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सिद्धक्षेत्र अहार जी (Digambar Jain Tirth Ahar ji Tikamgrah)

मार्ग परिचय

यह पावन तीर्थ मध्य प्रदेशान्तर्गत जिला टीकमगढ़ (Tikamgarh) से 25 कि.मी. की दूरी पर टीकमगढ़(tikamgarh) – छतरपुर (chhatarpur) रोड पर अहार तिगैला की पुलिया से दक्षिण में 5 कि.मी. लम्बे बधान युक्त मदन सागर सरोवर के पृष्ठ भाग में प्राकृतिक सौन्दर्य पूर्ण पर्वत मालाओं एवं सुन्दर वनस्थली के बीच स्थित है अथवा टीकमगढ़(tikamgarh) – छतरपुर (chhatarpur) मार्ग पर नारायणपुर होकर अहारजी (Ahar Ji Bundelkhand) पहुंचा जा सकता है। बम्बई – दिल्ली मध्य रेलवे लाईन के झाँसी (Jhansi)– वीना के बीच ललितपुर (lalitpur) – झाँसी (Jhansi)या झाँसी (Jhansi), मानिकपुर के बीच मऊरानीपुर स्टेशन या सागर और छतरपुर (chhatarpur) से बसों द्वारा टीकमगढ़(tikamgarh) होकर अहारजी(Ahar Ji Bundelkhand) पधारना चाहए। क्षेत्र तक पक्का रोड है बसें दिन प्रतिदिन आती जाती है।

क्षेत्र की प्राचीनता

यह क्षेत्र अति प्राचीन है, जो ऐतिहासिक एवं पुरातत्व की दृष्टि से बहुत ही महत्वपूर्ण है यहां भूगर्भ से प्राप्त जैन मंदिरों एवं सैकड़ों मूर्तियों के भग्नावशेष प्रचुर मात्राओं में उपलबध है। शिलालेखों से यह स्पष्ट विधित होता है कि यहां पर अनेक गगनचुम्भी पाषाणमय जैन मंदिर रहे होंगे। मूर्तियों के कलात्मक अवशेषों एवं शिलालेखों से कई ऐतिहासिक तथ्यों का ज्ञान हो जाता है। जैसे

1.वि.सं. 1011 ये वि.सं. 2055 तक के प्राचीन शिलालेखों की विस्तृत जानकारी।

2.यहां प्रतिष्ठायें एवं जाति या एक व्यक्ति द्वारा ही नहीं, किन्तु अनेक जैन जातियों और विभिन्न श्रावकों द्वारा कराई गई है। यहां के शिलालेखों में अनेक जैन जातियों का अस्तित्व पाया जाता है। जिनमें गृहपत्यन्वय, मेडवालान्वय, पौर पाटान्वय, खंडेलवालान्वय, मनथुरान्वय, पुराणान्वय, अग्रोत्कान्वय (अग्रवाल), परवार, क्लार्गणान्वय, गोलापूर्वान्वय, मेडत्वालान्वथ्सी प्रकार यहां ाके शिलालेखों में अनेक गोत्रों के नाम का एवं प्रतिष्ठा कराने वाली अनेक धार्मिक महिलाओं के नामों का उल्लेख मिलता है।

3.अनेक भट्टारकों के नाम भी्र शिलालेखों में उल्लेख जिनकी प्रेरणा या धर्माेपदेश से यहां प्रचर मूर्तियां प्रतिष्ठित हुई है।

4.कुछ शिलालेखों में कुन्दकुन्दान्वय, मूलसंघ, बालाल्कारगण, सरस्वती गच्छ, काष्ठा संघ आदि संघ, गण, इत्यादि का भी उल्लेख है।

