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सिद्ध तीर्थ कुण्डलपुर

बुंदेलखंड के ’बड़े बाबा’ नाम से देश भर में ख्यात जैन तीर्थ कुण्डलपुर वर्तमान मध्यप्रदेश के दमोह जिले में अवस्थित है। मध्य रेलवे के बीना जंक्शन से कटनी की ओर जाने वाली रेलगाड़ी से दमोह उतरकर मात्र 40 किलोमीटर पक्के मार्ग से ग्राम पटेरा के निकट ही स्थित इस जैन तीर्थ पर पहँुचना आसान है। वस्तुतः धार्मिक और पुरातात्विक तीर्थ के साथ यह पर्यटन योग्य भी रमणीक स्थल हैं। जहाँ सभी आधुनिक सुविधायें प्रायः उपलब्ध है।
कुण्डल के आकार की गोलाकार पर्वत श्रृंखला होने के कहलाया तीर्थ कुण्डल, प्रकृति की पावन,प्राँजल और सुखद हरीतिमा के बीच विद्यमान है। भव्य 63 प्राचीन मंदिरों ने इस तीर्थ को अद्भुत गरिमा प्रदान की है। बीच में जड़े पावन ’वर्धमान सागर’ नाम के सरोवर ने तीर्थ की सुंदरता की सुंदरता को और अधिक आकर्षक बनाया है। ईसवीं पूर्व छटवीं सदी में चैबीसवें तीर्थंकर महावीर स्वामी का समवरण यहाँ आया था और अंतिम केवली भगवान श्रीधर स्वामी की निर्वांण भूमि होने से यह सिद्ध तीर्थ के रुप में मान्य है। जैसा कि ’बड़े बाबा’ के सामने स्थित चरण चिन्ह के सामने ही अंकित है- ’कुण्डल गिरौ श्री श्रीधर’। ’श्री तिलोयपण्णति’ से इसकी पुश्टि भी होती है।

पुरातत्व

मूल पुरातत्व तो छठवीं शताब्दी का प्रतीत होता है परंतु निकट स्थित ’बर्रट’ नाम के गाँव को श्री कृश्ण के तत्कालीन विराट नगर के काल से जोड़ा जाता है। यहाँ अनेक प्राचीन मूर्तियाँ प्राप्त हुई हैं और अभी भी शिल्पावशेष विद्यमान हैं। कुण्डलपुर में अवसर अवसर पर अनेक जीर्णोंद्धार हुये हैं परंतु विगत 300-400 वर्षों में ही अधिकांश निर्माण किये गये हैं। वर्तमान वस्तुशिल्प मराठा कालीन ही अनुमानित हैं।
यहाँ उपलब्ध दो मठ पुरातत्व के महत्वपूर्ण प्रमाण हैं जिनमें एक ब्रम्ह मठ अभी भी शासन के पुरातत्व विभाग द्वारा संरक्षित किया गया है और दूसरा रुक्मणी मठ लगभग समाप्यप्राय है। जहाँ धरणेन्द्र-पद्मावती को एक वृक्ष के नीचे दर्शाये जाने वाला एक महत्वपूर्ण शिलाखण्ड अभी भी विद्यमान है। इस वृक्ष के ऊपर तीर्थंकर पाश्र्वनाथ का अंकन है।

