श्री अम्बिका प्रसाद दिव्यअजयगढ़ जिला पन्ना के सुसंस्कृत कायस्थ परिवार में श्री अम्बिका प्रसाद, "दिव्य' का जन्म १६ मार्च सन् १९०६ ई में हुआ था। एम. ए. --हिन्दी-- साहित्यरत्न उपाधि सम्पन्न "दिव्य जी' ने म.प्र. शिक्षा विभाग में सेवा कार्य प्रारंभ किया, प्राचार्य पद से सेवा निवृत हुवे। आप अंग्रेजी, संस्कृत, रुसी, फारसी, उर्दू भाषाविद् थे। आप बहुमुखी प्रतिभा के धनी थे। खजुराहो की अतिरुपा, प्रीताद्रि की राजकुमारी, काला भौंरा, योगी राजा, सती का पत्थर, फजल का मकबरा, जूठी पातर, जयदुर्ग का राजमहल, असीम का सीमा, प्रेमी तपस्वी आदि प्रसिद्ध ऐतिहासिक उपन्यासों की रचना की। निमिया, मनोवेदना, बेलकली सामाजिक उपन्यास लिखे। गाँधी परायण, अंतर्जगत, रामदपंण, खजुराहो की रानी, दिव्य दोहावली, पावस, पिपासा, स्रोतस्विनी, पश्यन्ति, चेतयन्ति, अनन्यमनसा, विचिन्तयंति, भारतगीत प्रसिद्ध महाकाव्य तथा मुक्त रचनायें हैं। आपने लंकेश्वर, भोजनन्दन कंस, निर्वाण पथ, तीन पग, कामधेनु, सूत्रपात, चरण चिन्ह, प्रलय का बीज, रुपक सरिता, रुपक मंजरी, फूटी आँखे, भारत माता, झाँसी (Jhansi)की रानी, आदि नाटक लिखे। निबन्ध विविधा, दीप सरिता, हमारी चित्रकला म.प्र. शासन --छत्रसाल पुरस्कार-- द्वारा पुरस्कृत है। वीमेन आॅफ खजुराहो अंग्रेजी की सुप्रसिद्ध रचना है। दिव्य जी का पद्य साहित्य मैथिली शरण गुप्त, नाटक साहित्य रामकुमार वर्मा तथा उपन्यास साहित्य वृंदावन लाल वर्मा जैसे शीर्ष साहित्यकारों के सन्निकट हैं। आपने कीर के कागर समान अपना शरीर ५ सितम्बर १९८६ ई. को शिक्षक दिवस समारोह में भाग लेते हुये हृदय-गति रुक जाने से त्याग दिया। आप आदर्श प्राचार्य के रुप में सन् १९६० में सम्मानित किये गये थे। दिव्य जी के उपन्यासों का केन्द्र बिन्दु बुंदेलखंड (bundelkhand) अथवा बुन्देले नायक हैं। बेल कली --पन्ना नरेश अमान सिंह-- जय दुर्ग का रंग महल --अजयगढ़-- सती का पत्थर --गठौरा का युद्ध-बुंदेलखंड (bundelkhand) का महाभारत-- पीताद्रे का राजकुमारी --रानी दुर्गावती-- तथा निमिया की पृष्ठभूमि बुंदेलखंड (bundelkhand) का जनजीवन है। सन् १९८६ ई. में मध्य प्रदेश राष्ट्रभाषा समिति भोपाल द्वारा "दिव्य पुरस्कार' का शुभारम्भ अहिन्दी प्रदेश के नाटककारों के लिए किया गया है। साहित्य सदन --अखिल भारतीय अम्बिका प्रसाद दिव्य स्मृति समारोह द्वारा उपन्यास विधा हेतु तथा दो हजार रुपये की राशि तथा द्वितीय पुरस्कार "कविता विधा हेतु' घोषित किये गये हैं। तथा "दिव्यालोक' का प्रकाशन भी संग्रहणीय स्मारिका के रुप में प्रस्तावित है। दिव्य जी का अभिनन्दन ग्रन्थ प्रकाश्य है। |