5.कुछ शिलालेखों से बहुत से नामों और नगरों की जानकारी हमें प्राप्त होती है जैसे – वाणापुर, महिषण पुर, मदनेशसागरपुर, आनन्दपुर, वसुहाटिकानन्दपुर आदि। वि.सं. 1100 से 1500 तक के शिलालेखों से सपष्ट होता है कि यहां के शासक मदनवर्मदेव थे एवं अहार का प्राचीन नाम भी मदनसागरपुर प्रसिद्ध था। तदानुसार आज भी मदनसागर नामक तालाब स्थित है।

सिद्धक्षेत्र

1.भगवान मल्लिनाथ के मोक्ष जाने के बाद सत्र्रहवें काल में आठवें बिम्कम्बल केबली अहारगिरि (Ahargiri) से मोक्ष पधारे।

2. यहां सिद्वों की गुफा, सिद्वों की मडिया,झालर की टोरिया आदि विशेष महत्वपूर्ण स्थल है जिसमें प्रमाणित होता है कि यह पावन क्षेत्र काफी प्राचीन है तथा अतीत में सिद्व भूमि रही है और अनेक साधकों ने एकान्त में आकर मुक्ति साधना की है।

3. यह निर्वाण स्थल दक्षिण में 1 किमी की दूरी पर गगनचुम्भी शिखरकार पर्वतों के मध्य पहाडी पर स्थित है यह पर्वत पंचपहाडी के नाम से प्रसिद्व है। इस पर्वत की तलछटी में एक छोटा तालाब है जिसे मदनतला कहते है इस तालाब के पीछे बहुत प्राचीन बाबडी थी जिसे मदनवेर कहते थे,इस पर्वत पर चरण चिन्हों के 6 लघु जिनालय है।

अतिसय क्षेत्र (Atishay Kshetra)

1. यहॉ पाणाशाह नामक प्रसिद्व श्रेष्ठी प्रवर के रांगा से चांदी हो जाने का अतिशय अतिप्रसिद्ध है जहां उनका टांडा ठहरा था वहां रांगा से चांदी हो गई थी। वह स्थान अभी भी टांडे के खंधा से विख्यात है।

2. मासोपवासी मुनिराज का यक्षणीकृत उपसर्ग दूर होकर एवं उनका निरंतराय अहार होने के कारण यह क्षेत्र अहार नाम से विख्यात हुआ है।

3. यहां अनेक लोग अपनी – अपनी इच्छित कार्य पूर्ति की अभिलाषा से आते है और ईष्ट सिद्धी होने पर अपना संकल्प पूरा कर वापिस चले जातें है। ग्रामीण जन पूर्व में इसे मूड़ादेव के नाम से जानते थे, आज अहार नाम से प्रसिद्ध है।

मंदिर

1.श्री शांतिनाथ मंदिर (Shri Shantinath Temple Ahar Ji)

यह मंदिर बारहवीं शताब्दी का निर्मित है इस मंदिर में 21 फुट की अखंड शिला में देशी पाषाण से निर्मित भगवान शांति नाथ के वि.सं. 1237 में श्री श्रेष्ठीवर गलहण के सपुत्र जाहण एवं उदयचन्द्र के वाहल्ण के पुत्र मूर्ति निर्माता वास्तु शास्त्र के ज्ञाता श्री पापट ने इस सातिशय भव्य एवं अत्यंत कलापूर्ण विशाल उत्तुग प्रतिमा की सुन्दर रचना कराई। मूर्तिकला की दृष्टि से यह प्रतिमा भारतवर्ष की सर्वोत्तम मूर्तियों में से एक है, जो अन्यत्र देखने को नहीं मिलती है इस मूर्ति पर रत्नों का पालिस है। परम् पूज्य प्रात: स्मरणीय 105 क्षुल्लक गनेशप्रसाद जी वर्णी ने इस मूर्ति को उत्तर भारत का गोमटेश्वर लिखा है। भगवान शांतिनाथ के पादमूल में शिलालेख 12 वीं शताब्दी के देवनगरी लिपि में पद्मय संस्कृत में है। भगवान शांतिनाथ के पाश्र्वों में 11 – 11 फिट के उत्तुतकाय दक्षिण की ओर भगवान अरहनाथ की एवं उत्तर की ओर भगवान कुन्थुनाथ प्रतिमा विराजमान है। भगवान कुन्थुनाथ की प्रतिमा का शिलालेख भी संस्कृत में है, जो कुछ टूट गया है। उसका संक्षिप्त सार निम्न है। सेठ रल्हण के गंगा नाम की स्त्री हुई, जिनके तीन पुत्र पैदा हुए, उनमें से छोटे पुत्रों के वियोग हो जाने से बडे पुत्र ने संसार को असारधन को बिजली के समान नाशवान, जीवन को जल के छोटे बुद–बुदे के समान जानकर धन को निज हित में लगाकर धन्य माना। मुख्य मंदिर के चारों और परिक्रमा में क्रमश: भूत, भविष्यत् एवं वर्तमान काल संबंधी त्रिकाल चौबीसी सुशोभित है, साथ ही शाश्वत विद्यमान बीस तीर्थकर एवं सामने गर्भालयों में चार जिनबिम्ब और भी विराजमान है।

