सिद्ध क्षेत्र तीर्थ नैनागिरि (रेषंदीगिरि)वर्तमान छतरपुर जिले में स्थित नैनागिरि जैन तीर्थ-क्षेत्र वस्तुतः सागर-कानपुर मार्ग पर सागर लगभग 40 किलोमीटर दूर स्थित दलपतपुर ग्राम से,पूर्व दिषा में मात्र 12 किलोमीटर पर दर्षनीय है। ’पासस्य समवसरणे सहिया वरदत्ता-मुणिवरा पंच, रिस्सिंदेगिरिसिहरे णिव्वाण गया तेसिं।।’ अर्थात् तेइसवें जैन तीर्थं पर आया था। वरदत्त आदि पाँच ऋशियों ने यहाँ से मुक्ति प्राप्त की थी। इससे यह सिद्ध तीर्थ की कोटि में आता है।निर्वाण काण्ड की रचना प्रथम षताब्दी की मानी जाती है और पाष्र्वनाथ का काल तीर्थंकर महावीर से 250 वर्श पूर्व का है। इन तथ्यों को दृश्टि में रखने से यह तीर्थ 3000 वर्श से अधिक प्राचीन होना चाहिये।तीर्थ के रेषंदीगिरि और नैनागिरि नामों में काल-बोध का भाश नहीं होता। देखने पर रेषंदीगिरि आधुनिक प्रतीत होता है परंतु निर्माण काण्ड में ही इस तीर्थ का नाम रेषंदीगिरि आधुनिक प्रतीत होता है। कदाचित नैनागिरि नाम पन्ना रियासत के समय ग्रामीण जनों का दिया हुआ होना चाहिये क्योंकि यह पर्वत नयनाभिराम तो है ही, इससे लोग संभवतः नैनागिरि कहने लगे होंगे। रेषंदीगिरि का नामार्थ तो ऋशि व इन्द्र के गिरि होने से सार्थक होता है। मंदिरों की प्राचीनतारेषंदीगिरि में कुल 52 मंदिर हैं। पर्वत पर 38 और तलहटी में 14 जैन मंदिर हैं। पर्वत पर स्थित मंदिर संख्या 6 ही सबसे अधिक प्राचीन काल संवत् 1109 अंकित है अर्थात् ईस्वीं 1052 यह 11वीं सदी के चंदेलों के निर्माण का प्रारंभिक काल माना जाता है।इसी से यह प्रमाणित होता है कि यहाँ का अधिकांष षिल्क-संसार भी चंदेल कालीन है। जिनालयों की स्थिति निम्नानुसार है- पाष्र्वनाथ जिनालययह बीसवीं षताब्दी का प्रथम क्रम पर नव निर्मित मंदिर है जिसमें सन् 1051 में तीर्थंकर पाष्र्वनाथ की साढ़े तेरह फुट ऊँची खड़गासन प्रतिमा स्थापित की गई थी। मंदिर विषाल एवं भव्य है जिसकी भित्तियों पर 24 तीर्थंकर की स्थापना है और तीर्थंकरों की स्थापना है और गर्भगृह के द्वार पर बाहुबली स्वामी की साढ़े पाँच फुट ऊँची प्रतिमा स्थित है। वरदत्तादि पाँचों मुनिवरों की मूतियाँ भी यहाँ निर्मित की गई हैं। अन्य मंदिर-मंदिर संख्या 2- संवत् 1498 में प्रतिश्ठत तीर्थंकर आदिनाथ की मूर्ति। मंदिर संख्या 3- संवत् 1943 की तीर्थंकर मुनि सुब्रतनाथ तीर्थंकर। मंदिर संख्या 4- संवत् 1943 की षांतिनाथ की प्रतिमा स्थापित है। मंदिर संख्या 5- संवत् 1942 की चंदाप्रभु प्रतिमा। मंदिर संख्या 6- संवत् 1709 की देषी पाशाण की पाष्र्वनाथ प्रतिमा। मंदिर संख्या 7- संवत् 1943 की चंदाप्रभु भगवान की मूर्ति। मंदिर संख्या 8- संवत् 1943 की महावीर स्वामी की मूर्ति। मंदिर संख्या 9- संवत् 1548 मुनि सुब्रतनाथ तीर्थंकर की प्रतिमा। मंदिर संख्या 10- संवत् 1943 की मुनि सुब्रतनाथ प्रतिमा आदि स्थापित हैं। इसी तरह छत्तीस मंदिरों में विविध तीर्थंकरों की मूर्तियाँ दर्षनीय हैं। पैंतीसवें जिनालय में भगवान पाष्र्वनाथ के चरण विद्यमान हैं। जल मंदिर38वाँ जिनालय पहाड़ की तलहटी में स्थित सरोवर के बीच में हैं। इस सुंदर संरचना को ’जल मंदिर’ के नाम से ख्याति उपलब्ध है। इसमें 1521 से लेकर संवत् 1967 तक की मूर्तियाँ विद्यमान हैं। जल मंदिर से आगे एक परकोटे में तेरह जिनालय हैं। 40वाँ तीर्थंकर नेमिनाथ संवत् 1966,41वाँ नेमिनाथ संवत् 1979, 42वाँ पाष्र्वनाथ संवत् 1964, 43 वाँ चंद्रप्रभु संवत् 1967,44 वाँ नेमिनाथ संवत् 1964,45वाँ चंद्रप्रभु संवत्,46वाँ नेमिनाथ संवत् 1948, 48वाँ पाष्र्वनाथ, 50वाँ षांतिनाथ संवत् 1948, 51वाँ ऋशभनाथ संवत् 1948 और 52वाँ मंदिर अटारी का मंदिर कहलाता था जिसकी संवत् 1557 से संवत् 2008 तक की मर्तियाँ अन्यत्र स्थानांतरित कर दी गई हैं। नवनिर्मित समवषरण जिनालय जल मंदिर के रुप में षोभायमान है। मंदिरों की वंदना करने के अतिरिक्त नैनागिरि में संतों के लिये उदासीन आश्रम,महिला आश्रम और संस्कृत विद्यालय आदि जैन तीर्थ कमेटी द्वारा संचालित किये जा रहे हैं। वर्तमान में संस्कृत विद्यालय की जगह स.के. सिंघई उच्चतर माध्यमिक विद्यालय संचालित है। इन संस्थानों में संस्कार और साधना दोनों फलीभूत होते है। धर्मषाला एवं समस्त वांछनीय सुविधायें दर्षनार्थियों को सतत् निःषुल्क उपलब्ध कराई जातीं हैं। |