सिद्ध क्षेत्र द्रोणगिरिबुंदेलखंड़ का लघु सम्मेद षिखर द्रोणगिरि अर्थात् सेंधपा नाम से जाना जाने वाला यह जैन तीर्थ क्षेत्र छतरपुर जिले में विद्यमान है। टीकमगढ़-छतरपुर रोड़ पर बड़ा मलहरा कस्बे के निकट सेंधपा तीर्थ की स्थिति सागर-कानपुर मुख्य मार्ग पर है। सदातोया युगल काठिन एवं ष्यामली सरिताओं के मध्य कुण्डलाकार पहाड़ पर स्थित तीस जैन मंदिरों वाले बुंदेलखंड के सेंधपा तीर्थ को सिद्ध तीर्थ द्रोणगिरि इसलिये कहा जाता है कि निर्वाण काण्ड में जिस द्रोणगिरि का उल्लेख निम्न प्रकार है- फलहोड़ी बड़ गामे पच्छिम भायम्मि द्रोणगिरि सिहरे। गुरुदत्तादि मुणिदां णिव्वाण गया णमो तेसिं।। उक्त सभी स्थितियाँ इस प्राचीन सेंधपा तीर्थ के चारों ओर जैन समाज मानती है। उदाहरण के लिये इस पहाड़ को द्रोणगिरि मानते हुये पूर्व दिषा में दो तीन किलोमीटर पर एक बस्ती के अवषेष विद्यमान हैं। बड़ागाँव भी पूर्व दिषा में टीकमगढ़ जिले के बड़ागाँव क्षेत्र के रुप में पहले ही किया जा चुका है। इसी तरह मुनिवर गुरुदत्त आदि का साधना स्थल इस पर्वत पर स्थित गुफा को ही माना गया है। कहा जाता है कि भगवती आराधना में षिवकोटि के जिस द्रोण मत का उल्लेख किया है, वह यही द्रोणगिरि पर्वत है। गुरुदत्त महामुनि की मुक्ति यहीं विशेले कीड़े के काटने से या यहाँ की गुफा में अग्नि प्रज्वलन के कारण समाधि लेने से हुई थी। इसलिये सेंधपा में इस गुफा को गुरुदत्त निर्वाण भूमि-गुफा कहा जाता है। आज भी यह गुफा तपस्या करने लायक है। गुफा के अंदर का रास्ता कहीं बहुत दूर जाकर खुलता था लेकिन अब यह मार्ग बंद हो चुका है। पुरातत्वपर्वत पर स्थित 28 जिनालय पहाड़ी के प्राकृतिक सौन्दर्य से और अधिक रमणीक लगते हैं। जिससे यह स्थल वंदना के साथ पर्यटन योग्य भी है। यों तो मंदिरों की रचना सामान्य है परंतु पुरातात्विक दृश्टि से यह चंदेलकालीन प्रतीत होते हैं। इनका निर्माण ग्यारहवीं से लेकर तेरहवीं सदी में हुआ है। इसलिये प्राकृत भाशा में रचित निर्वाण काण्ड से पुरातत्व का मेल कदाचित नहीं खाता। हालाँकि पौराणिक मान्यताओं के कारण सेंधपा,द्रोणगिरि तीर्थ मान्य होता है। प्रातः स्मरणीय संत षिरोमणि गणेष प्रसाद जी वर्णी ने इस तीर्थ को दीर्घ काल तक अपना साधना स्थल बनाया था। वे इसे बुंदेलखंड का लघु सम्मेदषिखर कहते थे। वर्णी जी का प्रेरणा से ही यहाँ संस्कृत और उदासीन आश्रम संचालित किया गया था। जिसे चलते हुये अब पचास वर्ष से अधिक अवधि बीत चुकी है। जिनालयबड़े मंदिर में संवत् 1549 की आदिनाथ प्रतिमा एवं मेरु मंदिर संख्या 21 की परिेकर सहित प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ प्रतिमा महत्वपूर्ण है। मंदिर क्रमांक 24 स्थित 13 फुट ऊँचे और 4 फुट गोलाकार चंदेलकालीन मान स्तंभ में 3 दिषाओं में 18-18 इंच ऊँची खड़गासन मूर्तियाँ व चैथी तरफ पद्मासन प्रतिमा,इनके ऊपर 24-24 के हिसाब से 96 मूर्तियाँ 3’’ ऊँची खड़गासन मुद्रा में है। नीचे के हिस्से में 4 पद्मासन मूर्तियाँ एवं इनके नीचे 18’’ की 4 देवी मूर्तियाँ निर्मित हैं। कला व पुरातत्व की दृश्टि से यह मान-स्तंभ दर्षनीय है। षिखर जी तीर्थ के समान इस पहाड़ पर भी चंदाप्रभु, आदिनाथ इत्यादि ’टोेंकें’ वंदनीय हैं। द्रोणगिरि तीर्थ में अनेक प्राचीन षिलाखण्ड क्षेत्र की पुरातन महिमा के साक्ष्य प्रस्तुत करते हैं। पर्वत के नीचे सेंधपा ग्राम में भी 2 प्राचीन जिनालय हैं। यहीं पर्यटकों के लिये धर्मषालायें भी उपलब्ध हैं। पुराणों में द्रोणगिरि तीर्थ के दर्षन का विषेश महत्व प्रतिपादित किया गया है। |