इतिहास

मूर्ति रचना की दृष्टि से पुरातत्वविदों द्वारा कुण्डलपुर का शिल्प छटीं-आठवीं सदी का माना जाता है। यह उत्तर गुप्तकाल के बाद का सृजन होना चाहिये। हालाँकि मूर्ति लेख से केवल 12वीं सदी की ही एक प्रतिमा का प्रमाण मिलता है। सन् 1126 की श्री मनसुखजी द्वारा कराई गई प्रतिश्ठा के बाद केवल 1532 का एक प्रतिमा लेख उपलब्ध हुआ है, शेष प्रतिमायें उसके बाद की कालावधि की हैं।
भट्टारकों के पदासीन होने के लेख भी प्रमाण स्वरुप उपलब्ध हैं यथा सन् 1742 में श्री महाचंद्र भट्टारक और सत्रहवीं सदी में श्री सुरेन्द्र कीर्ति स्वामी भट्टारक ने कुण्डलपुर का जीर्णोद्धार कराया और अपने साधना का स्थल बनाया था। इसी परंपरा में सुचंद्रकीर्ति और ब्र0 नेमिसागर ने यहाँ पुननिर्माण कराया जिसके लेख भी उपलब्ध हैं।
जैन तीर्थों में कुण्डलपुर जैसे ऐसे विरल ही पुण्य स्थल हैं, जहाँ जैनेतर राजाओं ने अपनी मनोकामना पूरी होने पर जीर्णोंधार कराया हो। इतिहास साक्षी है कि ’बुदेल केसरी’ महाराज छत्रसाल जब विदेशी मुगल आतताइयों से सब कुछ हार चुके थे तो जंगलों से भटकते भटकते यहाँ ’बड़े बाबा’ से मन्नत माँगने आ पहुँचे और कहते है जब उन्हें बुंदेलखंड का राज्य पुनः वापस मिल गया तो ’बड़े बाबा’ के प्रति अगाध श्रद्धा से वे विव्हल हो उठे थे। तब महाराजा छत्रसाल ने सत्रहवीं सदी में न केवल बड़े बाबा के मंदिर पर सोने चाँदी का घण्टा और चँवर-छत्र चढ़ाया वरन् मंदिर और तालाब का जीर्णोंद्धार भी कराया था। यह उल्लेख बुंदेलखंड के इतिहासकारों ने तो किया ही है, ’बड़े बाबा’ के मंदिर में स्थित शिलालेख भी यह प्रमाणित करता है। कुण्डलपुर के मुख्य प्रवेश द्वार से प्रवेश करते ही पत्थरों का विशाल खुला प्रांगण है, जिसमें लगभग ५० फीट ऊंचे 'मान स्तंभ' की स्थापना की गई है। बायीं ओर पहला मंदिर 'बड़कुल मंदिर' कहलाता है, यद्यपि यह क्रमांक में अंतिम (६३) है। इसमें मूल नायक पुष्पदंत है।

क्रमांक १ मंदिर 'वर्धमान सागर' के बायीं ओर से अम्बिका देवी मंदिर के पास से होकर पहाड़ी की ओर जाने वाले वंदना मार्ग पर स्थित है। यह मार्ग पहाड़ी के शिखर के छोर पर स्थित मंदिर क्रमांक ६ (संभवनाथ) पर समाप्त होता है। यह मंदिर को छैघरिया परिवार द्वारा निर्मित कराए जाने के कारण, यह पूरी पहाड़ी 'छैघरिया की चढ़ाई' कहलाने लगी है। इसी मार्ग पर २ से ५ क्रमांक (क्रमशः नेमीनाथ, चरण, चरण, चंद्रप्रभु) के मंदिर हैं। छैघरिया के बाद हैं ससुर-दामाद के साथ-साथ बने मंदिर। छैघरिया मंदिर से आगे का रास्ता बड़े बाबा के मंदिर परकोटे पर जाकर समाप्त होता है। इस मार्ग पर ७ से १२ क्रमांक (क्रमशः पार्श्वनाथ, चंद्रप्रभु, आदिनाथ, पार्श्वनाथ, पार्श्वनाथ, चंद्रप्रभु) तक के मंदिर हैं। परकोटे के भीतर ही बड़े बाबा का मंदिर (क्रमांक २२) है। इसके अलावा परकोटे में १३ से २१ क्रमांक (क्रमशः पार्श्वनाथ, नेमीनाथ, महावीर, पार्श्वनाथ, अजीतनाथ, चंद्रप्रभु, अजीतनाथ, खाली, महावीर) के मंदिर और हैं परकोटे की दीवार में बने आलों में भी ग्यारहवीं-बारहवीं शताब्दी की अनेक प्राचीन मूर्तियां स्थापित हैं।

परकोटे की दक्षिणी दीवार से होकर दायीं ओर की पहाड़ी पर जाने वाले मार्ग पर २३ से ३५ क्रमांक (क्रमशः आदिनाथ, पदमप्रभु, चंद्रप्रभु, चंद्रप्रभु, नेमीनाथ, पार्श्वनाथ) तक के मंदिर हैं। ३६ से ३९ क्रमांक (क्रमशः पार्श्वनाथ, आदिनाथ, चंद्रप्रभु, नेमीनाथ) तक के मंदिर बड़े बाबा के वंदना मार्ग शुरू होने से पहले नीचे दायीं ओर स्थित है।

