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नाम                  सन्तोष ‘बिजावरी’
पत्नी का नाम       श्रीमती लक्ष्मी समारी
पिता का नाम       स्व0 श्री दुर्गा प्रसाद समारी
माता का नाम       श्रीमती मलीदा समारी
जन्म स्थान         बिजावर जिला छतरपुर (म0प्र0)
जन्म दिनांक        06.06.1958
शिक्षा                 स्नातक

विधायें    बुन्देली एवं खड़ी बोली में गीत एवं हांस्य व्यंग्य ।

प्रकाशाधीन
ऽ    ‘‘बासौ मठा बड़ी बखरी कौ’’ (बुन्देली गीत संकलन)
ऽ    ‘‘दो कम्बल का मालिक’’ (हांस्य व्यंग्य संकलन)
ऽ    ‘‘चड्डी नाड़ा और गठान’’ (काव्य संकलन)

Santosh Vijawari

उपलब्धियां
ऽ    स्मृति मंच दमोह द्वारा हास्याचार्य की उपाधि से अलंकृत ।
ऽ    बिहारी सांस्कृतिक एवं साहित्यिक मंच, बिजावर द्वारा सम्मानित ।
ऽ    राजा संतोष सिंह बुन्देला साहित्य परिषद, छतरपुर द्वारा सम्मानित ।
ऽ    नूतन साहित्य परिषद, पन्ना द्वारा सम्मानित ।
ऽ    विकल साहित्य एवं सांस्कृतिक परिषद खागा, फतेहपुर द्वारा सम्मानित ।
ऽ    शासकीय महाविद्यालय, बिजावर जिला छतरपुर छात्र संघ द्वारा सम्मानित ।
ऽ    मंदाकिनी साहित्य एवं सांस्कृतिक परिषद, नरदहा द्वारा प्रषस्ति पत्र एवं सम्मान ।
ऽ    स्वतंत्रता संग्राम सेनानी जगमोहन त्रिपाठी स्मृति मंच गढ़ी पडरिया द्वारा सम्मानित ।
ऽ    अखिल भारतीय बुन्देलखण्ड साहित्य एवं सांस्कृतिक परिषद भोपाल द्वारा सम्मानपत्र ।
ऽ    भारत भवन, भोपाल में बुन्देली में काव्यपाठ ।
ऽ    देश के स्थापित मंचों पर अखिल भारतीय कवि सम्मेलनों में खड़ी बोली एवं बुन्देली में विभिन्न प्रान्तों में काव्य पाठ ।
ऽ    आकाशवाणी एवं दूरदर्शन पर बुन्देली में समय-समय पर प्रसारण ।
         

 

लेखापाल, कार्यालय जिला एवं सत्र न्यायाधीश, पन्ना (म0प्र0)
        निवास धाम मोहल्ला, पन्ना (म0प्र0)
        मोबाईल नम्बर - 9179257750

मड़वा ऊपर बिछे बिछौना, मड़वई भीतर ढ़ला चला ।
हरिया हरिया कर रओ हरिया, गोरी कर रई गला गला ।।

भुनसारे से गुथना घुम रव, हरिया हक रय लोड़न से ।
मेड़न मेड़न दओ दौदरा, एड़न उठ रई गोढ़न से ।।
छेवला तरे बैठ के रे गई, बलम हार गये बुला बुला ।
हरिया हरिया कर रओ हरिया, गोरी कर रई गला गला ।।

भरो पोतला में पानी, उर दरिया धरो तबेला में ।
बासो मठा बड़ी बखरी को, जगन्नाथ के बेला में ।।
कच्चे केंथा कुचर कुचर के, नोन में खा गये मिला मिला ।
हरिया हरिया कर रओ हरिया, गोरी कर रई गला गला ।।


भरी गुड़ाखू बड़ो चिलम में, फूका पे फूका मसके ।
घरवाली ने घूंघट घालो, तनक बोल बोले रसके ।।
रस गये गस गये हिया हरष गये, और बरष गये झला झला ।
हरिया हरिया कर रओ हरिया, गोरी कर रई गला गला ।।          सन्तोष ‘बिजावरी’

मकलन में दरार गये फरवा, खूब ततूरी सी दये तरवा ।।
काठ कठोता पानी पी के, चिलम चडी चरखारी की ।
खोसे उलिया टांगे ढुलियां, जा हुलिया घरवारी की ।।

खूबई लगै राम रगडा में, बुरय बिदे रय लुखर गढा में ।
ड्योढो दूनो काढो कडुवा, बरयाई बरके सूरझो अडुवा ।।
दतो रओ दसरय के दिन से, आ गयी रात दिवारी की ।
खोसे उलिया टांगे ढुलियां, जा हुलिया घरवारी की ।।


चार वेद सी चारउ मेढे, रिचाये पुन्न बीज की छेडे ।
फसल पकी फिर कृपा राम की, अर्थ धर्म और मोक्ष काम की ।।
सबरी साल तपस्या भोगी सुद छोडे संसारी की ।
खोसे उलिया टांगे ढुलियां, जा हुलिया घरवारी की ।।