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जैन कला तीर्थ खजुराहो यह तीर्थ अब किसी परिचय का मोहताज नहीं हैं। बुंदेलखंड़ में चंदेलों का नौवीं से तेरहवीं सदी तक कुल पाँच सौ वर्ष राज्य रहा और खजुराहो उनकी राजधानी थी। अब उन्हीं चंदेलों द्वारा पत्थरों पर गढ़ी कलाकृतियों के कारण दुनियाँ बुंदेलखंड़ को कम, खजुराहों को ज्यादा जानती है। कभी कहा जाता था बुंदेलखंड में खजुराहों तीर्थ है पर अब स्थितियाँ इतनी बदल गई हैं कि कहा जाने लगा है- ’खजुराहो, मध्यप्रदेश के बुंदेलखंड़ में है।’ मध्यप्रदेश के छतरपुर जिला स्थित खजुराहो के लिये हवाई जहाज की सुविधा प्रायः सभी ’मेट्रो’ शहरों से उपलब्ध है। इसके अतिरिक्त देश के अन्य कई बड़े शहरों से सीधी ’लक्जरी’ बसें चलतीं हैं। यों बस मार्ग से मध्यप्रदेश के छतरपुर और पन्ना जिलों से लगभग 45-45 कि.मी. की बराबर दूरी पर बमीठा तिराहे से खजुराहो पहुँचा जाता है। झाँसी से यह दूरी 175 कि.मी. है। विड़ंवना यह है कि अभी भी पर्यटकों को पश्चिमी मंदिरों के समूह को दिखाकर प्रायः वापिस कर दिया जाता है। पूर्वी मंदिर समूह जिनमें केवल जैन तीर्थ आता है,के संबंध में लोगों को कम जानकारी उपलब्ध हो पाती है। यहाँ केवल खजुराहो के पूर्वी समूह अर्थात ’जैन तीर्थ खजुराहो’ मात्र का परिचय दिया जा रहा है। उपरोक्त विसंगति कदाचित इसलिये उत्पन्न होती है कि जैन तीर्थ खजुराहो के मंदिरों के पास नशा,विलासिता और कथित मस्ती नहीं की जा सकती। जैन मंदिर पहले आध्यात्मिक स्थल हैं, बाद में अन्यथा आकर्षण के। इसका प्रबंध आसपास के जैनियों की एक समिति करती हैं। जैन मंदिर समूह के शिलावशेष यह प्रमाणित करते हैं कि यहाँ स्थित मंदिरों की संख्या भी कभी बहुत अधिक रही होगी। लेकिन वर्तमान में 4 मंदिर ही शेष हैं। 1.पाश्र्वनाथ मंदिर 2.आदिनाथ मंदिर 3.घंटाई मंदिर 4.शांतिनाथ मंदिर और संग्रहालय इन मंदिरों की शिल्पकला यह पुष्ट करती है कि सौन्दर्य केवल ’सैक्स’ के लिये नहीं, विलासिता में नहीं वरन् वीतरागता में भी होता है और साधना के लिये भी उपयोगी है। पूर्वी समूह के एक मात्र पाश्र्वनाथ मंदिर का उत्कृष्ट कला-वैभव वस्तुतः पूरे खजुराहो पर भारी पड़ता है। जैन मंदिर समूह परकोटे से आवृत्त है। यहाँ यह अनुमान अवश्य लगता है कि मंदिरों की संख्या कभी 34-35 के आसपास रही होगी। परंतु अब पाश्र्वनाथ और आदिनाथ मंदिर दो ही उल्लेखनीय हैं क्योंकि शांतिनाथ मंदिर अभी 100-150 वर्ष पहले ही अन्य मंदिरों को जोड़कर बनाया गया है और चैथा-घण्टाई मंदिर लगभग खण्डहर हो चुेका है। पाश्र्वनाथ मंदिर चंदेल राज्य काल के दौरान सन् 950-970 की अवधि में पाहिल सेठ ने नाहर शैली के इस पंचायतन वाले विशाल कलात्मक मंदिर का निर्माण कराया था। सांगोपांग सौष्ठव वाले इस पूर्वाभिमुख मंदिर में एक पश्चिम मुख वेदी भी है। जगमोहन,महामंडप,अंतराल,प्रदक्षिणा और गर्भगृह की पंच आयतन संरचना वाले इस जिनालय का शिखर अद्वितीय कलाकृतियों से मंड़ित है। मेरु आकार के मुख्य शिखर पर छोटे-बडे़ अगणित शिखर अनेक उरु श्रंग व कर्ण श्रंग,बाहरी दीवालों पर तीन पटलों में उत्कीर्ण तीर्थंकर, शासन देवी-देवता,द्वारपाल,दिक्पाल,विविध एवं सूक्ष्म भाव मुद्राओं वाली यौवनाओं की सुन्दर मूर्तियाँ तथा प्रियतम का पत्र पढ़ती हुई षोडंसी,नयनों में काजल आंजती हुई रमणी,नूपुर बाँधती हुई नृत्यांगना,पाँव का काँटा निकालते हुये बाला और बेटे को दूध पिलाते हुए ममतामयी माता आदि के सचमुच हृदय स्पर्शी हैं। मंदिर की मूल वेदी के दोनों ओर तेइसवें तीर्थंकर पाश्र्वनाथ की दो कायोत्सर्ग श्यामल पùासन