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अवस्थिति :- श्री १००८ दिगंबर जैन अतिशय क्षेत्र सांवलिया पार्श्वनाथ करगुवां जी (Atishay jain tirth Kshetra Karguwan Ji ) का विहंगम दृश्य दर्शनीय है ! ७०० वरस से अधिक प्राचीन संवत १३४५ की अतिशयकारी सांवलिया पार्श्वनाथ के साथ भगवान आदिनाथ,भगवान शांतिनाथ,भगवान नेमीनाथ एवं पंचपरमेष्ठी भगवंतों की प्रतिमाएँ भोंयरे में बिराजमान है ! महावीर भगवान की प्रतिष्ठा संवत १८५१ की बसंत पंचमी के दिन हुई थी ! भगवान आदिनाथ भगवान बाहुबली स्वामी की आदमकद प्रतिमायें शाल्यमली जिनालय एवं मानस्तम्भ बंदनीय है ! क्षेत्र पर अतिशय एवं शांति का समागम है जो कि साधुजनों सहित श्रावकों को भा जाता है !
भोगोलिक अवस्तिथि :- शिल्प संस्कृति और लोककला के अनूठे संगम व ऋषि मुनियों की तपो भूमि एवं साहित्य कारों के रस से सिंचित की ह्रदय स्थली वीरांगना रानी लक्ष्मीबाई की कर्मभूमि झाँसी (Jhansi)नगर के अत्यंत मनोरम पहाड़ी की तलहटी में ग्राम करगुवां (Karguwan Ji ) है ! यह तीर्थ स्थली ग्राम करगुवां की ९ एकड़ भूमि पर अवस्थित है ! यह तीर्थ स्थली जह्न्सी रेलवे स्टेशन से ७ कि.मी. एवं बस स्टैंड से ३ कि.मी. दूरी पर झाँसी (Jhansi)कानपूर रास्ट्रीय राजमार्ग पर बने मेडिकल कालेज से गेट नंबर २ के सामने लगभग आधा कि.मी. दूर मनोरम पहाड़ी कि तलहटी में स्थित है !
अतिशय :- लगभग २०० बरस पहले झाँसी (Jhansi)शहर बलवंत नगर के नाम से विख्यात तथा पेशवाओं का शासनकाल था , इसी शासनकाल में नगर से लगभग ५ कि.मी. दूर ग्राम करगुवां जी (Karguwan Ji ) के पास से १ बैलगाडी जा रही थी कि एकाएक इस चमत्कार भूमि पर रुक गई लाख कोशिश करने के बावजूद भी वह गाडी आगे न बढ सकी और रात हो गई ! गाडीवान ने प्रकति के मिलन कि अनुकूलता और संगति समझकर गाडी यथा स्थान मेल दी तथा रात्रि विश्राम करने लगा ! देवयोग से उस समय दिगंबर जैन समाज में श्री सिघई नन्हे जू एकलब्ध प्रतिष्ठित गणमान्य व्यक्ति थे, उन्हें रात्रि के अंतिम प्रहर में एक स्वप्न दिखा कि एक देवतुल्य पुरुष उनसे कह रहे हैं कि ग्राम करगुवां में जहाँ बैलगाडी रुक गई है वहां ज़मीन में विशाल प्रतिमाएँ हैं- उन्हें निकालो स्वप्न द्रिसटा की अनुभूति और पुण्यशीलता लिए श्री नन्हे जू ने इस आलोकिक स्वप्न की चर्चा प्रातःकाल राज दरवार में की जिससे प्रभावित होकर 'दरवार' में यह निर्णय लिया गया की वहां खुदाई की जावे, इसी भावना के साथ क्षेत्र का वैभव और अतिशय का उदय हुआ ! स्वप्न को साकार करने के लिए श्री नन्हे जू राज दरवारियों, जैन- अजैन बंधुओं सहित चल पड़े ! बस यही 'बलिहारी प्रभु आपकी जिन अतिशय दियो बताय' उस मेल की हुई बैलगाडी के पास पहुँचकर खुदाई प्रारंभ कर दी गई ! लगभग ७-८ फ़ुट खुदाई होने पर ही मूर्तियों की झलक दिखलाई देने लगी फिर क्या था ? "जय-जयकार" के नारों से चरों दिशाएं गुंजायमान होने लगी ! राज दरवार में सुचना भेजी गयी, और फिर सावधानीपूर्बक अतिशयकारी सभी ६ भव्य प्रतिमाओं को निकाला गया ! पेशवाओं के सूबेदार आ पहुंचे मूर्तियों के प्राप्त करके आत्मविभोर हुए ! कहा जाता है परंपरा के अनुसार घुड़दोड का आयोजन करवाया गया था ! जैन समाज द्वारा सदा यशता के लिए भूमी की उसी गहराई पर शिखर बंद माडिया का रूप देकर "भोंयारा" का निर्माण कराया एबं क्षेत्र की रमणीयता और सुरक्षा हेतु भू-गृह के चारों और ९ एकड़ भूमि पर परकोटा , एक चोकोर तथा एक गोल कुवां बनवाया गया ! बीहड़ स्थान को बाग़ बगीचों का रूप दिया गया क्षेत्र व्यवस्था हेतु भू-गृह के पास में एक कमरा बनवाया ! भू-गृह की अतिशयकारी प्रतिमाओं को प्रतिष्टित कर मंदिर रूप देने हेतु एक मूर्ति भगवन महावीर स्वामी की श्री नन्हे जू ने मंगाकर वि.सं. १८५१ की बसंत पंचमी के दिन प्रतिष्ठा कर भोंयेरे को मंदिर का रूप दिया ! प्रमाण स्वरूप भगवन महावीर की प्रतिमा में अंकित प्रशस्ति में श्री नन्हे जू का नाम ,दिन ,और संवत स्पस्ट लिखा हुआ दिखाई देता है !
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