंदर प्रांगण में ऊंचे प्रांगण में ऊंचे मैदान में बारादरी, बैठक और उसके पीछे आवासीय भवन बने है। इस दूसरे परकोटा प्रांगण के किला परकोटा की धूम में ऊंचाई पर श्री गणेश जी विराजमान है, जिनका मंदिर दक्षि्ज्ञणामुखी है। जिनकी दृष्टि किला के तीसरे उत्तरामिमुखी द्वार पर रहते है। परकोटा भित्ति के बाहर की ओर मार करने वाले सुंदर द्विभागी कैनन छिद्र बने है। तीसरे दरवाजे से पश्चिम चलकर पहाड़ी के नीचे वाले चौथे दरवाजे के सामने पहुँचते है, जिसमें से परकोटा के दक्षिणामुखी प्रांगण में पहुंच जाते है। यह किला प्रांगण महल दरवाजे के ठीक सामने नीचे है। |