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ऐतिहासिक-पौराणित स्थल चन्देरी स्थिति मध्यप्रदेष के गुना जिले में पष्चिमी रेलवे के मुगांवली स्टेषन से 43 कि.मी. और मध्य रेलवे के ललितपुर स्टेषन से लगभग 35 कि.मी. दूरी पर यह प्राचीन और ऐतिहासिक नगर अवस्थित है। चंदेरी के निकट ही जैन तीर्थ खंदार जी,बूढ़ी चंदेरी,गुरीलागिरि और थूबोन जी भी स्थित हैं। चंदेरी से थोड़ी ही दूर पर वेत्रवती और उर्वषी सरिताए प्रवाहित हैं। ग्वालियर,मुंगावली,ललितपुर से चंदेरी बस-सेवायें उपलब्ध रहती हैं। इतिहास विक्रम की ग्यारहवीं शताब्दी में प्रतिहार वंषीय क्षत्रिय नरेष कीर्तिपाल देव ने वर्तमान नगर की स्थापना की थी। इतिहासकार अलबरुनीं ने 1030 ई. में और इब्नबतूता ने 1336 में अपने यात्रा वृतान्तों में चंदेरी का वर्णन किया था। 1251 ई. में सुल्तान बलवान ने और 1304 ई. में अलाउद्दीन खिलजी ने क्रमषः चंदेरी पर आक्रमण किये थे। सन् 1528 ई. में चंदेरी के प्रषासक मेदिनीराय पर बाबर द्वारा किये गये आक्रमण से वहाँ की सैकड़ों छत्राणियों द्वारा 28 जनवरी 1528 को किये गये जौहर के कारण भी यह प्रसिद्ध है। यद्यपि आदि पुराण के अनुसार तीर्थंकर आदिनाथ का समवरण चंदेरी में आया था। जिससे चंदेरी की प्राचीनता और पावनता का महत्व और अधिक बढ़ जाता हैं। पौराणिक ’चेदि-नरेष’ षिषुपाल की ऐतिहासिक राजधनी के रुप में भी यह प्रसिद्ध है। जो निकट ही बूढ़ी चंदेरी के रुप में ख्यात है। भारत के प्रथम 1857 के स्वतंत्रता आंदोलन में यहाँ के राजा मर्दनसिंह का योगदान भी अविस्मरणीय है। पुरातत्व ग्यारहवीं शताब्दी में कीर्तिपाल देव द्वारा निर्मित कीर्ति दुर्ग,कीर्ति सागर और कीर्ति नारायण के मंदिर अब जीर्ण षीर्ण दषा में विद्यमान हैं। बुंदेला राजाओं ने चंदेरी में जहाँ परमेसरा और हरकुण्ड आदि जलाषयों का निर्माण कराया वहीं जागेष्वरी देवी आदि कि अनेक मंदिर भी बनवाये थे। मुसलमान शासकों द्वारा निर्मित अनेक मकबरे और मस्जिदें भी उल्लेखनीय हैं। नगर से 200 फुट की ऊँचाई पर निर्मित दुर्ग को चन्द्रगिरि कहते थे जिसके आधार पर इसका नाम चंदेरी पड़ा और कतिपय विद्वानों के मत से षिषुपाल के पितामह का नाम चिदि था इससे चेदि जनपद और राजधानी का नाम चंदेरी पड़ा। प्राचीन कीर्ति दुर्ग पर नौखण्डा महल,हवामहल,गिलौआ ताल और माधव विलास दर्षनीय स्थल हैं। चंदेरी के उत्तर में 5 कि.मी. दूर कौषक महल और पूर्व में 7 कि.मी. दूर अन्य प्राचीन राजमहल ऐतिहासिक अवषेशों के रुप में विद्यमान हैं। जैन तीर्थ जैन क्षेत्र के रुप में चंदेरी की चैबीसी अत्यंत प्रसिद्ध है। चैधरी फौजदार हिरदेषाह,मर्दनसिंह के कामदार संघाधिपति श्री सवाई सिंह ने वि.सं. 1893 में चैबीसी का निर्माण कराया था। इसमें चैबीसी जैन तीर्थंकरों की शास्त्रोक्त वर्णअनुसार 12 श्याम,2 श्वेत,6 कंचन,2 हरित और 2 लाल समान नाप की अत्यंत सुंदर प्रतिमायें,पृथक-पृथक 24 षिखरबंद कक्षों में स्थापित हैं। इन दिनों जब जगह जगह चैबीसियाँ निर्मित हो रहीं हैं, चंदेरी की प्राचीन चैबीसी अपनी शास्त्रीय और सुंदर स्थापना के कारण अभी भी ’मील के पत्थर’ की तरह चर्चित है। यह नगर पुरातन काल से बारीक मलमल और फिर हाथकरघा की साड़ियों के लिये प्रसिद्ध रहा है। चंदेरी के बस स्टैण्ड पर एक शासकीय संग्रहालय है,जिसमें छब्बीस सौ मूर्तिखण्ड संग्रहित किये गये हैं ये अधिकांषतः बूढ़ी चंदेरी और आस पास से लाये गये हैं।
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