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अतिशय क्षेत्र पावागिरि (पवा जी)
उत्तरप्रदेश के झाँसी से लतिलपुर जाने वाले बस मार्ग पर बेतवा नदी के पास पवा नामक ग्राम से तीन किलामीटर पूर्व में यह जैन तीर्थ स्थित है। पावागिरि या पवा जी,झाँसी से 45 कि.मी. और ललितपुर से भी लगभग 45 कि.मी. की दूरी पर है। बस मार्ग के अतिरिक्त रेल से पावागिरि पहुँचने के लिये मध्य रेलवे के बसई स्टेशन से 13 कि.मी. और तालबेहट से 13 कि.मी. दुरी पार कर भी पहुँचा जा सकता है।
इतिहास
यहाँ बावडी की खुदाई में प्राप्त एक मूर्ति के अभिलेख में वि.सं. 299 और तीर्थ का नाम ’पावा’ उत्र्कीण है। जिससे इस क्षेत्र की प्राचीनता का अनुमान लगाया जा सकता है। यहाँ के एक प्राचीन भोंयरे में उपलब्ध मूर्तियों में एक मूर्ति पर सं. 1299 और चार पर संवत 1345 उत्कीर्ण है। यह क्षेत्र लगभग दो सौ वर्ष पूर्व प्रकाश में आया है।
अतिशय एवं सिद्धता
मूल पावागिरि के लिये निर्वाण कांड़ की यह गाथा शास्त्रोक्त है-

पावागिरिवर सिहरे सुवव्ण भद्वाई मुणिवरा चउरो।
चलणाणई तडग्गे णिव्वाण गया णमें ते सिं।।
जिसका हिन्दी भाषाकृत निर्वाण काण्ड़ में इस तरह उल्लेख है-
स्वर्णभद्र आदि मुनिचार,पावागिरि शिखर मझार।
चेलना नदी तीर के पास मुक्ति गये बन्दों नित तास।।

के अनुसार, पावागिरि नाम की पहाडभ् से, जिसके निकट चेलना नदी प्रवाहित है स्वर्ण भद्र आदि मुनिवर मुक्ति को प्राप्त हुये और इसी निर्वाण के कारण यह पावन सिद्ध तीर्थ माना जाता है। यद्यपि यह अभी विवादग्रस्त है कि असली पावागिरि सिद्व तीर्थ यही (पावा) है अथवा निमाड़ क्षेत्र का जैन तीर्थ ’ऊन’। इसीलिये इस पवा की उतनी उन्नति नहीं हो सकी जितनी सामाजिक मान्यता प्राप्त दूसरे पावागिरि तीर्थ के नाम से ’ऊन’ की।

गाथा/किंवदन्ती
एक ग्रामीण गाथा पवा में प्रचलित है जिसके अनुसार यहाँ स्थित ’भूरे बाबा के चबूतरा’ में जो छिद्र हैं उसमें एक विशालकाय श्वेत नागदेव कभी कभी निकलते थे। प्रचलित किंवदंती के अनुसार एक बार जैन धर्मावलम्बी दीे नायक अपनी बारातो ंसहित शादी करने जाते हुये संयोगवश यहीं एक साथ रुके, रात्रि में आपसी मनोविनोद में क्लेश हुआ प्रातः ज्ञात हुआ कि वो दोंनो नायक मारे गये थे।
जैन मत के अनुसार उन दोंनो ने व्येतर योनि पाई। एक को सर्प योनि प्राप्त हुई और उन्हीं के नाम पर एक यह भूरे बाबा का चबूतरा कहलाता है एवं दूसरे रमतूला बाबा का भी स्थान यहाँ नियत हैं। इसलिये आस-पास के रुढ़िवादी नर-नारी अपनी अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति हेतु कभी कभार यहाँ आते रहते हैं।
पुरातत्व
यहाँ ’सिद्व की पहाड़ी’ एवं ’पावा की पहाड़ी’ के मध्य बेलना नदी, (कहलाता यह बेला नाला था) जिसे स्थानीय जैन,पौराणिक नदी ’चेलना’ ही मानतें हैं के तट पर यह जैन तीर्थ अवस्थित है। बुंदेलखंड़ में सात प्राचीन भोंयरे (भू-गृह) प्रसिद्व है जो क्रमशः देवगढ़,सेरोन,करगुवाँ,चदेरी,थूबौन,पपौरा और एक इसी पावागिरि में विद्यमसन हैं। यहाँ के,लगभग 4 गुणित 5 फुट प्रवेश द्वार के बाद लंबे गर्भगृह में दो फुट ऊँची बेदी पर काले तेलिया पत्थर की तीन प्रतिमायें सामने और तीन बांयी ओर स्थित हैं।
सामने की मूर्तियों में तीर्थकंर पाश्र्वनाथ की 35 इंच ऊँची,आदिनाथ की 37 इंच और तीसरी तीर्थंकर संभवनाथ की लगभग 24 इंच ऊँची हैं। इन पर अपभ्रंस भाषा में संवत् 1199 और 1345 के अभिलेख पाश्र्व में अंकित हैं। बायी ओर तीर्थंकर नेमिनाथ की 25 इंच ऊँची संवत् 1345 की, मल्लिनाथ की 19 इंच ऊँची संवत् 1299 की तथा तीसरी तीर्थंकर अजितनाथ पद्यमासन अवस्था में स्थापित हैं।
इस गर्भगृह के सामने क्षेत्रपाल जी की मड़िया है। अन्य मूर्तियाँ संवत् 299 से लेकर 1345 तक की कालावधि की हैं। यहाँ एक प्राचीन ’पुर’ के अवशेष, नायक की गढ़ी के खंडहर,परकोटा,बुलंद दरवाजा द्वारपाल,कक्षावशेष,बावड़ी आदि,इतिहास के अनेक रहस्य छिपाये हुये हैं। गढ़ी का निर्माता महाराज वृशिंक देव का एक प्रिय नायक था। कुछ लोग इस गढी को किसी विशाल जिनालय का अवशेष मानते हैं। वृशिक देव बानपुर के किन्हीं नरेश का नाम था जिनके अंर्तगत इस पावापुर तीर्थ के निकट का तालबेहट भी आता था।
नये निर्माण में तीन मंदिर और एक मानस्तंभ जुड़ा है। इनमें श्वेत संगमरमर की बाहुबलि और महावीर स्वामी,शांतिनाथ व चंद्रनाथ की भव्य और आकर्षक मूर्तियाँ हैं। वर्तमान में क्षेत्र का काफी विकास हुआ है। दाँयी ओर सिद्ध गुफा नामक मंदिर है, इसमें एक बडे़ शिलाखंड पर चार मुनियों के चरण चिन्ह अंकित हैं। स्वर्ण भद्र आदि मुनियों के
यही चरण चिन्ह बताये जाते हैं।
पं. सागरमल जैन वैद्य विदिशा ने अनेक प्रमाण देते हुये कभी यह सिद्ध करने का प्रयास किया गया था कि पौराणिक पावागिरि यही पवा है न कि वर्तमान ऊन-तीर्थ।

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