वंदना के लिए कुण्डलगिरि पहाड़ी के प्रथम प्रवेश द्वारा (धर्मशाला प्रांगण में से होकर) से प्रवेश करते ही दायीं ओर तालाब के ठीक किनारे 'शिखर मंदिर समूह' स्थित है, जिसमें ४० से लेकर ६० क्रमांक तक के शेष मंदिर हैं। इनमें से केवल एक मंदिर क्रमांक ४९ 'वर्द्धमान सागर' में स्थित है, जिसे 'जल मंदिर' कहते हैं। इसमें चतुर्मुखी तीर्थंकर मूर्ति है। प्रातःकाल तथा धवल चांदनी रातों में तालाब में पड़ने वाले इसके प्रतिबिंब की छटा देखने लायक होती है।

शिखर मंदिर समूह के प्रवेश द्वार में घुसते ही दायीं ओर समवशरण रचना है, जो मंदिर क्रमांक ६१ है। इसमें २४ तीर्थंकरों की चौबीसी है। क्षेत्र के प्रवेश द्वार के बाद के प्रांगण में स्थित मानस्तंभ, मंदिर क्रमांक ६२ है, इसमें महावीर की प्रतिमा स्थापित है।

शिखर मंदिरों के छज्जों पर लाखों मधुमक्खियों के छत्ते बने हुए हैं। आरती तथा आचार्य भक्ति के समय ये मधुमक्खियां कभी-कभी हजारों की संख्या में आकाश में मंडराया करती हैं किंतु, इन्होंने आज तक किसी भी यात्री को कष्ट नहीं पहुंचाया। न ही किसी ने इनके स्थान से इन्हें बेदखल करने की कोशिश की है।

बड़े बाबा का परिचय

प्राकृतिक सुषमा की आनंदमयी गोद में कुण्डलाकार पर्वत श्रेणियों के मध्य स्थित ऊंचे-ऊंचे जिनालय। दूर तक विस्तृत हरियाली और उसके ऊपर बड़े बाबा की भव्य, मनोहारी, मनोवांछित फलदायिनी और वितरागी प्रतिमा। कुल मिलाकर तीर्थयात्री का मन मोहने तथा आह्‌लादित करने को पर्याप्त है। भारत के हृदय स्थल मध्यप्रदेश के सागर संभाग का एक जिला है दमोह। यहीं स्थित है जिला मुख्यालय से लगभग ३५ कि.मी. दूर पटेरा तहसील में, बुंदेलखंड का 'तीर्थराज' कुण्डलपुर। बड़े बाबा और प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ का पावन और अद्वितीय तीर्थ-स्थल।

यहीं स्थित है सुरम्य 'कुण्डलगिरि' नामक ६२ छोटे-बड़े जिन मंदिरों का उजला समूह। इनके बीच में स्थित है जैन धर्म की कीर्ति पताका फहराते हुए, जिन शिरोमणि 'बड़े बाबा' का मुख्य मंदिर।

इसी मंदिर में प्रतिष्ठित हैं चमत्कारिक बड़े बाबा, जिनके दर्शनों को चले आते हैं श्रद्धा से भरपूर जैन-अजैन, बाल-अबाल, स्त्री-पुरुष भक्तजन, यूं तो वर्षभर किंतु मेलों तथा दीपावली पर विशेष रूप से। क्योंकि ये बड़े बाबा नाम के बड़े बाबा नहीं हैं, उनके नाम और दर्शन दोनों बड़े हैं।

कुण्डलपुर तीर्थ पर बड़े बाबा के दर्शन के लिए भक्तों का आगमन प्रतिदिन होता रहता है। सभी जाति और सम्प्रदाय के लोग भक्ति भाव से आते हैं और बड़े बाबा के दर्शन कर छत्र चढ़ाकर, छापे लगाकर, बड़े बाबा का मंत्र जाप करके मनोकामनाएं पूरी करते हैं। मान्यता है कि यहां कोई भी मनोकामना अपूर्ण नहीं रहती। छोटे-बड़े सब, निःसंतान दंपत्ति संतान प्राप्ति के लिए, नए वाहन खरीदने वाले दुर्घटनाओं से बचने तथा व्यापारी उन्नति के लिए 'बड़े बाबा' के दरबार में आते हैं।

बड़े बाबा की विशालता को न शब्दों में संजो लेना सरल है, न उनका पार पाना सहज। प्रभु की महिमा अपरंपार है। आज तक कौन है, जो उसे भलीभांति समझ पाया है। यह कार्य इतना कठिन है, जैसे कोई सागर की अर्चना अंजुलि भर जल से करे। वास्तविक बात तो उस आस्था और विश्वास की है, जिसके चलते वह निराकार निजस्वरूप को पाने की भावना रखता है।

