किला राहतगढ़ :–बुंदेलखंड जनपद के सागर जिला अंतर्गत सागर भोपाल बस मार्ग पर सागर से 40 कि.मी. दूर 23–75 उत्तरी आक्षांश एवं 78–20 पूर्वी देशांतर पर राहतगढ़ दुर्ग अपने वैभव एवं सौंदर्य में प्रदर्शन में मस्तिक ऊँचा किये परन्तु उपेक्षा एवं दुरदिनों पर आँसु बहाता सीधा खड़ा हुआ दर्शनीय है यह दुर्ग विंध्यशैली की उत्तुंग श्रेणी पर संघन वन से आच्छारित बीना नदी के तट पर निर्मित है। जैसे ही आप किले में प्रवेश करने के लिये चलते है तो आपको पहाड़ी का टेढ़ा मेढ़ा घुमावदार चटानी मार्ग चढ़ना होता है। इस चढ़ाई के बाद दुर्ग का मुख्या प्रवेश द्वार मिलता है जो सुरक्षा कोट का प्रथम दरवाजा है। तत्पश्चात घुमावदार संकरे टेढ़े मेढे मार्ग से चलते हुऐं एक के बाद एक ऐसे चार दरवाजे पार कर दुर्ग के प्रांगण में पहुँचते है। आखरी दरवाजा दुर्ग प्रांगण मोती महल के पास है ऊँचीं पहाड़ी जिस पर ऊँचा दुर्ग जिसमें मोती महल और बादल महल इस किले की सुरक्षाभित्ती परकोटा में 26 गुर्जे है परकोटा एवं गुर्जे काफी सुदृढ़ है जिससे बाहरी शत्रु पर ऐसी मार्ग करने के साधन बने रहे है कि शत्रु परकोटे के पास ही न आ पाये। यह किला 66 एकड़ में फैला है दुर्ग के ऊपर बीना नदी की ओर एक मीनार जैसी गुर्ज है जिसे जोगनी गुर्ज कहां जाता है ऐसी मान्यता है कि जब किसी व्यक्ति को मृत्युदण्ड देना होता था तो इस गुर्जे से उसे बीना नदी के पठार पर फेक दिया जाता था। |