अतिषय जैन तीर्थ क्षेत्र बानपुर उत्तरप्रदेष के ललितपुर और मध्यप्रदेष के टीकमगढ़ जिला मुख्यालयों को जोड़ने वाले पक्के मार्ग में,बानपुर विद्यमान है। इस तरह ऐतिहासिक गानपुर,ललितपुर रेलवे स्टेषन से मात्र 35 किलोमीटर के बस मार्ग पर स्थित है। बानपुर से टीकमगढ़ की दूरी महज 10 किलोमीटर है। इतिहास भारत के 1857 कालीन प्रथम स्वाधीनता संग्राम में बानपुर के राजा मर्दनसिंह ने उल्लेखनीय एवं महत्वपूर्ण स्वतंत्रता संग्राम कर झाँसी की रानी लक्ष्मीबाई को न केवल सहयोग दिया वरन् स्वराज्य की स्थापना हेतु समूचे बुंदेलखंड़ में विदेषी सत्ता के विरुद्ध संगठन तैयार कर नींव षिला का कार्य भी किया था। मर्दन सिंह ओरछा गद्दी की वंष परंपरा में ही राज्य के विभाजन में सिंहासनरुढ़ हुये और अपने साहस एवं शौर्य से खोये हुये क्षेत्रों को प्राप्त कर, चंदेरी तालबेहट क्षेत्र भी बानपुर में सम्मिलित कर लिया था। अंततोगत्वा संघर्ष करते करते अंग्रजों ने उन्हें नजरबंद कर लिया और स्वतंत्रता के लिये संघर्ष करते हुये वे 22 जुलाई 1879 को गौ-लोकवासी हुये। बानपुर अपनी वर्तमान ऐतिहासिक धरोहर के साथ ही अतिषय जैन तीर्थ की कलात्मक धरोहर के लिये भी दर्षनीय है। यहाँ का सहस्त्रकूट चैत्यालय सचमुच अद्वितीय है। अत्यंत प्राचीन षिल्प और तीर्थंकर मूर्तियों का तो उल्लेखनीय हैं ही। पार्वती नंदन गणेष की भी भारत प्रसिद्ध पाषाण प्रतिमा बानपुर के गणेषगंज में दर्षनीय है। कस्बे का बड़ा जैन मंदिर न केवल प्राचीन है वरन् कलात्मक होने के कारण दर्षनीय भी है। अतिषयबीसवीं सदी के तीसरे दषक तक यहाँ स्थित जैन क्षेत्रपाल निर्जन होने के कारण चोरों के छिपने का अड्डा बन गया था। तभी यहाँ एक छुल्लक महाराज श्रुतिसागर जी पधारे और कुछ ऐसा अतिषय हुआ कि वे इसी क्षेत्र पर ठहर गये और जैन धर्मावलम्बियों को प्रेरित कर इसे जैन तीर्थ के रुप में पुर्नस्थापित कर जीर्णोद्धार कराते हुये आबाद करा दिया। एक नागराज और एक बंजारे की किंवदंतियाँ भी यहाँ थी पर उन्हें प्रमाणिकता नहीं मिल सकी। क्षेत्र की मुख्य मूर्ति षांतिनाथ तीर्थंकर प्रतिमा के अपने आप बढ़ते रहने की जन श्रुतियाँ भी सुनने को पहले मिल जाती थीं। पुरातत्वबानपुर में स्थित दो प्राचीन जैन मंदिरों के अतिरिक्त महरौनी मार्ग पर 280/200 फुट के प्रांगण में प्राचीन जैन मंदिरों का एक समूह स्थित है। इस तीर्थ क्षेत्र को पहले यहाँ क्षेत्रपाल ही कहते थे। मंदिर संख्या एक एवं दोनागर शैली षिखर युक्त इस संयुक्त जिनालय के प्रथम बाह्य भाग में 5’4’’ ऊँचाई की खड़गासन तीर्थंकर एवं अंदर की वेदिका पर सं. 1142 की पद्मासन प्रतिमा तीर्थंकर ऋषभनाथ की है। लगे हुये दूसरे मंदिर के बाह् भाग में 8 फुट ऊँचाई की भगवान शांतिनाथ एवं अंदर के भाग में 8 फुट 6 इंच ऊँची तीर्थंकर की मूर्ति खड़गासन में दर्षनीय है। मंदिर संख्या तीनइस मध्य मंदिर की मंडपाकार संरचना में मुख्य द्वार के ऊपरी तोरण पर क्षेत्रपाल प्रतिमा जड़ी हुई है और बाह्य दीवालों पर तीनों ओर पौराणिक प्रतिमाओं का खजुराहो षिल्प सा उत्कीर्णन है जिनमें शासन देवी देवता,षिव पार्वती आदि के कलात्मक दृष्य हैं। अंत वेदिका पर सं. 