प्रमुख मंदिर

कुण्डलपुर के मुख्य प्रवेश द्वार से प्रवेश करते ही पत्थरों का विशाल खुला प्रांगण है, जिसमें लगभग ५० फीट ऊंचे 'मान स्तंभ' की स्थापना की गई है। बायीं ओर पहला मंदिर 'बड़कुल मंदिर' कहलाता है, यद्यपि यह क्रमांक में अंतिम (६३) है। इसमें मूल नायक पुष्पदंत है।

क्रमांक १ मंदिर 'वर्धमान सागर' के बायीं ओर से अम्बिका देवी मंदिर के पास से होकर पहाड़ी की ओर जाने वाले वंदना मार्ग पर स्थित है। यह मार्ग पहाड़ी के शिखर के छोर पर स्थित मंदिर क्रमांक ६ (संभवनाथ) पर समाप्त होता है। यह मंदिर को छैघरिया परिवार द्वारा निर्मित कराए जाने के कारण, यह पूरी पहाड़ी 'छैघरिया की चढ़ाई' कहलाने लगी है। इसी मार्ग पर २ से ५ क्रमांक (क्रमशः नेमीनाथ, चरण, चरण, चंद्रप्रभु) के मंदिर हैं। छैघरिया के बाद हैं ससुर-दामाद के साथ-साथ बने मंदिर। छैघरिया मंदिर से आगे का रास्ता बड़े बाबा के मंदिर परकोटे पर जाकर समाप्त होता है। इस मार्ग पर ७ से १२ क्रमांक (क्रमशः पार्श्वनाथ, चंद्रप्रभु, आदिनाथ, पार्श्वनाथ, पार्श्वनाथ, चंद्रप्रभु) तक के मंदिर हैं। परकोटे के भीतर ही बड़े बाबा का मंदिर (क्रमांक २२) है। इसके अलावा परकोटे में १३ से २१ क्रमांक (क्रमशः पार्श्वनाथ, नेमीनाथ, महावीर, पार्श्वनाथ, अजीतनाथ, चंद्रप्रभु, अजीतनाथ, खाली, महावीर) के मंदिर और हैं परकोटे की दीवार में बने आलों में भी ग्यारहवीं-बारहवीं शताब्दी की अनेक प्राचीन मूर्तियां स्थापित हैं।

परकोटे की दक्षिणी दीवार से होकर दायीं ओर की पहाड़ी पर जाने वाले मार्ग पर २३ से ३५ क्रमांक (क्रमशः आदिनाथ, पदमप्रभु, चंद्रप्रभु, चंद्रप्रभु, नेमीनाथ, पार्श्वनाथ) तक के मंदिर हैं। ३६ से ३९ क्रमांक (क्रमशः पार्श्वनाथ, आदिनाथ, चंद्रप्रभु, नेमीनाथ) तक के मंदिर बड़े बाबा के वंदना मार्ग शुरू होने से पहले नीचे दायीं ओर स्थित है।

वंदना के लिए कुण्डलगिरि पहाड़ी के प्रथम प्रवेश द्वारा (धर्मशाला प्रांगण में से होकर) से प्रवेश करते ही दायीं ओर तालाब के ठीक किनारे 'शिखर मंदिर समूह' स्थित है, जिसमें ४० से लेकर ६० क्रमांक तक के शेष मंदिर हैं। इनमें से केवल एक मंदिर क्रमांक ४९ 'वर्द्धमान सागर' में स्थित है, जिसे 'जल मंदिर' कहते हैं। इसमें चतुर्मुखी तीर्थंकर मूर्ति है। प्रातःकाल तथा धवल चांदनी रातों में तालाब में पड़ने वाले इसके प्रतिबिंब की छटा देखने लायक होती है।

शिखर मंदिर समूह के प्रवेश द्वार में घुसते ही दायीं ओर समवशरण रचना है, जो मंदिर क्रमांक ६१ है। इसमें २४ तीर्थंकरों की चौबीसी है। क्षेत्र के प्रवेश द्वार के बाद के प्रांगण में स्थित मानस्तंभ, मंदिर क्रमांक ६२ है, इसमें महावीर की प्रतिमा स्थापित है।

शिखर मंदिरों के छज्जों पर लाखों मधुमक्खियों के छत्ते बने हुए हैं। आरती तथा आचार्य भक्ति के समय ये मधुमक्खियां कभी-कभी हजारों की संख्या में आकाश में मंडराया करती हैं किंतु, इन्होंने आज तक किसी भी यात्री को कष्ट नहीं पहुंचाया। न ही किसी ने इनके स्थान से इन्हें बेदखल करने की कोशिश की है।