2.भूगर्भ मंदिर (भैंयरा)

यह शांतिनाथ मंदिर के बाहर के प्रथम हाल में दक्षिण की और निर्मित है इसमें 92 प्रतिमाएॅ एवं चरण पादुकायें है, जो वि.सं. 1109 से 2055 तक की है।

3.वद्र्धमान मंदिर

यह मंदिर संग्रहालय के ऊपरी भाग में निर्मित है। वेदिका पर श्री वद्र्धमान स्वामी की प्रतिमा के साथ तीन प्रतिमायें और विराजमान है जो वि.सं. 1548 से 2014 तक की है।

4.मेरू मंदिर

यह मंदिर गोलाकार बना हुआ है। वेदिका पर 2 फिट अवगाहन की श्री अरहंत परमेष्टी की कृष्णपाषाण प्रतिमा विराजमान है।

5.श्री चन्द्र प्रभू मंदिर

यह दूसरी मंजिल पर निर्मित है वेदिका पर श्री चन्द्रप्रभू भगवान के अतिरिक्त और भी चार प्रतिमाऐं विराजमान है। जो वि.सं. 1540 से 2033 तक की है।

6.पाश्र्वनाथ मंदिर

यह मंदिर भी दूसरी मंजिल पर चन्द्रप्रभू जिनालय के निकट ही निर्मित है मंदिर के मूल नायक भगवान श्री पाश्र्वनाथ की वी.सी. पाषाण की निर्मित मनोज्ञ प्रतिमा तथा चार प्रतिमाऐं पाश्र्वनाथ जी की और भी विराजमान है। जो वि.सं. 1502 से 1804 की है।

7.श्री महावीर मंदिर

इस मंदिर में भगवान महावीर के साथ भगवान पाश्र्वनाथ की दो प्रतिमाऐं विराजमान है जो वि.सं. 1502 से 2030 तक की है।

8.उभयमान स्तंभ

यह दोनो मान स्तंभ श्री वाहुवलि मंदिर जी के सामने स्थित है जो देशी पाषाण से निर्मित शिलाओं में वि.सं. 1011 से प्रतिष्ठित है।

9.बाहुवलि मंदिर

इस मंदिर में वि.सं. 2014 की प्रतिष्ठित सात फिट अवगाहना की भगवान बाहुवलि की मनोज्ञ प्रतिमा विराजमान है।

10.पंच पहाडी

पंच पहाडी पर छ: लघुजिलानय निर्मित है जिनमें चरणपादुकायें विराजमान है। वार्षिक मेला – वर्तमान में यहां अगहन शुक्ल त्रियोदशि से पूर्णिमा तक अनेक धार्मिक एवं सास्कृतिक कार्यक्रमों के साथ आयोजित किया जाता है। जिसमें जैन समाज के साथ साथ जैनेतर समाज अधिकतर सम्मिलित होती है।

