दिगंबर जैन अतिशय क्षेत्र जतारास्थितिटीकमगढ़ जिला मुख्यालय से उत्तर की ओर मऊरानीपुर जाने वाले रोड़ पर मात्र 40 कि.मी. दूर जतारा कस्वे में दिगंबर जैन मंदिर पाष्र्वनाथ नाम से एक प्रांगढ़ में दिगंबर जैन अतिशय क्षेत्र विद्यमान है। इतिहाससलीमाबाद,जयतारा और जंत्रघाटी आदि नामों से पूर्व में जाना जाने वाला,जतारा छटवीं सदी में तंत्र-मंत्र के लिये प्रख्यात रहा है। बस्ती से लगी हुई घाटी ’जंग घाटी’ कही जाती थी। यहाँ के राजा जय षक्ति की मृत्यु सन् 857 में हुई थी जो जैन अनुयायी माने जाते थे। जतारा में स्थित भोंयरे में प्राप्त एक षिलालेख में संवत् 993 सन् 936 का वर्णन मिलता है। भूगृह में स्थित षिलालेख के अनुसार संवत् 1153 अर्थात् 1096 में इस मंदिर का निर्माण हुआ था। दूसरा षिलालेख कार्तिक सुदी 14 संवत् 1478 का है। मूल नायक पाष्र्वनाथ के पाद-मूल में संवत् स्थित षिलालेख में सृवत् 1210 अंकित है। यह पुश्ट करता है कि जतारा की मूर्ति-कला का काल लगभग एक हजार वर्श प्राचीन है। पुरातत्वजतारा के बस स्टैण्ड से थोड़ी ही दूर एक परकोटे में 4 जैन मंदिर,1 भोंयरा और गंध कुटी है। इसी प्रांगण में स्वाध्याय सदन,धर्मषाला एवं कुआ भी है। नेमिनाथ जिनालयइस मंदिर में तीन वेदियों पर क्रमषः तीर्थंकर नेमिनाथ बड़े बाबा की पद्मासन ष्यामवर्णी मूर्ति,चन्द्रप्रभु की ष्वेत पद्मासन प्रतिमा और चैबीसवें तीर्थंकर महावीर स्वामी की भी पद्मासन मुद्रा में कत्थई रंग की प्रतिमा वंदनीय है। आदिनाथ जिनालययहाँ मुख्य मूर्ति प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ स्वामी के दोनों ओर बाहुबली एवं भरत चक्रवर्ती की खड़गासन प्रतिमायें स्थापित हैं। यहीं चैबीस तीर्थंकरों की मूतियाँ भी विद्यमान हैं। दाँयी ओर एक गन्धकुटी में पाष्र्वनाथ की ष्याम पद्मासन मूर्ति और खण्डित कलावषेशों का संग्रहालय है। पाष्र्वनाथ जिनालयक्षेत्र के मूल नायक पाष्र्वनाथ तीर्थंकर की सफेद पद्मासन मूर्ति यहाँ दर्षनीय है। इसी मंदिर में सात अन्य वेदियों पर भी तीर्थंकरों की मूर्तियाँ वंदनीय है। पंचवालयदि जिनालयक्षेत्र में स्थित दूसरे आदिनाथ जिनालय के ऊपर इस मंदिर में तीर्थंकर बांसुपूज्य, मल्लिनाथ,नेमिनाथ,पाष्र्वनाथ और महावीर स्वामी की भव्य पद्मासन प्रतिमायें स्थित हैं। इसी मंदिर के कोने की एक गन्धकुटी में पद्मासन ष्वेत प्रतिमा भगवान महावीर स्वामी की स्वामी की स्थापित है। भोंयराजतारा के भोंयरे में विद्यमान मूर्तियाँ न केवल प्राचीन हैं वरन् तत्कालीन पालिस की चमक का ओज विस्मयकारी है। इन प्रतिमाओं के अतिषय की कथायें जतारा के लोग बड़ी श्रद्धा से सुनाते हैं। यहाँ भूगृह स्थित देवालय पाष्र्वनाथ मंदिर के बाँयी ओर दर्षनीय है। |