कुण्डलपुर क्षेत्र के मंदिरों में प्रतिष्ठित मूलनायक प्रतिमाएं

 

छैयरिया वंदन मार्ग

   
     

1. चंद्रप्रभु

3. चरण

5. चंद्रप्रभु

2. नेमीनाथ

4. चरण

 
 

बड़े बाबा के दायीं ओर की पहाड़ी छैघरिया के मंदिर

     

6. संभवनाथ

12. पार्श्वनाथ

18. चंद्रप्रभु (१८२६)

7. पार्श्वनाथ

13. पार्श्वनाथ (१८९०)

19. अजितनाथ

8. चंद्रप्रभु

14. नेमीनाथ (प्राचीन)

20. शांतिनाथ

9. आदिनाथ

15. महावीर (प्राचीन)

21. महावीर (प्राचीन)

10. पार्श्वनाथ

16. पार्श्वनाथ (प्राचीन)

22. आदिनाथ (९वीं-१०वीं शती)

11. पार्श्वनाथ

17. अजितनाथ (१५४८)

 
 

बड़े बाबा के बायीं ओर की पहाड़ी के मंदिर

     

23. आदिनाथ (१५४८)

29. पार्श्वनाथ (१५४८)

35. पार्श्वनाथ (१८५८)

24. पद्मप्रभु (१५४८)

30. पार्श्वनाथ (१५४८)

36. पार्श्वनाथ (१८८७)

25. चंद्रप्रभु

31. चंद्रप्रभु (१६३५)

37. आदिनाथ (१५४८)

26. पारसनाथ (१८७६)

32. चंद्रप्रभु (१९०१)

38. चंद्रप्रभु (१८८२)

27. सुमतिनाथ (१७७७)

33. अरहनाथ (१५४८)

39. नेमीनाथ (१९००)

28. पार्श्वनाथ (१५४८)

34. नेमिनाथ (१७३३)

 
 

वंदना मार्ग पर

     

40. पार्श्वनाथ (१९०१)

48. बाहुबली (नवीन)

56. ऋषभनाथ

41. संभवनाथ (१९०१)

49. चतुर्मुखी तीर्थंकर (जल मंदिर)

57. अजित

42. आदिनाथ (१५४८)

50. पार्श्वनाथ

58. महावीर

43. पार्श्वनाथ (प्राचीन)

51. सुपार्श्वनाथ

59. चंद्रप्रभु

44. चंद्रप्रभु (प्राचीन)

52. आदिनाथ

60. ऋषभनाथ

45. सुपार्श्वनाथ (१५५४)

53. आदिनाथ

61. समवशरण

46. चंद्रप्रभु (प्राचीन)

54. महावीर

62. महावीर (मानस्तम्भ)

47. चंद्रप्रभु (१५५४)

55. वासुपूज्य

63. पुष्पदंत (बल मंदिर)

 

गर्भगृह की अन्य प्रतिमाएँ

 

बड़े बाबा की यह विशाल मूर्ति, प्राचीन परम्परा के अनुरूप अपेक्षाकृत छोटे गर्भगृह में विराजमान है। बड़े बाबा की मूर्ति के पार्श्व में दोनों ओर १२ फीट ऊंची खड्गासन पार्श्वनाथ की तथा चामरधारी देव तथा ऊपर उते हुए माल्यधर गंधर्व मूर्तियां हैं।

सके अतिरिक्त गर्भगृह में दायीं-बायीं तथा सामने की दीवार आदिनाथ, पार्श्वनाथ, मल्लिनाथ, मुनि सुव्रतनाथ की कुल मिलाकर १९ कायोत्सर्ग मुद्रा में तथा पद्मासन दोनों प्रकार की मूर्तियां हैं, जो लाल बलुआ पत्थर की तथा अधिकांशतः चिन्ह युक्त है। अंकन शैली के आधार पर इनका निर्माण काल छठी-आठवीं शताब्दी ई. के बीच का कहा जा सकता है। फिर भी बाबा की मूर्ति सबसे प्राचीन है तथा परवर्ती गुप्तकालीन अर्थात लगभग ६ वीं शती की प्रतीत होती हैं। अनेक मूर्तियां कलचुरी काल की भी हैं। उल्लेखनीय है कि प्राचीन समय में यह सारा क्षेत्र कलचुरियों के अधीन रहा था।

 
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