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क्षेत्रपाल जी
उत्तरप्रदेशीय बुंदेलखंड में ललितपुर,जैन धर्मावलम्बियों का एक केन्द्रीय शहर है। जैनियों की संख्या तो यहाँ अन्य जातियों की तुलना में सर्वाधिक है ही,इसके चारों ओर दिगम्बर जैन तीर्थों की विशद श्रृखंला है। सबसे निकट देवगढ़ तो जैसे देव मूर्तियों गढ़ने का गढ़ ही रहा है। सेरोन जी,चंदेरी,थूबौन जी,बानपुर,पपौरा,अहार, मदनपुर इत्यादि।
ललितपुर में स्टेशन रोड़ पर स्थित क्षेत्रपालजी वस्तुतः एक प्राचीन क्षेत्र ही है जहाँ 12वीं शताब्दी से लेकर वर्तमान तक की अगणित तीर्थंकर मूर्तियाँ अत्यंत कलात्मक एवं भव्य हैं। एक विशाल परकोटे में तेरह जिनालय हैं प्रवेश करते ही सामने संवत् 1243 की प्रतिष्ठित 4 फुट ऊँची पùासन प्रतिमा तीर्थंकर अभिनंदन नाथ की विद्यमान है, नीचे यहीं क्षेत्रपालजी की स्थापना है। बरामदे के स्तंभ पर चंद्रप्रभु की प्राचीन मूर्ति है। मंदिर संख्या 3 में वि.सं. 1223 की श्वेत पाषाण प्रतिमा है।
पुरातत्व

क्षेत्र पर स्थित भोंयरे में पाषाण भित्ति में ही अनेक जिन बिम्ब न केवल प्राचीन हैं वरन् सुन्दर भी हैं। पाश्र्वनाथ स्वामी की 6 फुट ऊँची खड़गासन मूर्ति चट्टान में ही उकरी है। बाहुबली स्वामी की मूर्ति सचमुच मनोहारी है। कुल 12 तीर्थंकर और 35 शासन देवताओं की मूर्तियाँ भू-गृह में दर्शनीय हैं।
मंदिरों के पूर्व क्रम में आठवें जिनालय में वि.सं.1706 की 7 फुट ऊँची पाश्र्वनाथ की खड़गासन प्रतिमा के प्रतीक नाग के सात फणों युक्त वाला यह बिम्ब अतयंत ओजपूर्ण है। वर्तमान में भी इस क्षेत्र-प्रांगण में अवस्थित हैं। धर्म शालाओं की उत्तम व्यवस्था है। उदासीन आश्रम और सभागृह भी विद्यमान हैं। क्षेत्र से संलग्न प्रांगण में प्रतिष्ठित श्रीवर्णी जैन काॅलेज है जिसका इस सम्पूर्ण जनपद में अपना उल्लेखनीय गौरव है।