आवास की सुविधा

यात्रियों को आवास हेतु धर्मशालाओं में लगभग 170 कमरें है जिनमें नल बिजली की सुविधा के साथ कुछ कमरे स्नानघर, रसोईघर, पंखे एवं शौचालय से युक्त है।

क्षेत्रीय संस्थाएॅ क्षेत्रीय विभाग

क्षेत्रीय चल अचल संपत्ति एवं प्राचीन,ऐतिहासिक एवं कलात्मक सामग्री की सुरक्षा,मंदिरों के जीर्णोद्धार आदि कार्य कराये जाते हैं, इसके अंर्तर्गत निम्न संस्थाएॅ कार्यरत हैं।

1. श्री शांतिनाथ विद्यालय

श्री शांतिनाथ दिगंबर जैन संस्कृत विद्यालय स्व. श्री 105 क्षुल्लक चिदानंद जी महाराज के सहयोग से इसकी स्थापना 1936 में की गई थी, तभी से यह विधिवत् संचालित है, उसमें अनेक छात्र एवं छात्रायें, धार्मिक,संस्कृत एवं लौकिक शिक्षा हेतु अध्ययनरत हैं। यह विद्यालय अवधेश प्रताप सिंह विश्व विद्यालय रीवा से संबंधित है। यहां पर छात्र शास्त्री तक संस्कृत के साथ साथ पूजन कोर्स का भी अध्ययन कर रहे हैं। विद्यालय के छात्रों को नि:शुल्क अध्ययन, कापी किताबें, दो गणवेश, नाश्ता,दूध,घी आदि दिया जाता है।

2.शांतिनाथ दिगम्बर जैन वृति आश्रम

इसमें वृतियों को आत्मसाधन पठन पाठन एवं आत्मकल्याण करने की सुविधा प्राप्त है।

 

3.शांतिनाथ दिगम्बर जैन सरस्वती सदन

इसकी स्थापना श्रीमान स्व. श्री दरबारी लाल जी कोटिया न्यायाचार्य के सद्प्रयासों से हुई थी, इसमें अनेक ग्रंथों का अपूर्त संग्रह है।

 

4.शांतिनाथ दिगम्बर जैन वाचनालय

इसमें सर्वसाधारण के ज्ञानार्जन हेतु अनेक पत्र पत्रिकायें उपलब्ध कराई जाती है।

5.शांतिनाथ दिगम्बर जैन संग्रहालय

यह पुरातत्व सामग्री का विपुल भंडार वि.सं. 1196 से लेकर अनेक प्राचीन शिलालेख तौरणद्धार के भग्नावशेष एवं अनेक कला युक्त पात्र लगभग 1500 संग्रहित है।

6.शांतिनाथ दिगम्बर जैन औषधालय

इसमें रोगियों को औषधियां निशुल्क वितरित की जाती है।

7.शांतिनाथ दिगम्बर जैन छात्रावास

इसमें छात्रों के आवास एवं भोजन की नि:शुल्क समुचित व्यवस्था है प्रत्येक छात्र को ओढ़ने बिछाने पहनने के लिये वस्त्र प्रदान किये जातें है। नाश्ता, भोजन, घी एवं रात्री में दूध प्रदाय किया जाता है।

8.शांतिनाथ दिगम्बर जैन धर्मशालायें

यात्रियों के आवास हेतु अनेक धर्मशालाये है जिनमें 170 कमरे निर्मित है जिनमें से कुछ कमरे आवश्यक साधनों से युक्त है तथा उनमें नल, बिजली, पंखा आदि की समुचित व्यवस्था है।

9.श्री शांतिनाथ भवन

यह भवन 55 ग 105 का निर्मित है।

10.ग्रामीण धर्मशालायें

यह ग्राम अहार में स्थित है जिसमें छ: कमरे निर्मित हो चुके है शेष के निर्माण की योजना चालू है।