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अतिशय क्षेत्र पजनारी

स्थिति

सागर जिले में कानपुर मार्ग पर कन्दारी ग्राम होकर मात्र 27 किलोमीटर दूर बाकरई नदी के किनारे एक पहाड़ी पर जैन क्षेत्र पजनारी अवस्थित है। सागर की बण्डा तहसील मुख्यालय से बाँदरी रोड़ पर मात्र 7 किलोमीटर चलकर भी पजनारी क्षेत्र के दर्शन किये जा सकते हैं।

परिचय

बुंदेलखंड के सुरम्य अंचल में विध्याचल की मनोरम पर्वत श्रृंखलाओं के मध्य पर्वत शिखर पर प्राचीन दिगम्बर जैन तीर्थक्षेत्र सागर जिले की बण्ड़ा तहसील के ग्राम पजनारी में स्थित है, इसकी पावन भूमि को बाकरई नदी की पवित्र जलधारा सदैव प्रक्षालित करती रहती है। आठ शताब्दियों से भी अधिक प्राचीन महान इतिहास यहाॅ की शिलाओं में, मूर्तिखंडों में मंदिरों में भग्नावशेषों में और विशाल जिनबिम्बों में आज भी पढ़ा और अनुभूत किया जा सकता है। चंदेलकालीन जिनालयों के मुगलसेना के धर्मान्ध आक्रमण की कहानी कहते हुये अवशेष यहाॅ आज भी विद्यमान है। यशस्वी श्रावक, तीर्थ संवर्धक, दानवीर श्रेष्ठी पाणाशाह द्वारा निर्मित भव्य जिनालय बुंदेलखंड में अनेकों जगह विद्यमान है। जैन धर्म का यह यशस्वी अनुयायी भगवान शांतिनाथ भगवान कुथुनाथ और भगवान अरहनाथ का विशेष भक्त रहा होगा। तभी तो उसने इन तीर्थंकरों की विशाल त्रिमूर्तियों का पजनारी सहित अनेकों स्थान पर निर्माण कराया। यहाॅ के उनके दोनों ओर भगवान अरहनाथ और भगवान कंुथुनाथ की विशाल मनोज्ञ प्रतिमायें खडगासन में है,जिससे वीतरागता की धारा सदैव प्रवाहित होती रहती है। भगवान शांतिनाथ,कंुथुनाथ,अरहनाथ जैन तीर्थंकरों की परंपरा में वे विभूतियाॅ है जो अपने महानतम सौन्दर्य,विशालतम साम्राज्य और अंततः जगत कल्याण और वीतरागत्व के अद्वितीय संगम के रुप में हमारी आराधना और वंदना के केन्द्र है।

यहाॅ का पुरातात्विक वैभव तपस्वी संतों,श्रावको और श्रद्धालुओं की आस्था का शताब्दियों तक महान केन्द्र रहा होगा, जिसे साधुओं ने अपनी साधना,श्रावकों ने अपनी भक्ति और जन जन ने अपनी आस्था से महिमा मंडित किया होगा। इनके बीच वह आत्मनिष्ठ,निस्पृह तीर्थभक्त श्राावक श्रेष्ठी पाणाशाह जिसका संकल्प उसकी नश्वर पर्याय को सार्थकता का अनश्वर आयाम दे गया। श्रद्धा का यही अजेय रुप जो आज भी क्षेत्र के संरक्षण और पुनरुत्थान का संकल्प श्रद्धालुओं की चेतन में हिलोरे ले रहा है।

मुगलकाल में मुगल शासकों द्वारा मंदिरों के विध्वंस करने के कारण सैकड़ों वर्षों तक पत्थर एवं वृक्षों से ढके इस प्राचीन जिनालय को लगभग 80 वर्ष पूर्व ब्रह्मचारी राजाराम जी पडवार वालों के प्रयासों से समाज की नजरों में लाया गया।

इस क्षेत्र के जीर्णोद्धार हेतु युग संत पूज्य गुरुवर श्री 108 आचार्य विद्यासागर जी महाराज के दो बार पावन चरण इस क्षेत्र पर पडे एवं उन्ही के आशीर्वाद से पूज्य मुनिवर श्री निर्णयसागर जी, श्रा 108 अजितसागर जी,श्री 105 निर्भयसागर जी,परमपूज्य 105 आर्यिका आदर्शमति माता जी, परमपूज्य दृणमति माताजी एवं समय समय अन्य साधुओं के साथ साथ ब्रह्मचारी विनय भैया जी एवं ब्रह्मचारी बाबूलाल जी का प्रबंधसमिति एवं समाज को मार्गदर्शन मिल रहा है।

योजनाएॅ

पहाड़ी को हरा भरा स्वरुप प्रदान करने की दिशा में लगभग 3000 औषधीय सौन्दर्यवद्र्वक एवं फलदार वृक्षों का रोपण किया जा चुका है।

क्षेत्र पर प्राकृतिक जड़ी बूटी का उत्पादन एवं उनसे दवा निर्माण की योजना है।

क्षेत्र पर श्रावकों को ठहरने के लिये धर्मशाला एवं पानी की टंकी का निर्माण कार्य किया गया है।

क्षेत्र के आर्कषण

च्ंदेलकालीन अवशेष,मढ़ गुफा, बाकरई नदी, राजा रानी का तालाब, प्राचीन बावड़ी,विशाल आम्रवन

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