प्रतिमा विराजमान कर दी गई थीं। परिकर में तीर्थंकर जितनाथ,संभवनाथ ,चंद्रप्रभु,शीतलनाथ,पाश्र्वनाथ व महावीर स्वामी की मूर्तियाँ विद्यमान हैं। इस मंदिर के बाहरी दीवालों पर राम और सीता के अनेक आख्यान उत्कीर्ण है जो खजुराहो के हिन्दु मंदिरों में भी नहीं मिलते हैं। मंडप के ऊपर अनेक सुंदर चित्रों के बीच सद्यःस्नाता यौवना अपने केशों से जल छिटक रही है, इन जल-बिन्दुओं को हंस, मोती समझकर आकर्षक में पीने के लिये लपकता है। यह उत्कीर्णन सजीव सा प्रतीत होता है। प्रवेश द्वार पर गंगा-यमुना,नवग्रह,यक्ष,मिथुन मूर्ति,चतुर्भज,द्वारपाल आदि का सुंदर अंकन है। अप्सराओं और ब्याल मूर्तियों की यहाँ बहुतायत है। प्रदक्षिणा गैलरी की भित्तियों पर उत्कीर्ण शासन देव, अलसाई अप्सरा, पत्र लिखती हुई प्रियतमा, माथे पर कुमकुम लगाते हुये तरुणि, चोली के बंध बांधती हुई गोरी और पाँव में कांटा चुभने वाले दृष्यांकन में अत्यंत सूक्ष्म मनोभावों को उकेरा गया है। इस मंदिर के द्वार पर संवत् 1011 का एक षिलालेख धंग राज्य और निर्माता पाहिल से संबंधित तत्थों का रोचक वर्णन प्रस्तुत करता है। आदिनाथ मंदिर पाष्र्वनाथ मंदिर के पास ही लगभग 100 वर्ष बाद निर्मित,नागर शैली का यह जिनालय अत्यंत सौम्य और सादगी भरा है। प्रथम जिन तीर्थंकर आदिनाथ की सं. 1215 की मूर्ति वंदनीय है। यहाँ का एक षिलालेख प्रमाणित करता है कि मदन वर्मा के राज्य में साल्हे के द्वारा संभवनाथ की प्रतिमा यहाँ प्रतिष्ठित कराई गई थी। षिखर पर अलंकरण पाष्र्वनाथ मंदिर की भाँति ही तीन पटलों में अंकित हैं। ऊपर किन्नर,दिवाकर और गंधर्व व नीचे अप्सरायें,यक्ष,मिथुन व तीर्थंकरों के पद्यासन देव देवियाँ निर्मित हैं। इन मूर्तियों के पैनलों में माँग में सिंदूर भरतीं और दर्पण निहारतीं श्रंगारिका, आँखों में सुरमा लगाती मृगनयनी एवं वात्सल्यमयी माँ का अंकन इत्यादि मनोहारी दृष्य हैं। तोरण में माता के सोलह स्वप्न गर्भालय की पद्यषीला, प्रवेष द्वार पर गंगा-यमुना,द्वारपाल और देवी अंबिका का सुंदर मूर्तियाँ मनोहारी हैं। शांतिनाथ मंदिर जैसा कि पूर्व में बताया जा चुका है लगभग सौ-डेढ़ सौ वर्ष पूर्व ही खजुराहो के जैन मंदिरों की प्राचीन उपलब्ध सामग्री से इस मंदिर का संयोजन किया गया था। इसमें 12 फुट उँची तीर्थंकर शांतिनाथ की संवत् 1085 की मूर्ति प्रतिस्थापित है। इस तरह 12 वेदियाँ यहाँ निर्मित की गई हैं। आंगन की दीवाल में लगी धरणेन्द्र-पद्यावती की युगल मूर्ति, एक विषाल षिलाखंड में भूत, भविश्य और वर्तमान चैबीस तीर्थंकरों की प्रतिमायें, एक मंडप में सत्ताइस नक्षत्रों की मूर्तियाँ,देवी अम्बिका, नवग्रह आदि दर्षनीय हैं। घण्टाई मंदिर ग्यारहवीं शताब्दी का निर्मित यह मंदिर अब लगभग ध्वस्त हो चुका है। मात्र मंडप, द्वार एवं गर्भगृह के कुछ अवषिष्टि षिलाखंड यह बताते हैं कि तीर्थंकर आदिनाथ का यह मंदिर किसी समय अत्यंत कलात्मक रहा होगा। विद्यमान स्तंभों पर वेलि-षाखाओं के साथ जंजीरों में लटकती घंटिकायें इतनी वास्तविक प्रतीत होती हैं कि मानों हवा का झोंका चलतेे ही यह एक साथ बज उठेंगी। हमारे मन मंदिरों में मुक्ति के लिये यह संगीत श्रृंखलायें, अध्यात्म के आनंद की चैतन्य घंटियाँ बजाती हैं। यही तो उद्देष्य है इन जिनालयों का। खजुराहो का जैन षिल्प संग्रहालय भी अद्भुत कलाकृतियों से संपन्न होने के कारण दर्षनीय हैं। जहाँ सैकड़ों कलात्मक चंदेलों की विलुप्त गाथाओं का मौन उच्चारण कर रहे हैं। आवष्यकता है आपके अंतःकरण में वैसी ही भावकृति उभरने की।
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