1541 की धवल श्वेत संगमरमर से निर्मित पद्मासन तीर्थंकर की प्रतिमा और श्री चरण जी विराजमान हैं। ’’बड़े बाबा’’ का मंदिर यह एक विषिष्ट जिनालय है जिसमें सं. 1001 की 18 फुट ऊँची तीर्थंकर शांतिनाथ की विषाल और भव्य खड़गासन मूर्ति के दोनों ओर तीर्थंकर कुंथनाथ एवं अरहनाथ की सात-सात फुट खड़गासन प्रतिमायें अवस्थित हैं। यह त्रिमूर्ति अत्यंत आकर्षक और चमत्कारिक है। यद्यपि इस तरह की त्रिमूर्ति की संरचनायें बुंदेलखंड के अन्य कतिपय तीर्थों में भी दर्षनीय हैं पर बवनपुर के इस तीर्थ की त्रिमूर्ति पर स्थित षिलालेख से जहाँ इसके निर्माण संवत् 1001 की प्राचीनता संबंधी पुष्टि होती है वहीं मूर्ति पर अंकित घुटनों तक बिखरी तीर्थंकर की केष राषियाँ यह परिलक्षित करती हैं कि इसकी रचना तीर्थंकर के तपकाल की हैं। इसलिये बाँयी मूर्ति कुंथनाथ की न होकर आदि तीर्थंकर ऋषभनाथ की होना ज्यादा पुष्ट होता है। मंदिर के पृष्ठ भाग में एक पद्मासन अत्यंत भव्य प्रतिमा महावीर स्वामी की शीर्ष रहित विराजमान थी। जो स्थानांतरित हो चुकी है। वर्तमान में इस मंदिर का षिखर युक्त नवनिर्माण किया जा चुका है। सहस्त्रकूट चैत्यालय क्षेत्र के पूर्वी भाग में भारतीय स्थापत्य कला का अद्भुत प्रतीक सहस्त्रकूट चैत्यालय एक दर्षनीय सृजन है। उत्कृष्ट नागर शैली का सुगढ़ षिल्प,दसवीं सदी के इस जिनालय के प्रत्येक पाषाण में परिलक्षित होता है। 22 फुट चैड़े आसन पर 50 फुट ऊँचे चैत्यालय के चारों ओर द्वार हैं, अंत भाग के बीच में तीन फुट ऊँचे अधिष्ठान पर एक षिखरनुमा आठ फुट गुणा चार फुट के षिलाखंड़ में चारों ओर एक हजार आठ जिनेद्र भगवान की मूर्तियाँ नगीने की तरह जड़ी हुई हैं। बाहर के भाग में दरवाजों से लगे हुये ज्ञतम्भों पर आधारित चारों ओर चार मंडप आच्छादित हैं। चारों दरवाजों पर द्वारपाल दिक्पाल हैं। तोंरणों पर नवग्रह, ऊपर नीचे मदमस्त हाथी और शेर के साथ कलषवाहिनी शासन देव-देवियों की मूर्तियाँ उत्कीर्ण हैं। यक्ष यक्षिणियाँ,नृत्यरत युगल और विभिन्न मुद्राओं में शासन-देवियाँ अलंकृत हैं। षिखर,बारह पटलों के माध्यम से पर्वताकार उत्तरोत्तर तीक्ष्ण होते हुये अत्यंत सुंदर प्रतीत होता है। षिखर के अंत में आमलक,घट-पल्लव और कुंभ-कलष शोभायमान हैं। षिखर पर मध्य भाग से ऊपर पूर्व तथा पष्चिम में दो देवियों का निर्माण झरोखों में षिल्प-सज्जा के साथ वातायन बनाते हुये इस तरह सामंजस्य पूर्ण निर्माण किया है कि हवा और रोषनी का अंदर प्रवेष गहराई तक संभव हो सके। आसन से षिखर तक की संपूर्ण रचना का षिल्प-अलंकरण अद्वितीय है। पौराणिक गाथाओं पर आधारित दृश्य,मकरवाहिनी गंगा,कर्मवाहिनी यमुना और दिगंबर मूर्ति भी तलवार एवं नरमुण्ड कर में लिये हुये जैसी मूर्तियाँ उपलब्ध हैं। अहिंसा और हिंसा का यह समन्वय दर्षनीय हैं। यद्यपि सहस्त्रकूट चैत्यालय की रचना बहुत कम क्षेत्रों पर उपलब्ध है। देवगढ़,पटनागंज,कोनी आदि कुछ क्षेत्रों में