किला सैहुड़ा :–सैहुड़ा नगर के उत्तरी अंचल में सैहुड़ा बस्ती एवं सिंध नदी के मध्य की लंबी ऊँची पहाड़ी पर निर्मित है। सैहुड़ा का किला पहाड़ी हाथी के मानिंद है अर्थात् चारों ओर ढाल है, मध्य भाग शिखर ऊँचा एवं समतल है। किला पहाड़ी के पास अंग में सिंध नदी प्राकृतिक सुरक्षा किए प्रवाहित है, तो तीन ओर जल प्रवाह से प्राकृतिक रूप में कटाव से गहरी खाई सी निर्मित है। यह किला समुद्रतल से 1000 फुट ऊँचाई पर 26–39 उत्तरी अक्षांश एवं 78–49 पूर्वी देशन्तर पर स्थित है। ऐसी धार्मिक आस्था एवं लोगों का विश्वास है कि यहाँ के सनकुआ प्रपात पर ब्रम्हा जी के पुत्र सनकादि ने तपस्या की थी। प्रपात में कुछ गुफाऐं भी निर्मित है। वर्तमान में सैहुड़ा दुर्ग दतिया के राजा रामचंद्र के भाई राजा पृथ्वीसिंह ने बनवाया था। उन्होने किले के पश्चिमी, दक्षिणी भाग की ऊँची भूमि पर पृथ्वीनगर बस्ती भी बसाई थी। सैहुड़ा दुर्ग 4 परकोटों के मध्य बना है। सर्वप्रथम इसको सिंध नदी एवं उसकी शाखा ने गहरी खाई के रूप में सुरक्षा प्रदान किया है। खाई के पश्चात् लगभग 35 फुट ऊँचा पक्का चूना पत्थर का परकोटा है जो विशाल गुणों से सुदृढ़ किया गया है। इस किले में लगभग 52 गुर्जे है जिन पर तोपों के चक्कस और तोप के गोलों के जाने को कटाव बने हुए है। किले का मुख्य दरवाजा दक्षिणी पूर्वी कोण में पूर्वामिमुखी है। दरवाजा विशाल है जो परकोटे के भीतर की ओर धू देकर बनाए संकीर्ण चौक में दक्षिण से उत्तर तत्पश्चात् पूर्व को खुलता है। दरवाजे के फाटक बड़े–बड़े है, कीलादार है, दरवाजा तो खुलता नहीं, खिड़की से अधिकतर आना जाना होता है। यहाँ से परकोटा के प्रथम गलियारे में पहुंचते है उत्तर की ओर परकोटा से संलग्न कुछ चढ़ाई चढते हुये सैयदबली शाह का मजार के पास से किले के दूसरे दरवाजे के भीतरी भाग के सामने पहुंच जाते है। यह दूसरा दरवाजा भी पूर्वी परकोटे के मध्य भाग में नदी की ओर है। इस दरवाजे से प्रविष्ठ होने पर सीढ़ी चढ़ते हुये गलियारा के पूर्वी उत्ती अंचल में सिंध नदी के तटवर्ती अंग में निर्मित आनंद महल प्रांगण में पहुंच जाते है। प्रथम परकोटा के भीतरी गलियारे के पूर्वी उत्तरी कोण से चढ़ाई चढ़ते हुये पश्चिम दक्षिण की ओर चलने पर दूसरे परकोटे के दरवाजे पर पहुँच जाते है। इस तीसरे दरवाजे के सामने अंदर गलियारे में ख्वाजा साहब अजमेरी की मजार है। इस मजार के वाम भाग में पश्चिम दिशा को चढाई चढ़ते हुये पहाड़ के शिर भाग पर निर्मित चौथे परकोटे दरवाजे पर पहुँचते है। यह चौथा परकोटा दरवाजा पूर्व दिशा को है। विशाल है भव्य है, जिसमें कीला जड़े मजबूत फाटक लगे है। इस चौथे पूर्वमिमुखी दरवाजे को पार कर किले के राजमहल प्रागंण में प्रविष्ट हो जाते है। |