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अतिशय जैन तीर्थ क्षेत्र नवागढ़
स्थिति
उत्तरप्रदेश में ही ललितपुर जिले की महरौनी तहसील में सोजना ग्राम से लगभग 4-5 किलोमीटर दूर स्थित ग्राम नावई को ही अतिशय दिगंबर जैन क्षेत्र नवागढ़ कहते हैं। मध्यप्रदेश के टीकमगढ़ जिलान्तर्गत ककरवाहा ग्राम से भी यह निकट पड़ता है। वस्तुतः मध्यप्रदेश और उत्तरप्रदेश की संधि पर नवागढ़ दि. जैन क्षेत्र विद्यमान है।
इतिहास
बुंदेलखंड़ के इस अंचल की पृष्ठ भूमि लगभग एक समान ही रही है। विभाजित बुंदेला राजाओं ने टुकडे-टुकडे राज्य किया और फिर अंग्रेजी सल्तनत में पद दलित हुये। अतः कला के नाम पर नवमीं से बारहवीं सदी में जो निर्माण हुआ वही धरोहर अवशिष्ट हैं।
पुरातत्व
सदियों से जंगलों के उदर में लुप्त यहाँ के मंदिर और कलाकृतियाँ आजादी के पश्चात भी अज्ञानता के गर्त में पड़े रहे। 19वीं सदी के पाँचवे दशक के पश्चात ही लोगों की नजर यहाँ के भोंयरे पर पड़ी। पहले यहाँ एक बड़ा टीला और उस पर एक विशाल इमली का वृक्ष सघन रुप से आच्छादित था।
भूगृह में तीर्थंकर अरहनाथ की विशेष मूर्ति के साथ कुछ अन्य जिनदेवों की प्रतिमायें भी थीं। पर जैनतर गाँव वासी इस टीले पर एक मूर्ति स्थापित कर ’दूल्हाजू’ नाम से पूजन करने लगे। जैनियों ने इस भूगृह ही प्रतिमायें अन्य मंदिरों में सुरक्षित करनी चाही तो गाँव वासियों ने विरोध कर कहा कि जो भी पूजन अर्चन करना हो यहीं करें। फलतः जैन परिवारों ने यहीं मंदिर स्थापित कर लिया और इसे विकसित किया। खनन से यहाँ अनेक तीर्थंकर मूर्तियाँ और रचनात्मक शिलाखंड उपलब्ध हुये। 1960 में इस अतिशय क्षेत्र पर मेला प्रारंभ किया गया।
वर्तमान में 80-125 फुट के एक चबूतरे के नीचे स्थित भूगृह एक सुंदर जिनालय है जिसमें संवत 1202 की नीले पाषाण की तीर्थंकर अवशेषों में तीर्थंकर शांतिनाथ एवं अरहनाथ के खंड प्रतीक भी हैं। नवागढ़ के कलावशेषों को भव्य तोरण खंड प्राप्त कलावशेषों को सुरक्षित रखने हेतु एक संग्रहालय बनाया गया है। बाद में एक तिमंजिले भवन पर एक चैत्यालय का निर्माण भी किया गया है।
पुरातत्वेत्ताओं के दृष्टिकोण से यहाँ उपलब्ध अद्भुत सुंदर तोरण किसी देवी पर मूल नायक की मूर्ति के ऊपर लगे वृहद तोरण का उपशेष है। इस पर दो मस्त गजराज महाप्रभु को पुष्पर्पित कर रहे हैं, सुंदर अलंकृत देव-देवांगनायें अर्चना को जाते हुये चित्रांकित हैं। ऊपर चक्र, आमलक और कलष शोभायमान हैं। यह रचना यहाँ के मंदिर की नगर शैली वास्तु की पुष्टि करती हैं।
इसी तरह सात फुट छः इंच ऊँची खड़गासन युगादि देव का केश विन्यास और अलंकरण उत्कृष्ट स्तर का है। साढे़ तीन फुट ऊँची पाश्र्वनाथ की पùासन प्रतिमा का आसन,उसके शासन प्रतीक नाग की पूँछ और कुण्डली से ही बनना मनोहारी है।
नवागढ़ के पास स्थित सोजना और ऊमरी ग्राम में भी अनेक मूर्तियाँ और कला खंड इस क्षेत्र के,कभी संपन्न जैन तीर्थ होने के संकेत देते हैं। सोजना की बाबड़ी के मानस्तंभ पर लगा शिलालेख ’सं. 1202 गोलापूर्वान्वये’ इसकी प्राचीनता और ऊमरी के पाश्र्वनाथ की भव्य प्रतिमा यहाँ की पुरातन संपदा की कहानी कहते हैं।
इस क्षेत्र में उत्खनन और पुरातत्विक ’सर्वे’ कर, खोज बहुत आवश्यक है तभी सारे रहस्य स्पष्ट हो सकेंगे।