अवष्य निर्माण हुआ है परंतु बानपुर का सहस्त्रकुट चैत्यालय देष में अपनी तरह का सुंदर सृजन है। एक हजार वर्ष से अधिक प्राचीन इस कलाकृति के रचना काल के बारे में प्राचीनता के सूत्र मध्यप्रदेष के टीकमगढ़ जिले में अहार जैन क्षेत्र के एक षिलालेख में मिलते हैं। बानपुर से लगभग 35 किलोमीटर दूर अहार जैन क्षेत्र के मूलनायक तीर्थंकर शांतिनाथ की मूर्ति के पादमूल में वि. संवत् 1237 का उक्त षिलालेख देवनागरी लिपि का संस्कृत, में अंकित है- ग्रहपतिवंषसरोरुहसहस्त्ररष्मिः सहस्त्रकूटैर्यः। वाणसुरे व्यधितासीत् श्रीमानि। ह देवपाल इति।। 1।। श्री रत्नपाल इति तत्तनयो वरेण्यः पुण्यैकमूर्तिरभवद्वसुहाटिकायां। कीर्तिर्जगत्रय परिभ्रमणश्रमात्र्ता यस्य स्थिराजनि जिनायतनच्छले न।। 2।। एकस्तावदनूनबुद्धिनिधिना श्री शांतिचैत्याल। यो दिष्टयानंदपुरे परः परतरानंदप्रदः श्रीमता। येन श्रीमदनेषसागरपुरे तज्जन्मनो निम्र्मिमे। सोअयं श्रेष्ठिवरिश्ठगल्हण ईति श्रीरल्हणाख्याद। भूत्।। 3।। तस्मादजायत कुलाम्बरपूर्णचंद्रः श्रीजाहडस्तदनुजोयद चन्द्रनामा। एकः परापकृतिहेतुकृतावतारो धम्र्मात्मकः पुनरमो घसुदानसारः।। 4।। ताभ्यामषेषदुरितौघषमैकहेतुं निर्मापितं भुवनभूशणभूतमेतद्। श्रीषांतिचैत्यमतिनित्यसुखप्रदा तृ मुक्तिश्रियो वदनवीक्षणलोलुपाभ्याम्।। 5।। संवत् 1237 मार्ग सुदी 3 शुक्रे श्रीमत्परमर्द्धिदेवविजयराज्ये। चंद्रभास्करसमुद्रतारका यावदत्र जनचित्तहारकः। धम्र्मकारिकृतषुद्धकीर्तनं तावदेव जयतात् सुकीत्र्तनम्।। 6।। वाल्हणस्य सुतः श्रीमान् रुपकारो महामतिः। पापटो वास्तुषास्त्रज्ञस्तेन बिम्ब सुनिर्मितम्।। 7।। उक्त षिलालेख के प्रथम ष्लोक से ही पुष्ट हो जाता है कि ग्रहपति वंषरुपी कमलों को प्रफुल्लित करने के लिये सूर्य के समान श्रीमान देवपाल ने बानपुर में सहस्त्रकूट चैत्यालय का निर्माण कराया था। यह भी कि इसके सृजनकर्ता वास्तुषिल्पी पापट रहे हैं। देवपाल,अहार प्रतिमा के निर्माता के तीन पीढ़ी पूर्व के थे अर्थात दषवीं सदी का काल बानपुर के सहस्त्रकूट निर्माण का अनुमानित है। ’अनेकान्त’ पत्र ने 1963 में एक लेख में इस निर्माण का उल्लेख कर रचना काल ईस्वी सन् 945 माना है। यों भी गुप्तोत्तर काल में ही मूर्ति रचना की विविधता मिलती है और सहस्त्रकूट की रचना इसी किस्म की है। कूट का अर्थ होता है जिसका प्रयोग जिनालय के रुप में कर लिया गया और सहस्त्र अर्थात एक हजार। जबकि सहस्त्रकूट चैत्यालय में एक हजार मूर्तियों की स्थापना केवल श्वेताम्बर जैन समाज में होती है। दिगम्बर क्षेत्र के सहस्त्रकूटों में मूर्तियों की संख्या एक हजार आठ निर्मित की गई है। आदि पुराण पर्व 25 ष्लोक 224 में प्रथम आदिनाथ की स्तुति इन्द्र द्वारा एक हजार नामों से की गई थी। संभवतः इसी आधार पर सहस्त्रकूटों का कुछ क्षेत्रों में यथा सम्मेद षिखर,दिल्ली आदि में भी निर्माण हुआ था परंतु जैन धर्म में बहुदेवतावाद की परिकल्पना मान्य नहीं हो सकी। इसलिये सहस्त्रकुट चैत्यालय दसवीं-ग्यारहवीं सदी के बाद शायद अन्यत्र निर्मित नहीं हुये। |